उगते हुए को यूँ सूरज बनाना

स बात का बेहद अफ़सोस है कि तन से इतने उजले इंसान को काला साहब कहना लोगों को कैसे रास आ जाता है। जब वह अपनी छः फुट्टी कद-काठी पर झक्क सफेद कुर्ता और चूड़ीदार पाजामा डाल लेते हैं तो ऐसा लगता है जैसेकि सूरज की किरणों से रूपायित होकर कोई रोशनीनुमा बेहद चमकदार फ़रिश्ता लंबे-लंबे डग भरते हुए जमीन पर उतर आया हो। मतलब यह कि उन्हें कोई आदमी पहली बार देखते ही चिहुंक उठता है, संशय में अपने कान और सिर खुजलाने लगता है और उनसे कतराते हुए उन्हें सहमा-सहमा आँख-फाड़े देखता जाता है। कतराता इसलिए है कि उसे यह शुबहा होने लगता है कि कहीं वह किसी दूसरे ग्रह से उतर कर आया हुआ कोई तिलस्मी एलियन तो नहीं है। वैसे भी आजकल एलियन के अस्तित्व पर काफ़ी लोगों का विश्वास पुख्ता होता जा रहा है।

चुनांचे काला साहब के बारे में ऐसा कुछ सोचना फ़िज़ूल है। वह तो इसी दुनिया के हिंदुस्तान नामक देश में रहने वाले और साहित्य की सेवा में अपनी जान कुर्बान कर देने का ज़ज़्बा रखने वाले चुनिंदा और बेहद ज़िंदा-दिल इंसान हैं जो अपने बंदों के लिए कुछ भी कर-गुज़रने पर आमादा हो जाते हैं। अब देखिए ना, अपने बंटी के लिए उन्होंने अपना मन बना लिया है कि उसे एक नामचीन साहित्यकार बनाकर ही दम लेंगे। सो, उन्होंने अपने ही लब्धप्रतिष्ठ प्रकाशन केंद्र से जुगाड़ से लिखी हुई उसकी कुछ कहानियों के संग्रह के लोकार्पण की तैयारी में दिन-रात एक कर दिया है।

बहरहाल, देश के एकमात्र राष्ट्रीय साहित्य-सृजन केंद्र के मंच से वरिष्ठतम साहित्यकार नामधारी के हाथों बंटी भाई के पहले कथा-संग्रह के लोकार्पण की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। कोई महीने-भर पहले से ही काला साहब बंटी भाई के कथा-संग्रह को लेकर जितनी तन्मयता से उत्साहित हैं, उसका ब्योरा लफ़्ज़ों में नहीं दिया जा सकता। नामधारी सिंह और नृपेंद्र से मोबाइल पर बतकहियाते हुए वह बंटी के संग्रह की खूबियाँ और बारीकियाँ बयान करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। यों तो काला साहब का नामधारी और नृपेंद्र के साथ लेखकीय डाह के चलते छत्तीस का आँकड़ा रहा है और साहित्याकाश में बंटी के टिमटिमाने से पहले वह उनसे बात तक करना अपनी औकात के ख़िलाफ़ मानते रहे हैं; लेकिन, जब से उनके साहित्य-सृजन केंद्र में बंटी का प्रवेश हुआ है, उन्होंने दोनों के प्रति ईर्ष्या के भाव को तिलांजलि दे दी है। अब तो सुरा और सुंदरी का सेवन करने के बाद जैसे ही वह अपने चेहरे पर रोमानी सुरूर लादे हुए मंच पर माइक सम्हालते हैं, वह सबसे पहले नामधारी और फिर नृपेंद्र का ही प्रशस्तिगान करते हैं; उसके बाद, बंटी के साहित्यिक अवदान की प्रशंसा में नायाब कसीदे गढ़ते हुए उसे एवरेस्ट शिखर पर आसीन करने के लिए लच्छेदार भाषण से श्रोताओं पर भरपूर सम्मोहनी डालने की कोशिश करते हैं।

लीजिए, कोई ढाई घंटे और बचे हैं लोकार्पण समारोह की शुरुआत होने में। बाप-रे-बाप! इतने समय में क्या-क्या करें काला साहब? अरे, चमचे रह चुके उनके निकट-सहयोगी भी नदारद हैं। लिहाजा, हैरतअंगेज़ बात यह है कि बंटी का भी कहीं अता-पता नहीं है। शायद, वह अपनी किसी गर्ल-फ़्रेंड के साथ मोबाइल फोन पर चैट कर रहा होगा या किसी और के साथ किसी पार्क में व्यस्त होगा। पर, इस वक़्त तो उसे संज़ीदा होना चाहिए। बहुत मुमकिन है कि वह अपनी कहानियों के बाबत एक मसालेदार भाषण तैयार करने में जुटा हुआ होगा। अपनी पहली किताब पर पहली बार मंच पर बोलना है। यूं भी काला साहब का मानना है कि अगर कोई मामूली आदमी एक महान शख्सियत बनना चाहता है तो उसे आम आदमी के बीच बड़े इंतज़ार के बाद मुखातिब होना चाहिए और साधारण लोगों के साथ बहुत घुल-मिलकर भी नहीं रहना चाहिए; वरना, उसकी अहमियत कम हो जाती है और उसकी शख़्सियत लिज़लिज़ी हो जाती है। लगता है कि बंटी ने उनके इस सबक को अपने जीवन में उतारने की क़वायद शुरू कर दी है।

बहरहाल, काला साहब साहित्य-सृजन केंद्र से अब तक कोई बीस-पच्चीस बार अंदर-बाहर कर चुके है। बेशक, जब किसी अपने के लिए कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा उन पर सवार होता है तो उनकी बूढ़ी हड्डियों में अपार शक्ति समा जाती है। लोकार्पण की तैयारियों में वह इस कदर मशग़ूल हैं कि उन्हें यह भी ख़्याल नहीं है कि उन्होंने मौके के मुताबिक कायदे से इस्तरी किए हुए कपड़े भी नहीं पहन रखे हैं। सिर के पृष्ठ भाग में उलझे-गुलझे घुंघराले बालों पर कंघी भी नहीं कर रखी है। माशाल्लाह! पैरों में तो सिर्फ़ हवाई चप्पल ही है। क्या हो गया है काला साहब को? इतना तो उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में माशूकाओं और नाज़नीनों के लिए भी नहीं किया होगा! कहीं काला साहब पर इस बुढ़ापे में लेस्बियन बनने का खुमार तो नहीं चढ़ रहा है!

आख़िर, बंटी ने काला साहब पर कैसा मंतर फूँक रखा है कि उन्हें महीनों से बस, यही चिंता खाए जा रही है कि बंटी के बजाय कहीं कोई दूसरा कहानीकार मक़बूलियत हासिल करने में उससे आगे न निकल जाए? इसलिए, उन्होंने नृपेंद्र को महीनों से लल्लो-चप्पो में उलझा कर उन्हें किसी और युवा लेखक को एक नए प्रतिभाशाली कथाकार के रूप में लांच करने पर ब्रेक लगा रखी है क्योंकि नए साहित्यकार लांच करने में नामधारी और नृपेंद्र का कोई जवाब नहीं है। इसका मतलब साफ है कि इस दशक के सबसे ज़्यादा रेखांकित किए जाने वाले लेखकों में बंटी का नाम सबसे ऊपर लाने के लिए काला साहब कृतसंकल्प हैं। बस, उन्हें डर है कि कहीं नृपेंद्र ऐन-वक़्त पलटी न मार जाएं। नामधारी भी अभी तो उनकी हाँ में हाँ मिला रहा है; पर, पता नहीं कब वह भी अपनी तुरप चाल से काला साहब को शिकस्त देते हुए उनके मंसूबे पर पानी फेर दे? कहीं नृपेंद्र और नामधारी लोकार्पण के मंच पर ही कुछ ऊटपटांग़ न बोल जाएं जिससे कि बंटी के लिए उनके द्वारा अब तक आसमान-पाताल एक किए जाने की भगीरथी कोशिश बिरथा चली जाए। यों भी दोनों के सनक-मिजाज़ के बारे में कौन नहीं जानता?

सचमुच, बड़ी विकट परिस्थिति है काला साहब के सामने!

जहाँ तक नृपेंद्र जी का संबंध है, यह बात पत्थर पर खिंची हुई लकीर है कि वह जिस किसी को चाहें, उसकी ताज़पोशी कालजयी कहानियाँ लिखने वाले कथाकार के रूप में कर देते हैं और सारा लेखक समाज उसे स्वीकार कर लेता है। पाठक उसे हाथों-हाथ ले लेता है। प्रकाशक उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। जीवन लाल, चिरंजी प्रसाद, लीला रानी, रसिक नायक जैसे साहित्याकाश में चमकने वाले साहित्यकारों को चोटी पर बिठाने का श्रेय तो नृपेंद्र को ही जाता है। दरअसल, टिमटिमाने से बाज आ चुके ये चमके हुए साहित्यकार उनकी जबान में उनके ही ढर्रे पर लिखते-पढ़ते हैं। इनमें से हरेक लल्लो-चप्पो के फन में इतना माहिर था कि नृपेंद्र इनसे मिलते ही इन पर बेहद रीझ गए। उन्होंने अपनी लोकप्रिय पत्रिका ‘मयूर’ में उनका इतना ज़्यादा प्रशस्तिगान किया कि प्रकाशक और समीक्षक उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गए और उनकी कलम से जो कुछ भी अनाप-शनाप और कूड़ा-कचरा निकला, उसे छापते गए, छापते गए और उन नाचीज़ों को मंचों पर तथा पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा के घेरे में लाते गए।

अब यह गुण मदनलाल में रत्ती-भर भी नहीं है; इसलिए, वह पिछड़ गया। बहुत कुछ सार्थक तथा गंभीर लिखने और छपने के बावज़ूद वह चर्चा के घेरे में नहीं आ सका जबकि उसकी एक कहानी पिछले दशक बड़ी चर्चित हुई थी और राही तथा उत्पल जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों ने उसकी शैली और कथ्य की गहराई की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उसे सम्मानित भी किया था। पर, वही! ढाक के तीन पात। मतलब यह कि उस महत्वपूर्ण घटना के बाद न तो मदनलाल ने अपने वरिष्ठों की ज़रूरी चंपी-मालिश करनी शुरू की, न ही मंचों पर जा-जाकर उनकी पैलगी की। एकाध मर्तबे उसने साहित्यिक गोष्ठियों, कार्यक्रमों आदि में शिरक़त करने की ज़हमत भी उठाई; लेकिन, वहाँ पधारे लखकों को नेपथ्य में शराब पीते और शबाब का लुत्फ़ उठाते देख, उसका जी मतला-सा गया और वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। तभी से उसे साहित्यिक गलियारों में ऐसे माफिया साहित्यकारों के प्रति बड़ी जुगुप्सा पैदा हो गई है जो डपोरशंख लड़कियों को लेखिका के रूप में स्थापित करने का झाँसा देकर उन्हें पटाते हैं, अपनी हवस मिटाते हैं और उन्हें अपनी गर्ल-फ़्रेंड बनाकर साहित्यिक सम्मेलनों में शिरक़त करने के बहाने उनके साथ रोमांटिक यात्राएं करते हैं।

दरअसल, यहाँ मदनलाल की चर्चा छेड़ना इसलिए भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि उसकी कोई दर्ज़न-भर किताबें छपने के बावज़ूद उसका गंभीर लेखन आज भी मुकम्मल पहचान की मोहताज है। जब कभी बंटी का कंधा मदनलाल के कंधे से टकराता है तो वह उस पर व्यंग्य-बाण छोड़ने से बाज नहीं आता है। लेखक के रूप में पच्चीस सालों की लंबी कैरियर रखने वाला मदनलाल मन मसोस कर रह जाता है। आखिर, वह आज तक किसी समीक्षक को अपने लिए क्यों नहीं पटा सका? किसी संपादक की ख़ुशामद भी नहीं कर सका ताकि उसकी पत्रिका में उसका कोई साक्षात्कार छप जाए या उसकी किसी रचना पर चर्चा हो सके। लिहाजा, उसके मन में भी कभी-कभी इच्छा हुई कि वह गौतम और भरत जैसे ख्यातिलब्ध समीक्षकों को अपनी किताबें भेजकर और उनसे अपनी कहानियों और कविताओं की समीक्षा करवाकर उन्हें कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपवा सके। उनसे फोन पर बात भी उसने की; लेकिन, उन्होंने उसकी किताबों की समीक्षा करने से ही इनकार कर दिया। या, यूं कहिए कि उसे भाव देना ही फ़िज़ूल समझा। भाव देते भी कैसे? क्या कभी उसने उन्हें कोई पार्टी दी या रम की बोतल उनके ठिकानों पर पहुँचाई? किसी मयखाने में उनके साथ दो-चार बैठकी की होती और किसी खूबसूरत चेहरे से उनका दीदार कराया होता। साहित्यिक गलियारों में अपनी तूती बोलवाने के लिए इतने सस्ते में कुछ नहीं होने वाला। मर-पिचकर दिन-रात लिखने और सिर्फ़ लिखने जैसा चूतियापा करने से क़िस्मत बुलंद कभी नहीं होती। इसके लिए तिकड़म और जुगाड़ चाहिए जो निखट्टू मदनलाल से कभी नहीं होने वाला।

पर, आज इस लोकार्पण समारोह में श्रोताओं की पंगत में कोने में बैठे मदनलाल को देख, बेहद अचंभा हो रहा है। शायद, बंटी ने ही उसे यहाँ निमंत्रित किया हो क्योंकि ऐसे समारोहों में भीड़ जुटाने के लिए ख़ुद लेखक को मशक्कत करनी पड़ती है। बेशक, भीड़ देखकर ही नामचीन लेखक की लोकप्रियता का पता चलता है। टी.वी. चैनलों के कैमरों में कैद भीड़ को टी.वी. पर दिखाकर किसी लेखक के बड़े होने का अंदाज़ा लग पाता है। अन्यथा, पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले लेखकों को कौन पूछता है? आए राम, गए राम के अंदाज़ में कितने मदनलाल आए और कितने चले गए! वास्तव में, ज़्यादा लिखने के बनिस्बत मक़बूल होने की जुगाड़बाजी में अधिक समय खर्च करना चाहिए और यही मंत्र काला साहब ने बंटी को दिया है जो सौभाग्य से इस पर बड़ी गंभीरतापूर्वक अमल कर रहा है। बुड़भक मदनलाल यह मंत्र कभी नहीं सीख सका।

बहरहाल, हो सकता है कि मदनलाल को जलाने के लिए ही बंटी ने उसे इस साहित्यिक जलसे में बुला रखा हो। लेकिन, यह तो तय है कि लेखक के रूप में सिर्फ़ नाम से थोड़ी-बहुत पहचान बनाने वाले मदनलाल को चेहरे से कोई नहीं पहचानता। उसके चारों ओर बैठे दूसरे दर्शकों से लोग-बाग हैलो-हॉय तो कर रहे हैं लेकिन मदनलाल को पूछने वाला कोई नहीं है। वह अपनी इस स्थिति पर बेहद मायूस हुआ जा रहा है।

तभी उसका ध्यान भंग हुआ। उसे बड़ा आश्चर्य-सा हुआ क्योंकि सभागार में अभी-अभी तशरीफ़ लाए बंटी ने उसके कंधे को पीछे से झंकझोरकर अपने साथ-साथ चल रहे काला साहब से उसका परिचय कराया–

“काला साहब! आपसे मिलिए…”

“आपकी तारीफ़?” काला साहब की इस उम्र में भी आबाद बत्तीसी झाँकने लगी।

“अरे, आप इनको नहीं पहचानते? ये हैं मदनलाल। कभी ये भी बड़े लिक्खाड़ किस्म के लेखक थे। इन्होंने इतना लिखा कि कबाड़ी वाले इनकी रद्दियाँ खरीद-खरीद कर धन्ना-सेठ हो गए। पर, आजकल ये लिक्खाड़ीगिरी से तौबा कर चुके हैं। लिहाज़ा, ये कहानियों की सेंचुरी और कविताओं की डबल-ट्रिपल सेंचुरी लगा चुके हैं, नाटक और व्यंग्य के साथ-साथ दूसरी विधाओं में भी हाथ साफ़ करते हैं। अंग्रेज़ी में भी लिखने का दम भरते हैं। पर, शुरू से ही इनकी मंदी का दौर चल रहा है, च्च-च्च-च्च! यों तो आज भी लिख रहे हैं, लेकिन इन्हें न तो कोई पाठक न ही कोई प्रकाशक भाव दे रहा है…”  बंटी ने काला साहब पर नज़र टिकाते हुए पहले आँख मारी, फिर वह ठठाकर हँसने लगा।

“अच्छा?” जब काला साहब ने मदनलाल को ग़ौर से आँखें फाड़कर देखा तो उसने उठकर हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया। आख़िर वह जो इतने नामचीन शख्सियत काला साहब से रू-ब-रू हो रहा था।

“मदन भाई! आज की तारीख में कूड़ा-कचरा लिखने वाले को कोई नहीं पूछता। अब देखो, अब तक मैंने कुल सोलह कहानियाँ ही लिखी हैं जिन्हें पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। सोलह कहानियों वाली उसी किताब का आज लोकार्पण है। बड़े-बड़े कद्दावर लेखक आज इस पर चर्चा करेंगे। नामधारी और नृपेंद्र लोकार्पण करेंगे, गौतम भाई समीक्षा पढ़ेंगे और भरत भाई मेरी कहानियों पर अपनी विशिष्ट राय देंगे। उधर मीडिया वाले भी आए हैं; आज शाम को टी.वी. पर समाचार और कल सुबह अख़बार देखना बिल्कुल मत भूलना।” बंटी अपना सीना फुलाते हुए काला साहब के साथ मंच की ओर बढ़ गया।

बंटी के अचानक उवाच से मदनलाल एकदम सकपका गया। उसे उसका आशय अच्छी तरह समझ में नहीं आया। बहरहाल, उसके द्वारा कोई प्रतिक्रिया किए जाने से पहले ही वह तेज कदमों से काला साहब के साथ आगे मंच की ओर बढ़ गया।

 

कार्यक्रम का आग़ाज़ हो चुका है। दीप प्रज्ज्वलित किए जाने के बाद राजधानी से चुनकर लाई गई बेहद खूबसूरत लड़कियों की निराला द्वारा रचित सरस्वती गान ‘वर दे, वीणावादिनी, वर दे’ की संगीतमय प्रस्तुति से सारा माहौल रोमांचित हो उठा। दरअसल, जितना उनके सुरीले गीत से माहौल खुशनुमा नहीं  हुआ था, उससे कहीं ज़्यादा उनके अधखुले कमनीय अंग-प्रत्यंग और सेक्सी हाव-भाव से मंचासीन अतिथि और दर्शक प्रभावित हुए।

नृपेंद्र का ध्यान उनके कमनीय बदन से तब हटा जबकि मंच का संचालन कर रहे सुदर्शन भाई ने डायस पर माइक सम्हाला।

“अब मैं हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक-समीक्षक नृपेंद्र जी, नामधारी जी और सभी वरिष्ठ लेखकों से आग्रह करता हूँ कि वे मंच पर आकर बंटी भाई के कहानी-संग्रह ‘नया ब्राह्मण’ का लोकार्पण करें।”

मदनलाल चौंक गया। पुस्तक का नाम सुनकर तो उसके कान खड़े हो गए, ‘अरे, इस शीर्षक से तो मैंने कुछ महीने पहले एक कहानी ‘मयूर’ पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजी है।’ वह कुर्सी पर बैठे-बैठे भुनभुनाकर रह गया। फिर, वह सोचने लगा कि ऐसा संयोग ही हो सकता है कि उसकी कहानी का शीर्षक और बंटी के संग्रह का शीर्षक एक ही हो; हाँ, ऐसा तो प्रायः होता आया है। यूं भी उसने अपनी कहानी का कोई कॉपीराइट तो करा नहीं रखा है। बहरहाल, अगर बंटी ने यह शीर्षक उसकी कहानी से चुराई है, तो बेशक, उसकी यह नादानी होगी या कूपमंडूकता। चुनांचे, अगर बंटी उससे अनुरोध करता कि मदन भाई, उसकी किताब के लिए कोई बढ़िया शीर्षक बताओ तो वह इससे भी अच्छा शीर्षक उसे सुझा देता।

पुस्तक का लोकार्पण होने के बाद, सुदर्शन भाई ने मंच पर फिर अपनी उपस्थिति दर्ज़ की, “अब वरिष्ठ समीक्षक-आलोचक गौतम जी ‘नया ब्राह्मण’ कथा-संग्रह के संबंध में आपसे दो शब्द कहेंगे।”

चुनिंदा पत्रकार और फोटोग्राफर ठीक मंच के सामने आकर मंचासीन वरिष्ठ साहित्यकारों और माइक पर तैनात गौतम जी के कई फोटोग्राफ लिए। तदुपरांत, गौतम जी ने बंटी के कथा-संग्रह का शीर्षकवार परिचय दिया और उसकी कहानियों में कई विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसके कालजयी होने की बात बार-बार कही। उनके बाद, हिंदी के वयोवृद्ध समीक्षक आलोचक भरत जी ने संग्रह में शामिल सभी कहानियों के कथानक पर बारी-बारी से संक्षेप में प्रकाश डाला। मदनलाल को बेहद आश्चर्य हो रहा था कि उसने संग्रह में शामिल ज़्यादातर कहानियों को विभिन्न पत्रिकाओं में पढ़ा है लेकिन, उसकी अपनी कहानी ‘नया ब्राह्मण’ का कथानक तो बिल्कुल उसके द्वारा लिखी गई कहानी से मेल खा रहा है। बंटी की कहानी में एक ब्राह्मण पात्र शूद्रों की बस्ती में रच-बसकर दलितों की सेवा का बीड़ा उठाता है और शूद्रों में आई राजनीतिक जागरुकता के काराण सियासी साज़िश का शिकार बन जाता है तथा सपरिवार क़त्ल कर दिया जाता है। मदनलाल की कहानी में भी यही होता है; बस, फर्क ये है कि स्वेच्छा से बौद्ध बन चुके एक ब्राह्मण को उसके ही घर में क़ैद करके सपरिवार जलाकर मार दिया जाता है। क्षेत्रीय राजनीति के जरिए नेता बने बाहुबली तत्व जातीय और सांप्रदायिक तत्वों के साथ सांठगांठ करके इन्सानियत की सारी हदें लांघ जाते हैं। बेशक, यह संयोग नहीं है कि दोनों कहानियों में इतनी समानताएं एक-साथ हों। बंटी ने ज़रूर थोड़ा-बहुत रद्दो-बदल करके उसकी ही कहानी को अपनी कहानी बनाकर इस संग्रह में डाला होगा।

मदनलाल का सिर भन्नाने लगा। उसका जी कर रहा था कि वह चींख-चींख कर वहाँ उपस्थित सभी दर्शकों को यह सच बता दे कि बंटी ने उसकी ही कहानी को इस संग्रह में अपने नाम से छपवाया है। इतना ही नहीं, इस संग्रह की दूसरी कहानियाँ भी दूसरे लेखकों से चुराई हुई सी लगती हैं। तो क्या यह सब काला साहब, नृपेंद्र, नामधारी आदि जैसे वरिष्ठतम माने जाने वाले साहित्यकारों की मिली-भगत से हो रहा है? क्या आज के चर्चित ज़्यादातर लेखकगण भी इसी बंटी की भाँति साहित्य-जगत में आए हैं? अरे, मंच पर आसीन ये वरिष्ठ साहित्यकार साहित्य-जगत के ख़तरनाक़ माफ़िया हैं! इनसे बड़े अपराधी और कौन हो सकते हैं जिनकी वज़ह से बेहद उम्दा साहित्य लिखने वाले लेखक या तो एक सिरे से नकार दिए जा रहे हैं या उन्हें उपेक्षित कर दिया जा रहा है? तभी तो हिंदी साहित्य और भाषा का देश-देशांतर में इतना छीछालेदर हो रहा है और पश्चिमी भाषाओं का घटिया और छिछला साहित्य ही पाठकों को मिल पा रहा है। इसका दुष्परिणाम आज साफ दिखाई दे रहा हैः हिंदी के किसी भी साहित्यकार को नोबेल जैसा कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मान नसीब नहीं हो सका है। ओफ़्फ़! हिंदी साहित्य में चल रहे माफ़ियागिरी के इस धंधे के कारण हमारे समाज का क्या हश्र हो रहा है? युवा पीढ़ी पश्चिम के प्रभाव में परोसे जा रहे अश्लील साहित्य की दीवानी होती जा रही है। वह टी.वी. और कंप्यूटर की वल्गैरिटी में आकंठ डूब चुकी है। एन्ड्रॉयड मोबाइल फोनों के ‘वाट्स ऐप्स’ और इंटरनेट पर फल-फूल रही फ़ेसबुकिया साहित्य की छिछली संस्कृति में सारा समाज निमग्न होता जा रहा है। क्या इन माफ़ियाओं के कुकृत्यों के चलते हिंदी साहित्य राष्ट्रीय जन-जीवन को प्रेरित करने से वंचित रह जाएगा? हे ईश्वर! क्या साहित्य का यही हश्र होना है?

आत्म-मंथन के ज्वारभाटे से मदनलाल का सिर लगभग फटने-सा लगा। उसे लगा कि जैसे वह खुद पर से अपना आत्म-नियंत्रण खो देगा। उसने अपनी सीट के हत्थे को जोरों से पकड़े रखा। तभी वह अचानक खड़ा हो गया। वह मंच पर तेजी से भागा और बंटी के संग्रह पर बेबाक टिप्पणियाँ दे रहे समीक्षक गौतम से माइक छीनकर और डॉयस पर हाथ पटककर चींखने लगा, “ज़नाब! बंटी का यह कहानी संग्रह साहित्य के माफ़ियाओं की साज़िशों के चलते जमीदोज़ हो चुके बेहद उम्दा कहानीकारों से चुराई गई कहानियों का संग्रह है। मेरी बात पर यकीन कीजिए, इस संग्रह में मेरी भी एक कहानी है जिसे बंटी ने बड़ी सफाई से अपने नाम से इसमें डाला है। कथाकार का तग़मा पहनने की ख़्वाहिश पालने वाला बंटी साहित्य-जगत का सबसे बड़ा ग़ुनहगार है…”

मंच पर और दर्शक दीर्घा में अफ़रातफ़री-सी हो गई। पर, इसके पहले कि मदनलाल अपनी बात को जारी रख पाता, कुछ मुस्टंडे नौजवान उसे घसीटते हुए सभागार से बाहर ले गए। तदनन्तर, सुदर्शन साहब ने फिर से माइक सम्हाल लिया, “बंधुवर, मुझे यह कहते हुए अत्यंत खेद हो रहा है कि जो शख़्स अभी मंच पर पागल कुत्ते की माफ़िक आकर कथाकार बंटी के बारे में ऊटपटांग टिप्पणियाँ कर रहा था, वह एक सिरफिरा फ़्रस्ट्रेटेड आदमी है। उसकी दिमाग़ी हालत दुरुस्त नहीं है। उसका साहित्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है। बताया जाता है कि वह कई मंचों पर इसी तरह की हरक़त पहले भी कर चुका है। इसलिए, आइंदा इस बात पर ख़ास ध्यान दिया जाएगा कि यह सिरफिरा फिर कभी ऐसे आयोजन में मौज़ूद न हो। पता नहीं कहाँ से ऐसे ज़ाहिल लोग रंग में भंग डालने चले आते हैं?”

उसके बाद आयोजन का सफल समापन अपने नियत कार्यक्रम के अनुसार हुआ।

उसी शाम, 8 बजे, दूरदर्शन पर एक विचार-मंच का आयोजित हुआ जिसमें काला साहब समेत उन सभी वरिष्ठ साहित्यकारों और समीक्षकों ने शिरक़त की। लंबी बहसा-बहसी और पत्रकारों द्वारा साहित्यकारों की खिंचाई हुई। हैरतअंगेज़ बात यह थी कि उक्त विचार-मंच में मदनलाल ने सरेआम यह बात स्वीकार करते हुए कहा, “बंटी के संग्रह में सारी कहानियाँ उसकी अपनी मौलिक कहानियाँ हैं। दरअसल, कभी मुझ पर भी कहानियाँ लिखने का ज़ुनून सवार हुआ था। पर, मैं एक भी कहानी नहीं लिख पाया। अपनी इसी फ्रस्ट्रेशन की वज़ह से जब मैं ऐसे साहित्यिक कार्यक्रमों में उपस्थित होता हूँ तो मैं स्वयं पर से अपना नियंत्रण खो बैठता हूँ और ऊल-ज़ुलूल हरक़त कर बैठता हूँ। इसलिए, लोकार्पण समारोह में अपनी बदतमीज़ी के लिए मैं न केवल बंटी और इन भीमकाय साहित्यकारों से, बल्कि सभी देशवासियों से भी सरेआम माफ़ी का दरख़्वाश्त कर रहा हूँ।”

दूसरे दिन, मदनलाल अपनी सारी रचनाएं और प्रकाशित पुस्तकें रद्दीवाले की दुकान पर बेंचकर अपने ननिहाल खेती के जरिए जीवनयापन करने के लिए स्थायी रूप से प्रवास कर गया जैसाकि उससे बार-बार ननिहाल से भी उसके मामा द्वारा निर्देश दिया जाता था कि साहित्यकार बनने के सनक में उसकी सारी ज़िंदगी बेकार जा रही है।

 

 

- डॉमनोज मोक्षेंद्र

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र  {वर्ष २०१४ (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके   पूर्व ‘डॉ. मनोज श्रीवास्तव’ के नाम से लिखता रहा हूँ।}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल–जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ’ नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह–प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह–ऑनलाइन गाथा, 2014); 9–मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति

–अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

–Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

–इन्टरनेट पर ‘कविता कोश’ में कविताओं और ‘गद्य कोश’ में कहानियों का प्रकाशन

–महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट ‘हिंदी समय’ में रचनाओं का संकलन

सम्मान: ‘भगवतप्रसाद कथा सम्मान–2002′ (प्रथम स्थान); ‘रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान–2012′; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार ‘बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक’ घोषित; ‘गगन स्वर’ संस्था द्वारा ‘ऋतुराज सम्मान-2014′ राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक  द्वारा ‘साहित्य-भूषण सम्मान’; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

“नूतन प्रतिबिंब”, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका वी-विटनेस” (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

‘मृगमरीचिका’ नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से  प्रकाशित

आवासीय पता: विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत.

सम्प्रति: भारतीय संसद में प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

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