ईमानदारी की बीमारी

दुःखद! हर बात का होने से पहले ही पता होने वाले उनको अबके इस बात का कतई पता न चला कि कब कैसे सारे प्रिकॉशन लेने के बावजूद भी उनके स्वस्थ दिमाग में बिना किसी सूचना के ईमानदारी के रोग का कीटाणु एंटर कर गया। यह बात दूसरी है कि उनकी बीवी बहुत पहले ताड़ गई थी कि अब वे पहले जैसे स्वस्थ नहीं दिख रहे। उनका बिहेव दिन पर दिन भ्रष्टाचार के प्रति बदल सा रहा है। पर पता नहीं क्या सोच कर कभी न चुप रहने वाली क्यों चुप रही।

और तब उनकी मेज के नीचे से कल कल भ्रष्टाचार की बहती गंगा होने पर भी उनका मन धीरे धीरे उसमें डुबकी लगाने से डरने लगा। उन्हें लगा ज्यों अब भ्रष्टाचार की गंगा में नहाना बेकार है। 

 मित्रो! आप तो जानते ही हैं कि बीमारियों के कीटाणुओं में सबसे खतरनाक कीटाणु ईमानदारी की बीमारी का ही है, जिसका इलाज आज भी स्वर्ग तक के दवाखाने में नहीं। वैज्ञानिक जितने मर्जी दावे करते रहें तो करते रहें कि उन्होंने ईमानदारी के कीटाणु पर एक सौ एक प्रतिशत विजय प्राप्त कर ली है । अब वह दिन दूर नहीं जब हर दिमाग ईमानदारी मुक्त हो जाएगा ,पर उसके बाद भी वह किसी न किसीको तंग करता इधर उधर दिख ही जाता है।

दोस्तो! यह भी सच है कि सोए बूढे शाकाहारी शेर के बंद मुंह के आगे जो उसका शिकार आ जाए तो वह भी मांसाहारी होते देर नहीं लगाता पर…. उन्होंने शायद यह सपने में भी कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन कमाऊ पद पर पदासीन होने के बाद भी ईमानदारी का यह बेक्टेरिया उनके लिए  उनकी बीवी से भी अधिक जान लेवा सिद्ध होगा।

उनके किराए के कमरे और ऑफिस के बीच मंदिर पड़ता था। ईमानदारी के रोग के शुरूआती दिनों  में भी वे जब सुबह शाम मंदिर के सामने से ऑफिस को जाते आते भगवान की मूरत के आगे खाली हाथ सिर झुकाते तो पुजारी तो उन्हें घूरता ही, भगवान भी उन्हें मन ही मन उनको हो रही इस असाध्य बीमारी को लेकर परेशान हो उठते।

देखते ही देखते उनका ईमानदारी का रोग जब अगली स्टेज पर गया तो उनका मन उनकी कुर्सी पर आए से कुछ लेने के बदले उसे कुछ देने को करता, उसका काम करने के बाद वे उसे चाय पिला मुस्कुराते हुए अपने ऑफिस के मेन गेट तक उसके लाख इनकार करने के बाद भी विदा कर ही चैन की संास लेते। जो कोई जबरदस्ती उनके आगे काम के बदले गलती से कुछ रखने लगता तो उनका सिर चक्कराने लगता, आंखों के आगे अंधेरा सा छाने लगता। 

और एक दिन जब उनको ऑफिस में मुफ्त में लोगों के काम करते करते घंटे में ही एक साथ चार बार ईमानदारी की बीमारी के दौरे पर दौरे पड़े तो उनकी साथ वाली कुर्सी पर बैठे मीटर भर लंबी जीभ वाले ने, दिन में जितनी बार मौका लगे कैंटीन से मुफ्त के दूध के साथ बेईमानी के मल्टीविटामिन कैप्सूल लेने वाले उनके सहयोगी ने, जो उन्हें सरेआम हरदम ईमानदारी का रोग पालने के लिए गालियां देता रहता था, ने उन्हें खुलकर गालियां देते उनसे एकबार फिर हमदर्दी जताते तत्काल अपना भ्रष्टाचार का नया ब्रांडेड जूता अपने दाएं पांव से निकाल उन्हें सूंघाने के बाद जब उनको होश आया तो भ्रष्टाचार के चरण पखारते उन्हें फिर समझाया ,‘ बंधु! समझते क्यों नहीं यार? बेईमानी की कोई हद हो या न, पर ईमानदारी की एक हद जरूर होती है। इतने एजुकेटिड होने के बाद भी आखिर ये ईमानदारी का रोग क्यों जानबूझ कर पाल क्यों अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हो? ऑफिस में पांव पर कुल्हाड़ियां मारने वाले पहले ही क्या कम हैं ? डियर! तुम्हारी वो सारी डिग्रियां नकली तो नहीं हैं कहीं? मुझे तो शक होता है तुम्हारी डिग्रियों पर, बुरा मानों या भला।  सलाह देता हूं ,इस रोग को पालने से तो अच्छा  है घर में दो चार सूअर पाल लो, गधा पाल लो । यार! तुम मंदिर के पार्ट टाइम पुजारी नहीं ,सरकारी ऑफिस के परमानेंट कर्मचारी हो। यहां तो पुजारी भी भगवान के दर्शन पैसे लेकर करवाता है। इसलिए परमानेंट कर्मचारी होने के नाते रिश्वत लेना तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। कान खोल कर सुनो, सूखी चपातियों से शरीर पर  कभी चर्बी नहीं चढ़ा करती। अगर तुम रिष्वत नहीं लोगे तो हम तो तुम्हें कभी माफ करेंगे ही नहीं, भगवान भी तुम्हें माफ नहीं करेगा।

तुम सोच रहे होंगे कि जिंदगी भर ईमानदार रहने के चलते मरने के बाद तुम्हें स्वर्ग मिलेगा? तो सोचते रहो। ईमानदार लोगों के लिए क्या स्वर्ग, क्या नरक! जो यहां पर  भी मौज नहीं कर सका वह स्वर्ग में कौन सा तीर मार लेगा? इसलिए मेरी मानों तो अपने उस नौटंकी की तरह मौज मस्ती की आदत डालो। तभी स्वर्ग में भी मौज मस्ती कर पाओगे। हमारा क्या! हमने तो यहां भी जनता के सिर पर मौज की है, नरक मिला तो नरक में भी में भी मौज मस्ती का तरीका निकाल ही लेंगे। क्योंकि शक्कर खोरे को शक्कर हर जगह मिल ही जाती है। हो तो तुम पूरे  चिकने घड़े यार, पर अब खुदा के लिए प्लीज सोसाइटी में अपनी नाक और मत कटवाओ। मुझे तुम्हारी नक पर बहुत तरस आता है। खैर, हमारी तो तुम जनता के काम फ्री में कर रोज नाक कटवाते ही हो। पर हमारी नाक भी बहुत बेशर्म है दोस्त! बिल्कुल तुम्हारी ही  तरह। दिन में दस बार कटने के बाद भी अगली सुबह कटने को फिर खुशी खुशी तैयार हो जाती है।

देखो दोस्त! इससे पहले की तुम्हारी ईमानदारी की बीमारी लाईलाज हो जाए , चुपचाप  हराम के दाम लेने शुरू कर दो और…. कल को बच्चे भी कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाने हैं। उनके विवाह कराने हैं…  किराए के कमरे में कब तक पड़े पड़े मकान मालिक की गालियां सुनते रहोगे? ये दौर पांव के नीचे जूतों का नहीं, पांव के नीचे लग्जरी गाड़ी का है। मौका हाथ से निकल जाने के बाद पछताए तो क्या पछताए? अभी तो लोग तुम पर ही थूक रहे हैं, मरने के बाद भी थूकेंगे, तुम्हारी अर्थी पर – कि देखो! एक ईमानदार कर्मचारी की अर्थी गौर से देखो। मुआ मरने के बाद भी अपने लिए श्मशान तक गाड़ी का इंतजाम न कर सका। जिंदा रहते औरों के कंधों का भार बनना उतना नहीं कचोटता जितना मरने के बाद औरों के कंधों का बोझ बनना आत्मा को कचोटता है दोस्त!  अपने यथार्थवादी सहयोगी द्वारा हद से अधिक कोसे जाने पर आखिर उनको शर्म आ ही गई और अगले दिन वे बीवी के साथ सरकारी अस्पताल में अपनी ईमानदारी की बीमारी का इलाज करवाने डरते डरते पहुंच ही गए। बीवी ने उनकी ही जेब से पचास पचास मारे जोड़ अपने पर्स से पांच सौ निकाले और उनकी आंखों के सामने उन्हें नचा उनको धकियाती ऑटो रिक्शा में बिठा सरकारी अस्पताल जा पहुंची।

बड़ी देर से ओपीडी में एक ओर बड़ी देर तक डॉक्टर साहब एमआर से उसकी दवाइयों को लिखने का मोल भाव कर रहे थे तो दूसरी ओर उतनी ही देर से ओपीडी के दरवाजे पर एक मरीज चीख चिल्ला रहा था, पर उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। कमीशन भगवान तक का ध्यान भंग नहीं कर सकती।  और वे तो ठहरे एक जैसे अस्पतालों के एक प्रोफेशनल डॉक्टर।

असल में, वे दर्द से चीखते मरीज ओर ध्यान देते तो कमीशन की बात अधूरी रह जाने का डर था। जब कमीशन की डील फाइनल हुई तो डॉक्टर साहब ने चैन की लंबी सांस लेते अपने आप से कहा,‘ ओह गॉड! दिमाग खाकर रख दिया था इस साले एमआर ने भी। साला तीस परसेंट में अपनी नकली दवाई मरीजों को मेरे हाथों से दिलवा मेरे हाथों पाप करवाना चाहता था! कमीशन ऐसे डर डर कर दे रहा था जैसे ऊंट के मुंह में जीरा डाल रहा हो,’ बात  फिफ्टी परसेंट पर फाइनल हुई  तो उन्हें अपने डॉक्टर होने का अहसास हुआ ,‘ अबे! किसको ज्यादा ही तकलीफ हो रही थी? ऐसे चीखना हो तो घर में रहा करो। पता नहीं है, सरकारी अस्पताल में चीखना चिल्लाना मना है। अस्पताल में चीखने से मरने वालों की शांति भंग होती है। पर इन्हें क्या!  साले बेड पर तो चिल्लाते ही रहते हैं, धंधे के बीच में भी चिल्लाते रहते हैं। इस देश में जनता को चिल्लाने के सिवाय जैसे दूसरा कोई काम ही नहीं है। जो ठीक हैं , वे रोटी कपड़े को चिल्लाते हैं और जो बीमार हैं वे दवाई को। क्या हो गया था तुझे?’

डॉक्टर साहब ! पेट में बहुत दर्द हो रहा है?’

मर तो नहीं रहा है न? टांग आगे करो अपनी।डॉक्टर साहब उसकी टांग की ओर लपके।

पर साहब! दर्द तो पेट में है!रोगी सहमा।

डॉक्टर तू है या मैं? हर किस्म की दर्द टांग से चलकर ही बॉडी में एंट्री मारती है, समझा? मरना है क्या? पता नहीं कहां कहां से अस्पताल में मरने चले आते हैं?’

 मैं दवाई खाए बिना नहीं मरूंगा डॉक्टर साहब!

क्यों?’

शास्त्रों में लिखा है कि जो कलियुग में डॉक्टर की दवाई खाए बिना मरेगा वह नरक को जाएगा। और मैं नरक में जाना नहीं चाहता। यहीं बहुत नरक भोग लिया डॉक्टर साहब!

कर टांग अपनी आगे… देखो तो टांगें अपनी? इन पर स्वर्ग तो क्या, घर तक नहीं जा पाओगे,’  डॉक्टर साहब ने देखते कहीं और, चेक करते कहीं और उसकी टांग चेक की और पलक झपकते तय कमीशन वाली दवाई उसे लिख दी। चार दिन तक वह उस दवाई को पूरी आस्था से खाता रहा और पांचवें दिन बिना दर्द मोक्ष को प्राप्त हुआ। मरने वाले की आत्मा को भगवान शांति प्रदान करें।

 उनकी बारी आई तो डॉक्टर साहब ने दूर से ही मुस्कुराते हुए उनकी बीवी से पूछा,‘ प्लीज! क्या बीमारी है मैडम आपको?’

इससे पहले कि वे कुछ कह पाते, उनकी बड़बोली बीवी ने अपने बीमार पति को डॉक्टर साहब के आगे कइयों को परे धकेलते यों खड़ा कर दिया ज्यों कोई बकरे को कसाई के आगे खड़ा कर देता है,‘ मुझे नहीं,  ईमानदारी की बीमारी है इन्हें डॉक्टर साहब!सुन डॉक्टर साहब कुछ कुछ कुम्हलाए।

 कब से?’ उन्होंने अपेन दिल को जैसे कैसे काबू कर नार्मल होने की कोशिश की। 

पांच साल से।

तो अब याद आई मेरी??’ सुन उनकी बीवी पानी पानी हुई।

क्या करते हैं ये?’

 सरकारी नौकरी में हैं।

 उसके बाद भी एचबी इतना कम? हद है यार! तुम ऑफिस में करने क्या जाते हो? अगर ऐसे ही नौकरी करोगे तो आई एम सॉरी टू से दैट जेंटलमैन….  कुछ भी हो सकता है। आदर्श बीवी होने के नाते आपने इन्हें इस बीमारी से बचने को नहीं कहा कभी?’

बहुत कहा सर पर….उनकी बीवी को उनकी बेइज्जती करने का एक और मौका अवेल करने को हाथ लगा तो वे अबके भी न चूकी।

 हद है यार! भगवान से तो डरते नहीं,पर बीवी से भी डरते? पहला बंदा देख रहा हूं इस धरती पर जो बीवी से नहीं डरता। बीवी से न डरना अच्छी बात है, पर सरकारी नौकरी में होते ईमानदार रहना बिल्कुल अच्छा नहीं। पता है सरकारी नौकरी करते हुए जो ईमानदार रहते हैं , कहां जाते हैं?’

कहां??’ उनकी बीवी ने उनको घूरते हुए पूछा।

नरक में? अपनी चिंता नहीं तो यार कम से कम अपनी बीवी की तो सोचो। जवानी में भी चेहरा कैसे छाइयों से भरा है? उसे बेकार में एक जन्म में क्यों दो बार नरक की सजा दे रहो हो? इनके घर में पहले भी कोई ईमानदार रहा है क्या? मेरा मतलब, मैं इनकी बीमारी की पूरी हिस्ट्री जानना चाहता हूं। कहीं यह हिरैडिटरी बीमारी तो नहीं?’ डॉक्टर साहब की उनकी बीमारी में पता नहीं क्यों उत्सुकता जगी।

 डॉक्टर साहब! जब इनकी ही कोई हिस्ट्री नहीं तो इनके खानदान की क्या खाक हिस्ट्री होगी? मैं तो इनको कहते कहते मर गई कि इतने अच्छे पद पर हो , कोई हिस्ट्री बना डालो। पर नहीं! इनके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। 

देखो दोस्त! जो सरकारी पद पर रहते हुए भी अपनी हिस्ट्री नहीं बनाते , उनके रिटायर होने के साथ ही समाज उन्हें फटा जूता ही दिखाता है। हम सरकारी नौकरी में जनता की सेवा करने नहीं, अपनी खाने की हिस्ट्री बनाने ही असल में आते हैं। इसलिए सरकारी नौकरी में रहते कुछ खाओ या न खाओ, पर अपनी हिस्ट्री बनाने लायक जरूर खाओ। सबका पेट भर सकता है ,पर हमारा कभी नहीं भरना चाहिए। हमारे पेट का यही नियम है।  चलो, जो हो गया, सो हो गया! गोली मारो बीते समय को। पर ये जो ईमानदारी की बीमारी है न! ये कैंसर से भी भयंकर बीमारी है। कैंसर तो बंदे को ही मारता है, पर ये ईमानदारी की बीमारी उसकी आगे आने वाली कई नस्लों को मार देती है। अपनी आने वाली नस्लों की नजर में जो अमर होना चाहते हो तो…. अभी भी वक्त है,’ डॉक्टर ने उन्हें बींग अ प्रोफेशनल डराया तो उनके हाथ पांव अपने आप ही फूलने लगे। काश!

डॉक्टर साहब! कौन सी स्टेज है इनकी ईमानदारी की बीमारी की?’ उसने भगवान पर विश्वास रखते पूछा। साथ ही साथ वह यह भी सोचने लगी कि जो बीमारी की लास्ट स्टेज हुई तो उनकी जगह नौकरी तो मिल ही जाएगी उसे। इस कारण घर से बाहर निकलने का मौका तो मिलेगा कम से कम। पर चलो, भगवान जो करेगा, ठीक ही करेगा। इंसानी रिश्ते चाहे किसी भी वर्ग के हों, प्रेम पर कम पैसे पर अधिक टिके होते हैं।

 मुझे तो लग रहा है कि अभी ….. अभी इनकी ईमानदारी की बीमारी की तीसरी स्टेज है। मेरे हिसाब से मेरी दवाई से ये बीमारी ठीक हो जाएगी। उसके बाद जरूरत पड़ी तो दिमाग की रेडियो थैरेपी कर लेंगेे…..  पर अभी जो ईमानदारी से परहेज किया जाए तो बीमारी का इलाज संभव है,’ उनकी बीवी एक बार फिर भीतर तक कांपी।

देखो, ये दवाई लिख रहा हूं दोस्त! वैसे आदमी कहीं भी मर सकता है पर डॉक्टर के पास आकर मरना कुछ सरल सा हो जाता है। और हां! कल को मुझ दोष मत देना कि डॉक्टर ने समय से पहले नहीं मारा।  बट डांट लूज हार्ट!  अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। और हां! दिन में चार बार लेना ये गोलियां बिना किसी ब्रेक के पूरी ईमानदारी के साथ। देखना, पेट में गोली जाते ही ईमानदारी की भयंकर बीमारी से तो अपने को ठीक होते पाओगे ही अपने को , साथ ही साथ लूज होता वेट भी गेन करोगे। और ऊपर से मरने के बाद गारंटिड सद्गति मिलेगी सो अलग,’ डॉक्टर साहब ने उसी एमआर की दवाई उन्हें भी लिखी और गॉड ब्लेस यू कह बोले,‘ नेकस्ट!

 

 

- अशोक गौतम

जन्म- २४ जून ( हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की अर्की तहसील के म्याणा गांव में)।

शिक्षा- हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विशय पर पीएच.डी।

प्रकाशित व्यंग्य संग्रह- लट्ठमेव जयते, गधे ने जब मुंह खोला, ये जो पायजामे में हूं मैं, झूठ के होल सेलर।
लेखन- ब्लिट्ज, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक जागरण, अमर उजाला, राज एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, दिव्य हिमाचल, सरिता, सरस सलिल, कादंबिनी, मुक्ता, वागर्थ ,कथाबिंब, हिमप्रस्थ, सत्य स्वदेष , इतवारी अखबार , नूतन सवेरा, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान व वेब पत्रिकाओं- प्रवक्ता डॉट कॉम, जनकृति, सृजनगाथा, हिंद युग्म, रचनाकार, हिंदी चेतना , साहित्यकुंज आदि में रचनाएं प्रकाशित ।

संप्रति- हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।


संपर्क- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन, हि.प्र.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>