एक अधूरा लम्हा

जिंदगी ट्रेन के सफर की तरह है, जिसमें न जाने कितने मुसाफिर मिलते हैं फिर अपना स्टेशन आते ही उतर जाते हैं और हमारी यादों में बस उनका आना और जाना रहता है, उनका चेहरा नहीं! लेकिन कोई सहयात्री ऐसा भी होता है जो अपने गन्तव्य पर उतर तो जाता है पर हम उसका चेहरा, उसकी हर याद अपने हृदय में सॅंजो लेते हैं और अपने गन्तव्य की तरफ बढते रहते हैं। वो साथ न होकर भी साथ रहता है। ऐसा ही एक हमराही मुझे भी मिला उसका नाम है- सम्पदा…………. वो कल रात की फ्लाइट से न्यूयाॅर्क जा रही है। पता नहीं अब कब मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं। मैं नहीं चाहता कि वह जाए। मुझे पूरा यकीन है कि वो भी नहीं चाहती। लेकिन अपने बेटी की वजह से जाना ही है उसे सम्पदा ने कहा था कि ‘‘पृथक अकेले अभिभावक की यही समस्या होती है फिर टिनी तो मेरी इकलौती संतान है। एक दूसरे के बिना हम रह नहीं सकते। एक वक्त के बाद वो अकेले रहना सीख जाएगी। इधर वह कुछ ज्यादा ही असुरक्षित महसूस करने लगी है। पिछले दो-तीन सालों में उसमें बहुत बदलाव आया है। यह बदलाव उम्र का भी है, फिर भी मैं ये नहीं चाहती कि वह कुछ ऐसा सोचे या समझे, जो हम तीनों के लिए तकलीफदेह हो। मैं उसे देखता रहा। पिछले दो सालों से उसमें बदलाव आया है यानि कि जबसे मैं सम्पदा से मिला हूॅ। हो सकता है कि उसकी बात का मतलब ये न हो, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा- दुःख हुआ।
सम्पदा ने मेरा चेहरा पढ़ लिया, ‘‘पृथक, तुम्हें छोड़कर जाने से मैं बिल्कुल अकेली हो जाऊॅंगी इसका दुःख मुझे भी है पर अब मेरे लिये टिनी का भविष्य ज्यादा जरूरी है।’’ ‘‘टिनी हाॅस्टल में भी रह सकती है, तुम्हारा जाना ज़रूरी है? मैंने सम्पदा का हाथ पकड़ते हुए कहा था। उसकी भी आॅंखे देखकर मुझे खुद पर गुस्सा आ गया था। मनुष्य का मन चुंबक के समान है और वह अपनी इच्छित वस्तु को अपनी ओर आकर्षित कर उसे प्राप्त कर लेना चाहता है। परिस्थितियाॅं चाहे जैसी भी हों।
मैं कितना स्वार्थी हो गया हूॅं। वैसे भी मैं उसे किस हक़ से रोक सकता हूॅं? सब कुछ होते हुए भी वो मेरी क्या है? आज समझ में आ रहा है। हम-दोनों की एक-दूसरे की जि़न्दगी में क्या जगह हैं? दोनों के रिश्ते का दुनियाॅं की नजर में कोई नाम भी नहीं है। समाज को भी रिश्तों में खून का रंग ज्यादा भाता है। अनाम रिश्तों में प्रेम के छींटे समाज नहीं देख पाता। अगर मेरी बेटी को जाना होता पढ़ने तो मैं क्या करता? मैं उसे आसपास के शहर में भी नहीं भेज पाता। मुझे चुप देखकर सम्पदा ने नर्म स्वर में कहा था, ‘‘हमें अच्छे और प्यारे दोस्तों की तरह अलग होना चाहिए। इन दो सालों में तुमने बहुत कुछ किया है मेरे लिये…. तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता है। तुम समझ सकते हो मुझे कैसा लग रहा होगा….. तुम भी ऐसे उदास हो जाओगे उसके चेहरे पर उदासी छा गई। कितनी जल्दी रंग बदलती है उसके चेहरे की धूप रंग ही बदलती है, साथ नहीं छोड़ती। अन्धेरे को नहीं आने देती अपनी जगह।
मैं उसे उदास नहीं देख पाता। मुस्कुराते हुए कहा था ‘‘दरअसल बहुत प्यार करता हूॅं न तुम्हें इसीलिए पजेसिव हो गया हूॅं और कुछ नहीं। तुमने बिल्कुल ठीक फैसला किया है। मैं तुम्हें जाने से रोक नहीं रहा, पर इस फैसले से खुश भी कैसे हो सकता हूॅ। यह कहकर मैं एकदम से उठकर अपने चैम्बर में आ गया। अपने इस बर्ताव पर मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया। मुझे उसे दुःखी नहीं करना चाहिए।
यह वही सम्पदा तो है जिसने अपना प्रमोशन पिछली बार सिर्फ इसलिए छोड़ दिया था कि उसे मुझसे दूर दूसरे शहर में जाना पड़ता और वो मुझे छोड़कर नहीं जाना चाहती। तब मैं उसे जाने के लिए कहता रहा था।
तुम्हें कहाॅं पाऊॅंगी वहाॅं? उसकी आॅंखें घने बादलों से ढकी शाम हो गयी थी जैसे। जब मैं अपनी कम्पनी की इस ब्राॅंच में आया था अच्छा भला था। अपने काम और परिवार में मस्त। घर में सारी सुख-सुविधाऐं, बीबी और दो बच्चों का परिवार जो अमूमन सुखी कहलाता है, सुखी ही था। मेरी कस्बाई तौर-तरीकों वाली बीबी, जो शादी के बाद से ही खुद को बदलने में लगी है। पता नहीं यह प्रक्रिया कब खत्म होगी। शायद कभी नहीं। बच्चे हर लिहाज से एक उच्च अधिकारी के बच्चे दिखते हैं। मानसिकता तो मेरी भी पूर्वाग्रहों से मुक्त न थी। एक दिन स्त्री-पुरूष के विकास की चर्चा सुनकर मुझसे सम्पदा ने जो कहा उसने मुझे काफी हद तक बदल दिया था। उसने कहा था ‘‘विकास के नियम स्त्री-पुरूष दोनों के लिए अलग नहीं है। किन्तु पुरूष अविकसित पत्नी के होते हुए भी अपना विकास कर लेता है, लेकिन अविकसित पति के संग रहकर स्त्री अपना विकास असंभव पाती है। क्योंकि वह उसकी प्रतिभा को पहचान नहीं पाता और व्यर्थ के रोक-टोक लगाता है। जिससे स्त्री का विकास बाधित होता है। कम विकसित व्यक्तित्व वाली स्त्री जब अधिक विकसित परिवार में जाती है तो वह अनुकूल विवाह है यह शास्त्र-विदित है। क्योंकि वहाॅं उसके व्यक्तित्व का विकास अवरूद्ध नहीं होता लेकिन ऐसा परिवार जो उसके व्यक्तित्व की अपेक्षा कम विकसित है, उस परिवेश में उसका व्यक्तिगत विकास अधिक सम्भव नहीं होता तो यह अनुकूल विवाह नहीं है। शास्त्र में इसका निषेध है। वहाॅं स्त्री कााा दम घुट जाएगा। विकास से मेरा तात्पर्य, बौद्धिक, मानसिक, आत्त्मिक विकास से है। यह आर्थिक विकास नहीं है, ज्यादातर आर्थिक समृद्धि के साथ आत्मिक पतन आता है। स्त्री शक्ति है! व्ह सृष्टि है, यदि उसे संचालित करने वाला व्यक्ति योग्य है। वह विनाश है, यदि उसे संचालित करने वाला व्यक्ति अयोग्य है। इसीलिये जो मनुष्य स्त्री से भय खाता है वह या अयोग्य है या कायर! और दोनों ही व्यक्ति पूर्ण नहीं है…..। मैं उसका मुॅंह देखता रह गया। मैंने तो बड़े जोर से उसे इम्प्रेस करने के लिए बोलना शुरू किया था पर उसके अकाट्य तर्कसंगत सत्य ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। वह बिल्कुल ठीक थी। कितनी अलग लगी थी सम्पदा ऐसी बातें करते हुए? पहले मैं क्या-2 सोचता था इसके बारे में………।
इस आॅफिस में पहले दिन सम्पदा राय को देखा तो आॅंखों में चमक आ गई थी। चलो रौनक तो है। तन-मन दोनों की सहत ठीक रहेगी। पहले दिन तो उसने देखा तक नहीं। बुझ सा गया मैं। फिर ‘ऐसी भी क्या जल्दी है’ सोचकर तसल्ली दो खुद को। उसके अगले दिन फाॅर्मल इन्ट्रोडक्शन के बीच हाथ मिलाते हुए बड़ी प्यारी मुस्कान आयी थी उसके होंठो पर। देखता रह गया मैं। कुल मिलाकर इस नतीजे पर पहुॅचा कि मस्ती करने के लिए बढि़या चीज है। आॅफिस में, खासकर मर्दो में भी उसके लिए कोई बहुत अच्छी राय नहीं थी। वह उन्हें झटक जो देती थी अपने माथे पर आये हुए बालों की तरह। खैर, कभी-2 की हाय-हैलो गुड माॅर्निंग में बदली। एक दिन उसने चाय के लिये कहा। उसी के चैम्बर में बैठे थें हम। मुझे बात बनती सी नजर आयी। कई बातें हुई पर मेरे मतलब की कोई नहीं हुई। आगे चल कर चाय-काॅफी का दौर जब बढ़ गया तो वैभव वर्मा ने कहा कि तुम्हारी बात सिर्फ चाय तक ही है या आगे भी बढ़ी? मैंने एक टेढ़ी सी स्माइल दी और खुद को यकीन दिलाया कि मैं उसे कुछ ज्यादा ही पसंद हूॅं। कभी कोई कह देता, सिगरेट शराब पीती है, तो कोई कहता ढेरों मर्द है इसकी मुट्ठी में, कोई कहता देखो साड़ी कहाॅं बाॅंधती है? सेंसर बोर्ड इसे नहीं देखता क्या? जवाब आता ‘‘इसे जी.एम. देखता है न!’’
ऐसी बातें मुझे उत्तेजित कर जातीं। कब वह आयेगी मेरे हाथ? और तो और अब तो मुझे अपनी बीबी के सारे दोष जो मैं भूल चुका था, या अपना चुका था, शूल की भांति चुमने लगे उसे देखता तो लगता कैक्टस पर पाॅंव आ पड़ा है। क्यॅंू कभी-2 लगता है जिसे हम सुकून समझे जा रहे थे वे तो हम खुद को भुलावा दे रहे थें। कभी अचानक सुकून खुद कीमत बन जाता है, सुख की…….! हर चीज की एक कीमत ज़रूर होती है। जिन्दगी, जिसे लोग बेशकीमती कहते तो हैं मगर……… क्या वाकई ये बेशकीमती है? नहीं……. इसकी भी कीमत मौत है। जीवन है तो बंधन है, रिश्तों के बंधन, शरीर के बंधन, आजादी के बंधन……. मगर काश! भावनाओं पर भी बंधन होते तो………। मगर ये तो आवारा हैं। ये बीवियाॅं ऐसी क्यों होती हैं। कितना फर्क है दोनों में। वह कितनी सख्त दिल और सम्पदा कितनी नर्म दिल। वह किसी शिकारी परिन्दे सी चैकस और चैकन्नी……. और सम्पदा नर्म-नाजुक प्यारी मैना सी। कुछ खबर रखने की कोशिश नहीं करती कि कहाॅं क्या हो रहा है और कोई उसके बारे में क्या कह रहा है। सम्पदा का फिगर कमाल का है। ग्रेट! और इसे लाख कहता हूॅं एक्सरसाइज़ करने को पर नहीं। कैसी लगेगी वो नीची साड़ी में? उसकी कमर तौबा? शरीर में कोई कर्व ही नहीं है परन्तु इसके बाद भी घर में मेरा व्यवहार ठीक रहा। कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया। एक दिन सम्पदा ने पूछ ही दिया परिवार के बारे में। मैंने बताया बीबी के अलावा एक बेटा और एक बेटी है तो उसने भी बताया कि उसकी भी एक बिटिया है, टिनी नाम है। पति के बारे में उसने न तो कुछ बताया और न ही मैंने कुछ पूछा। पूछकर मूड नहीं खराब करना चाहता था। हो सकता है कह देती, ‘‘मैं आज जो कुछ हूॅं न उन्हीं की वजह से हूॅं या बहुत प्यार करते हैं मुझे। उनके अलावा मैं कुछ सोच भी नहीं सकती। अमूमन बीबियाॅं या पति भी यही कहते हैं। ऐसे ही कहने के लिए या सच मैं? हाॅं, अगर वह ऐसा कह देती तो यह जो थोड़ी बहुत नज़दीकी बढ रही है वह भी खत्म हो जाती।
ल्ेकिन उससे बात करने के बाद, उसे जानने के बाद एक बात हुई थी। वह मुझे कहीं से भी वैसी नहीं लग रही थी, जैसा सब कहते थें। पहली बार लगा सम्पदा मेरे लिए जिस्म के अलावा कुछ और भी है। क्या मेरी राय बदल रही थी?
फिर आॅंफिस की ओर से न्यू ईयर पार्टी रखी गयी थी। सम्पदा गज़ब की सुन्दर लग रही थी। लो कट ब्लाउज के साथ गुलाबी शिफाॅन की साड़ी पहनी थी। उसने जिन भी पी थी शायद। मेरी सोच फिर डगमगा सी गयी। अजीब सी खुशी भी हो रही थी। एक उत्तेजना भी थी। यह तो बहुत बाद में जाना कि सिगरेट, शराब पीने से औरत बदचलन नहीं हो जाती। अगली सुबह सम्पदा फिर वैसी की वैसी। पहले जैसी थोड़ी सोबर, थोड़ी चंचल। चाय पीते हुए मैंने उससे कहा, ‘‘कल तुम बहुत खूबसूरत और ग्रेसफुल लग रही थी। मैंने पहली बार किसी औरत को इतनी शराब पीते देखा था। कुछ खास है तुममे। उसने आॅंखे फैलाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें शराब पीते हुए ग्रेसफुल लगी? वैरी स्ट्रेंज बट दिस इज ए नाइस काॅम्प्लीमेंट। मैं तो उम्मीद कर रही थी आज सुनने को मिलेगा, ‘‘जानेमन कल बहुत मस्त लग रही थी या क्या चीज़ है यार ये औरत भी।’’ उसकी हॅंसी नहीं रूक रही थी। अब मैं कैसे कहूॅ कि मैं भी उन्हीं मर्दों में से एक था। चीज तो मैं भी कहता था उसे। अगले हफ्ते उसने टिनी के जन्मदिन पर बुलाया था।
‘‘सुनो मैंने सिर्फ तुम्हें ही बुलाया है। मेरा मतलब आॅंफिस में से है। मेरी उत्सुकता चैकन्नी हो गयी थी। उसकी चमकती आॅंखों में क्या था, मेरे प्रति भरोसा या कुछ और? क्यों सिर्फ मुझे ही बुलाया है? उसे लेकर वैभव वर्मा से झगड़ा भी कर लिया था।
‘‘क्यों, पटा लिया तितली को?’’ कितने गंदे तरीके से कहा था उसने।
‘‘किसकी और क्या बात कर रहे हो?’’
‘‘उसकी, जिससे आजकल बड़ी छन रही है। वही जिसने सिर्फ तुम्हें दावत दी है। गज़ब की चीज़ है ना?’’ बस बात बढ़ी और अच्छे खासे झगड़े में बदल गयी। मैं यह सब नहीं चाहता था न ही कभी मेरे साथ यह सब हुआ था। खुद पर ही शर्म आ रही थी मुझे। मैं सोचता रहा, हैरान होता रहा कि ये सब क्या हो गया। क्यों बुरा लगा मुझे? खैर, इन सरी बातों के बावजूद मैं गया था। उसने बताया कि इस साल टिनी पंद्रह साल की हो जाएगी। मेरी आॅंखों के सामने मेरी बेटी का चेहरा आ गया। वह भी तो इसी उम्र की है। मैंने देखा टिनी की दोस्तों के अलावा मैं ही आमंत्रित था। अच्छा भी लगा और अज़ीब भी। थोड़ी देर बाद पूछा था मैंने- टिनी के पापा कहाॅं हैं? हम अलग हो चुके हैं। उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली है। मैं अपनी बिटिया के साथ रहती हूॅं।
कायदे से, अपनी मानसिकता के हिसाब से तो मुझे ये सोचना चाहिए था कि तलाकशुदा औरत और ऐसे रंग-ढंग? कहीं कोई दुःख तकलीफ नज़र नहीं आती। ऐसे रहा जाता है भला? जैसे कि तलाकशुदा या विधवा होना कोई कसूर हो जाता है और ऐसी औरतों को रोते-बिसूरते ही रहना चाहिए। लेकिन यह जान कर पहली बात मेरे मन में आई थी कि तभी इतना आत्मविश्वास है। आज के वक्त में अकेले रहकर अपनी बच्ची की इतनी सही परवरिश करना वाकई सराहनीय बात है। वह मुझे और ज्यादा अच्छी लगने लगी, बल्कि इज्जत करने लगा मैं उसकी। एक और बात आई मन में कि ऐसी खूबसूरत और अक्लमंद बीबी को छोड़ने की क्या वजह हो सकती है।
अब मैं उसके अंदर की सम्पदा तलाशने में लग गया। उसके जिस्म का आकर्षण खत्म तो नहीं हुआ था, पर मैं उसके मन से भी जुड़ने लगा था। मेरी आॅंखों की भूख, मेरे जिस्म की उत्तेजना पहले जैसी नहीं रही। हम काफी करीब आते गये थें। मैं कभी कभी उसके घर भी जाने लगा था। उसने भी आना चाहा था पर मैं टालता रहा। अब उसे लेकर मैं पहले की तरह नहीं सोचता था। मैं उसे समझना चाहता था।
एक शाम टिनी का फोन आया था, ‘‘अंकल, माॅं को बुखार है, आप आ सकते हैं क्या?’’ कई दिन लग गये थें उसे ठीक होने में। मैंने उसकी खूब देखभाल की थी और वह मना भी नहीं करती थी। हमदोनों को ही अच्छा लग रहा था। इस दौरान मैंने कितनी बार उसे छुआ। दवा पिलाई, सहारा देकर उठाया-बिठाया पर मन बिल्कुल शांत रहा। एक दिन चाय पीकर एकदम मेरे पास बैठ गई उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कंधे से सिर टिकाकर बैठ गई। मैंने उसे अपने बाहों में भर लिया। कभी उसका हाथ तो कभी बाल सहलाता रहा। ये बड़ी स्निग्ध सी भावना थी। तभी मैं उठने लगा तो वह लिपट गयी मुझसे। पिंजरे से छूटे परिंदे की तरह। एक अजीब सी बेचैनी दोनों महसूस कर रहे थें। मैंने मुस्कुरा कर उसका चेहरा अपने हाथों में लिया कुछ पल उसे यूॅं ही देखता रहा और धीरे से उसे चूम लिया और घर आ गया। मैं बदल गया था क्या? सारी रात सुबह के इंतजार में काट दी। सुबह सम्पदा आॅफिस आयी थी। बदली-2 सी लगी वह। कुछ शर्माती सी, कुछ ज्यादा ही खुश। उसके चेहरे की चमक बता रही थी कि उसके मन की कोमल जमीन को छू लिय है मैंने। मुझे समझ में आ रही थी ये बात, ये बदलाव। उससे मिलकर मैंने ये भी जाना था कि कोई भी रिश्ता मन की जमीन पर ही जन्म लेता और पनपता है। सिर्फ देह से देह का रिश्ता रोज जन्म लेता है और रोज दफन भी हो जाता है। रोज़ दफ़नाने के बाद रोज कब्र में से कोई कब तक निकालेगा उसे। इसलिए जल्दी ही खत्म हो जाता है यह…… कितनी ठीक थी यह बात। मैं खुद ही मुग्ध था अपनी इस खोज से। फिर मन से जुड़ा रिश्ता देह तक भी पहुॅंचा था। कब तक काबू रखता मैं खुद पर। अब तो वह भी चाहती थी शायद…..। स्त्री को अगर कोई बात सबसे ज्यादा पिघलाती है तो वो है मर्द की शराफत, हाॅं अपनी ज़ज्बाती प्रकृति के कारण कभी-2 वह शराफत का मुखौटा नहीं पहचान पाती। उसका बदन तो जैसे बिजलियों से भर गया था। अधखुली आॅंखें, तेज सांसे, कभी मुझसे लिपट जाती तो कभी मुझे लिपटा लेती। यहाॅं-वहाॅं से कसकर पकड़ती सम्पदा जैसे आॅंधी हो कोई, या कि बादलों से बिजली लपकी हो और बादलों ने झरोखा बन्द कर लिया हो अपना, आज़ाद कर दिया बिजली को। कैसे आज़ाद हुई थी देह उसकी। कोई सीपी खुल गई हो जैसे और उसका चकमता मोती पहली बार सूरज की रोशनी देख रहा हो। सूरज उसकी आॅंखों में उतर आया और उसने आॅंखें बन्द कर लीं। जैसे एक मोती को प्रेम करना चाहिये वैसे ही किया था मैंने। धीरे-2 झील सी शांत हो गयी थी वह। बिजली फिर से लौड गई थी, पर मैं जानता था कि वह अब इतराती रहेगी, कैद नहीं रह सकती। वह देखती रही मुझे और मैं उसे।
इस वक्त तो मुझे खुश होना चाहिए था कि सम्पदा राय की देह मेरी मुट्ठी में थी। उसके जिस्म की सीढि़याॅं चढकर जीत हासिल की थी। ये मेरे ही शब्द थे शुरू-2 में। पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा। सम्पदा बिल्कुल भी वैसी नहीं थी, जैसा उसके बारे में कहा जाता था। यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था। मैं सोच रहा था कि क्यूॅं पुरूष सुन्दर औरत को कामुक दृष्टि से ही देखता है और जब स्त्री उन नजरों से बचने के लिए खुद को आवरण के नीचे छुपा लेती है तब वही पुरूष समाज उसे पा न सकने की कुंठा में कैसे-2 बदनाम करता है। यही हुआ था सम्पदा के साथ भी। पर जब मैंने उसके भीतर छिपी सरल, भोली और पवित्र औरत को जाना तब मैं मुग्ध था और अभिभूत भी…….।
सम्पदा ने धीरे से कहा, ‘‘अब तक तो खुले आसमान के नीचे रहकर भी उम्रकैद भुगत रही थी मैं। सारी खुशियाॅं, सारी इच्छाऐं इतने सालों से पता नहीं दे हके किस कोने में कैद थीं। तुम्हारा ही इंतजार था शायद।
और यही सम्पदा जिसने मुझे सिखाया कि दोस्ती के बीजों की परवरिश कैसे की जाती है। वह जा रही थी। उसी ने कहा था, इस परवरिश से मज़बूत पेड़ भी बनते हैं और पहकती नर्म नाजुक बेल भी।
‘‘तो तुम्हारी इस परवरिश ने पेड़ पैदा किया या फूलों की बेल?’’ पूछा था मैंने। यही सम्पदा जो मेरे वक्त के हर लम्हे में है। अब नहीं होगी मेरे पास। उसके पास आकर मैंने मन को तृप्त होते देखा है- मर्द के मन को। देह कैसे आजाद होती है जाना। पता चला कि मर्द कितना और कहाॅं-2 गलत होता है। मुझे चुप-2 देखकर उसकी दोस्त मीता ने एक दिन कहा था उससे क्यों कट रहे हो पृथक? उसे क्यों दुःख पहुॅचा रहे हो? इतने सालों बात उसे खुश देखा तुम्हारी वजह से। उसे फिर दुःखी न करो।’’ दोस्ती का बरगद बनकर मैं बाहर आ गया अपने खोल से। मैंने उसका पासपोर्ट, वीजा बनवाया। मकान-सामान बेचने में उसका हाथ बटाया। ढ़ेरों और काम थें जो उसे समझ नहीं आ रहे थें कि कैसे होंगे। मुझे खुद को भी अच्छा लगने लगा। वह भी खुश थी शायद……।
उस दिन हम बाहर धूप में बैठे थें। टिनी इधर-उधर दौड़ती हुई पैकिंग वगैरह में व्यस्त थी। सम्पदा चाय बनाने अन्दर चली गयी। बाहर आई तो वह एक पल मेरी आॅंखों में बस गया। दोनों हाथों में चाय की ट्रे पकड़े हुए, खुले बाल, पीली साड़ी में बिल्कुल उदास मासूम बच्ची लग रही थी। पर साथ ही खूबसूरत और सौम्य, शीतल चाॅंदनी के समान!
‘‘बहुत याद आओगे तुम’’ चाय थमाते हुए वो बोली थी। मैं मुस्कुरा दिया। उसके होंठ मुस्कुरा रहे थंे पर आॅंखें भरी हुई थी दर्द से प्यार से……। कई दिन से उसकी खिलखिलाहट नहीं सुनी थी। अच्छा नहीं लग रहा था। क्या करूॅं कि वह हॅंस दे? चाय पीते-2 धूप की गरमाहट कुछ कम हो गयी थी शायद, इसीलिए जमीन पर उतर रही थी……..
‘‘चलो सम्पदा एक छोटी सी ड्राइवर पर चलते है।’’
‘‘चलो’’ वह एकदम खिल गई। अच्छा लगा मुझे।
‘‘टिनी, चलो घूमने चलें,’’ मैंने बुलाया उसे।
‘‘नहीं, अंकल आप दोनों जाएॅं, मुझे बहुत काम है, और रात को हम इकट्ठे डिनर पर जा रहे हैं। याद है ना आपको?’’
‘‘अच्छी तरह याद है’’ मैंने देखा था कि वह हम दोनों को कैसे देखती रही थी। एक बेबसी सी थी उसके चेहरे पर। थोड़ा आगे जाने पर मैंने सम्पदा का हाथ अपने हाथ में लिया तो वह लिपट कर रो ही पड़ी। मैंने गाड़ी रोक दी। ‘‘क्या हो गया सम्पदा?’’ उसके आॅंसू रूक ही नहीं रहे थें।
‘‘मुझे लगा कि तुम अब अच्छे से नहीं मिलोगे, ऐसे ही चले जाओगे। नाराज़ जो हो गये थें। ऐसा लगा मुझे!’’
‘‘तुमसे नाराज़ हो सका हूॅ मैं कभी? नहीं रानी, कभी नहीं। मैं जब उसका बहुत लाड़ करता था तो यही कहकर सम्बोधित करता था। पे्रम में नाराज़गी तो होती ही नहीं, हाॅं रूठना-मनाना होता है। मैं क्या तुमसे तो कोई भी नाराज नहीं हो सकता। हाॅं, उदार जरूर होंगे सभी। जरा जाकर तो देखों दफ्तर में, बेचारे मारे-2 फिर रहे है।’’ वह मुस्कुरा दी।
‘‘अब अच्छा लग रहा है रोने के बाद? मैंने मज़ाक में कहा तो वह हॅंस दी। शाम की धूप खिली हो जैसे। सम्पदा मुझे आज धूप की तरह लग रही थी।
‘‘सम्पदा तुम ऐसे ही हॅंसती रहना, बिल्कुल सबकुछ भुलाकर समझीं?’’ उसने बच्ची की तरह हाॅ में सिर हिलाया।
‘‘और तुम? तुम क्या करोगे?’’
‘‘मैं तुम्हें अपने पास तलाश करता रहूॅंगा। रोज़ बातें करूॅंगा तुमसे। वैसे तुम कहीं भी चली जाओ, रहोगी मेरे पास ही।’’ मेरी आत्मा का हिस्सा हो तुम…… मेरा आधा भाग….. तुमसे मिलकर मुझमें मैं कहाॅं रहा? तुम मिली तो लगा अज्ञात का निमन्त्रण सा मिला मुझे।
‘‘और क्या करोगे?’’
‘‘और परवरिश करता रहूॅंगा उन रिश्तों की, जिनकी जड़े हम दोनों के दिलों में हैं।’’
‘‘एक गूढ़ अवमानना हो, कुछ जाना है कुछ जानना है
आदर्श हो, आदरणीय हो, चाहत हो स्मरणीय हो’’
वह चुम रही। मैं भी। मेरे प्यार, जो पिछले कई दिन से रात की रोशनी में किसी छाया की तरह लरज रहा था। अब स्थिर लग रहा था मुझे। मैंने सम्पदा से कहा भी, ‘‘जानती हो, तुम्हारे जाने के ख्याल से ही डर गया था। प्यार में जितना विश्वास होता है उतनी ही असुरक्षा भी होती है कभी-2। रोकना चाहता था तुम्हें इतने दिनों घुटता रहा पर अब….. अब सब ठीक लग रहा है……
सम्पदा शांत थी फिर जैसे कहीं खोयी-2 सी बोल रही थी ‘‘विवाहित प्रेमियों की कोई अमर कहानी नहीं है, क्योंकि विवाह के बाद काव्य खो जाता है, गणित शेष रहता है। गृहस्थी की आग में रोमांस पिघल जाता है। यदि सचमुच किसी से प्रेम करते हो तो उसके साथ मत रहो। उससे जितना दूर हो सके भाग जाओ। तब जिंदगी भर आप प्रेम में रहोगे। यदि प्रेमी के साथ रहना ही है तो एक दूसरे की अपेक्षा मत करो। एक दूसरे के मालिक मत बनो, बल्कि अजनबी बने रहो। जितने अजनबी बने रहोगे उतना ही प्रेम ताजा रहेगा। यह जान लो कि रोमांस स्थाई नहीं होता वह शीतल बयार की तरह है, जो आती है तो शीतलता का अनुभव होता है और फिर वह चली जाती है। प्रेम की इस क्षणिकता के साथ रहना आ जाए तो तुम हमेशा प्रेम में रहोगे। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर चूम लिया। वह मुस्कुरा दी। सम्पदा ने कार रोकने के लिए कहा। फिर बोली, ‘‘हर रिश्ते की अपनी जगह होती है। अपनी कीमत! जे तुम्हें पहले लगा वह भी ठीक था, जो अब लग रहा है वह भी ठीक है। पर एक बात याद रखना इस प्यार की बेचैनी कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। मुझे पाने की चाह बनी रहनी चाहिए दिल में…. क्या पता सम्पदा कब आ टपके तुम्हारे चैम्बर में…… कभी भी आ सकती हूॅ अपना हिसाब-किताब करने……. और वह खिलखिलाकर हॅंस दी।’’ पृथक, सेवा और शक्ति, खुद को भुला देना और एक कभी न बुझने वाली प्यास….. यही प्रेम का द्योतक है। शुद्ध पे्रम में वासना नहीं होती बल्कि समर्पण होता है। प्रेम का अर्थ होता है निःसीम त्याग। एक दूसरे के अस्तित्व को एक कर देना ही प्रेम है। प्रेम को समय नहीं चाहिए। उसे तो बस एक लम्हा चाहिए उस अधूरे लम्हे में युगों की यात्रा करता है और वो लम्हा कभी-2 पूरी जिन्दगी बन जाता हैे।’’ और मैं उसे देखता रह गया…… चुपचाप……!

 

- ज्योत्सना ‘प्रवाह’

मै ज्योत्सना प्रवाह विगत दस वर्षों से लेखन कार्य में संलग्न हूँ, मेरी कई कहानियाँ एवं आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जैसे मेरी सहेली, सरिता, गृह शोभा, अन्तरा,  साहित्य अमृत, हरिगंधा, कथा देश आदि में निरंतर छपती रही हैं, विगत तीन वर्षों से अन्तरा पत्रिका में मेरा स्तम्भ मनवा रे लगातार प्रकाशित हो रहा है, पायनीयर बुक कंपनी ने मेरी कहानी को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार भी दिया है |

सम्प्रति – गृहिणी हूँ 
जन्म – 06 जुलाई 
शिक्षा – इंटरमीडिएट 
महमूरगंज,वाराणसी, 221010 (उ.प्र.)    

3 thoughts on “एक अधूरा लम्हा

  1. बहुत ही खूबसूरत ढंग से एक सच्चे प्रेम का वर्णन किया गया है। जो दिल की भाषा में पूजनीय भी है। अच्छा लगा पढ़ कर।

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