इससे पहले कि बादल बरसे

पिछले तीन दिनों से मैं एक दिलचस्प सवाल के कारण बेहद परेशान हूँ. यह सवाल मेरी एक महिला रोगी ने पूछा है. यू तो हर रोज कई मरीज अपनी मानसिक उलझनें लेकर मेरी क्लीनिक आते हैं. अपने निजी जीवन के गोपनीय विषयों पर वे बड़े मासूम सवाल पूछते हैं. एक मनोचिकित्सक के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं है.
लेकिन मैं जिस महिला का जि़क्र कर रहा हूँ, उसका मामला कुछ अलग है. उसका सवाल, उसकी उलझन मेरे लिए भी कुछ अलग इसलिए है क्योंकि उसका आज का सवाल लगभग पंद्रह वर्ष के मेरे ही एक जवाब से पैदा हुआ है. मेरे प्रोफेशन के लिए यह कोई अच्छी बात नहीं है. अगर ऐसे ही दो-चार केस और हो जाए तो मेरे मरीजों का मुझ पर से भरोसा टूट जाएगा. वह भरोसा, जो बहुत बरसों से बनता है.
बरसों पहले यह महिला मेरीे क्लीनिक में आई थी. एक होशियार मनोचिकित्सक को मरीज की आकृति और चेहरे की बनती-बिगड़ती लकीरों की जाँच-परख से उसकी ‘पर्सनल्टी’ की बहुत कुछ जानकारी मिल जाती है. इसलिए और मरीजों की तरह दरवाजे से मेरी टेबल तक आते हुए मैंने गहरी नज़र से उसकी सामान्य कद-काठी, कदमों की दृढ़ता और चेहरे पर सजी विनम्रता देखी. मुझे अब भी याद है, उसकी खूबियों के इस असामान्य मेल से मैं तुरंत सतर्क हो गया था.
बेशक पहली नजर में उसका चेहरा बहुत सामान्य दिख रहा था. पर उसके पतले होंठों में उसके मन की दृढ़ता छिपी थी, उसकी बड़ी बरोनियों और करीने से तराशी भौंहों से उसकी बेहतर समझ और अच्छी पसंद भी जाहिर थी. उसकी पतली नाक और सुतवां ठुडी से उसके मन की गहराई का अनुमान भी लगाया जा सकता था. परन्तु उसकी खूबसूरत आँखों में नजर मिलाने की ताब नहीं थी. उसकी समस्याओं का सूत्र मुझे यही से समझ में आया था.
छोटी उम्र्र में अपने से कमतर लड़के के साथ हुई शादी के बाद अपनी भावुकता और आंरभ में ही मिली कुछ सफलताओं के कारण उसके कदम बाहर की दुनिया में बढ़ते गये. लोगों की नजरों में अपनी तारीफ की तस्वीरें देख कर वह रोमांचित थी. यह रोमांच उसे और भटकाता रहा.
उसके बारे में ये निष्कर्ष, मैंने बहुत बाद में लिये. पर मुझे इसका थोड़ा-सा अनुमान उसकी पहले दिन की बातों से हो गया था. लेकिन उसी दिन मैं एक चूक भी कर गया था, हालांकि मैंने उसे बहुत जल्द सुधार भी लिया था. दरअसल उसकी कहानी ही ऐसी थी. वह बहुत संभल कर बोल रही थी- ‘मैं शादीशुदा हूँँ. फिलहाल कोई बच्चा नहीं है. मेरे पति बहुत भोले हैं. मुझे बहुत प्यार करते हैं. लेकिन मैंने उनके प्यार और भरोसे को बार-बार तोड़ा है. मैं हर बार सोचती हूँ कि अब ऐसा नहीं होने दूंगी. पर मेरा मन इतना कमजोर है कि मैं हर बार एक नये प्रेम में उलझ जाती हूँ. अपने काम में माहिर और काॅन्फीडेंस वाले लोगों से मैं शुरू में न जाने क्यों चिढ़ती हूँ, पर आखिर में वे मुझे अच्छे लगने लगते हैं. अपने में मगन और कुछ हद तक लापरवाह लोगों से मैं चाह कर भी दूर नहीं रह पाती. मेरी ओर तवज्ज़्ाो न देने वाले पुरुषों को मैं जाने-अनजाने ‘चेलैंज’ मान लेती हूँ. …….. लेकिन मेरे हर रिश्ते की खबर, दूसरे शहर में नौकरी करने वाले मेरे पति को; किसी न किसी तरह से हो ही जाती है. हर बार हमारे बीच खूब झगड़ा होता है. कई बार वे अपने शक के कारण किसी ऐसे आदमी के साथ मेरे रिश्ते का आरोप लगाते हैं, जिसके साथ मेरा सचमुच ऐसा कोई संबंध नहीं होता, तब मैं बुरी तरह बिफर पड़ती हूँ. पर कई बार उनके किसी सच्चे आरोप का भी मैं इस कदर ही विरोध करती हूँ कि उनकी जुबान बंद हो जाती है. आखिरकार वे मुझसे माफी मांगते हैं, गरजें करते हैं, मनाते हैं. पता नहीं क्यों वे जितना मुझसे माफी मांगते हैं, गरजें करते हैं, मनाते हैं. पता नहीं क्यों वे जितना मुझे मनाते हैं, मुझे उतना ही अधिक रोना आता है. ऐसी हालत में वे लगभग गिड़गिड़ाने लगते हैं. मुझे बहुत प्यार करते हैं. मेरी सुख-सुविधाओं का और भी अधिक ध्यान रखते हैं. उन दिनों मैं भी मन ही मन अपने पति के प्रति वफादार बने रहने की कसम खाती हूँ. पर न जाने कैसे कुछ ही समय बाद मैं फिर किसी की खूबियों की गिरफ्त में पहुँच जाती हूँ और न जाने कैसे यह रिश्ता भी उस मुकाम तक पहुँच जाता है जिसका अनुमान मुझे शुरुआत में तो कतई नहीं होता है.“
वह एक बार रूकी तो फिर उस दिन और कुछ भी नहीं कह सकी. मैंने पहले ही दिन जल्दबाजी में उसे ‘निम्फोमेनिया’ केस मान लिया था. उस समय ‘रिलैक्शेसन’ की दौस्ती न ‘एक्सरसाइज’ बताने के बाद उसे उसी सप्ताह की एक तारीख दे दी.
उसके साथ दूसरी मीटिंग में ही मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया. वह तो हर समय अपनी पसंद के लोगों का आकर्षण चाहने वाली और दूसरों पर अपनी चाहत हरदम लुटाने की इच्छा रखने के कारण वह एक ‘अटैंशन सीकिंग पर्सनल्टी’ थी, पर वह निम्फोमेनिक कतई नहीं थी.
अगली दो-तीन ‘सीटिंग्स’ में मैंने उसके तमाम दोस्तों के बारे में जानकारी ली और उसके संबंधों के बारे में सारी बातें विस्तार से जानी. उसका इलाज बकायदा शुरू करते हुए उसे ध्यान और शवासन का अभ्यास करवाया और उसके साथ बातचीत के दौर भी शुरू कर दिये. उसने इस प्रक्रिया में मुझे पूरा सहयोग दिया. इसी कारण, लगभग दस-बारह ‘सीटिंग्स’ के बाद वह गंभीर और कुछ कठोर बातों को सुनने, समझने और मानने की मनस्थिति में आ चुकी थी. इसलिए ‘आखिरी ‘सजैशन सीटिंग’ दौर में मैंने पूरी तैयारी के साथ उससे निर्णायक बातें कही -
”देखिए मिसेज़ प्रसाद, पुरुषों की नजरों का कारण हमेशा स्त्री का आकर्षक होना ही नहीं होता. दुनिया का हर आम पुरुष, हर उस स्त्री को अपनी कामना भरी नजरों से टटोलता है, जिसके चेहरे पर उसे स्वीकृति की जरा-सी भी संभावना दिखाई देती है. आपके चेहरे पर भी पुरुषों की नजरे आपके चेहरे पर हर समय लोगों के लिए बिछ जाने की कमजोरी साफ-साफ दिखाई देने के कारण टिकती है. इसलिए आपको सबसे पहले अपनी इस कमजोरी को दूर करना होगा. आपके चेहरे पर आपकी खुद्दारी का अक्स दिखाई देना चाहिये।“ उसकी सकपकाहट को अनदेखा करते हुए मैंने अपनी बात जारी रखी -
”आप अपने संबंधों में जिसे स्नेह, आकर्षण और प्रेम कह रही हैं, वे सभी आखिरकार शरीर की मंजिल पर पहुँच कर चुक जाते हैं. अगर अलका इनमें से किसी के साथ प्रेम होता तो आप उस एक शख्स को अपनी सबसे खूबसूरत लम्हा सौंपती. और वह लम्हा आपके जीवन में फिर कभी अन्य पुरुष के साथ नहीं आता. आप उस एक व्यक्ति से अलग हो कर भी उसे कभी नहीं भुला पाती. उसकी यादों की कशिश आपके जीवन का सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ा दुःख होता. बरसों बाद भी उसे सामने आते ही आपके भीतर का मानों सब कुछ थम जाता. पर आप! आप तो अपने पुराने साथियों से अलगह होती गईं और नये के साथ जुड़ती गईं। आपकी परिस्थितियों ने आपको अवसर दिये आप नये संबंध बनाती रहीं और अपने हर नये संबंध को प्रेम मानती रहीं.“ मैंने देखा, उसके चेहरे पर दुःख और निराशा की लकीरें बनने लगी थीं. मैंने अपनी बातों को मोड़ देना मुनासिब समझा -
”क्या आप नहीं मानतीं, आपके चारों ओर सोचने, विचारने और अनुभव करने के लिए कई गंभीर बातें और कठिन हालात हैं. ऐसे अपने परिवार, समाज और अपने देश के प्रति आपकी कोई गंभीर जिम्मेदारी नहीं बनती? आप अपने संबंधों के कुए में रहते हुए देश में आतंकी ओर नक्सली हमलों में हो रहे नरसंहारों की त्रासदी को नहीं देख पातीं, आप अपने शहर की धड़कने तक नहीं सुन पातीं. आप अपने परिवार में एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी माँ और अपने आॅफिस में एक अच्छी अफसर बन कर अपने सबसे बड़ी जिम्मेदारी नहीं निभाती. जबकि इन सबमें एक सच्चा सुख छुपा है जो हमारे तमाम ऐसे संबंधों से बढ़कर है; जो हमें जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ देता है.“
पश्चाताप से उसकी आँखें भर आई थीं. पर उसके दुःख में ही मुझे एक नई शुरुआत का निश्चय साफ दिखाई दे रहा था. जब एक महीने बाद वह मुझे दूसरे शहर में अपना तबादला करवा कर एक नई जि़्ादगी शुरु करने की खबर देने आई तब वह स्वस्थ और बेहद खुश थी. एक डाॅक्टर के लिए यह सब बहुत संतोषजनक था. अपने जीवन में फिर उससे मिलने की उम्मीद उस समय तो मुझे कतई नहीं थी.
लेकिन पंद्रह बरसों बाद वह मेरे ही एक जवाब को सवाल बना कर फिर मेरे सामने थी. बालों में थोड़ी-सी सफेदी और शरीर के हल्के से भराव के अलावा उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया था. पर उसे पहचानने में मुझे थोड़ा समय लगा. उसकी दो-चार बातों के बाद ही मुझे लगभग पूरा केस याद आ गया.
मैंने बाकायदा खुशी जाहिर करते हुए कहा- ”ओह, मिसेस प्रसाद, बहुत खूब. मुझे सब याद है. आप खुश तो हैं न! और आप इस शहर में कब लौंटी?“
उसकी हल्दी-सी मुस्कराहट ने उसकी गंभीरता को खूबसूसरत बना दिया. उसने स्थिर स्वर में कहा- ”मैं ठीक हूँ डाॅक्टर! तीन बरस पहले इस शहर में मेर फिर से तबादला हो गया था. तब से मैं अपने पति और दो बच्चों के साथ यही हूँ. वैसे तो सब कुछ ठीक है डाॅक्टर, पर एक उलझन से मैं परेशान हूँ. मुझे विश्वास है आप पहले की ही तरह फिर से पूरी तरह स्वस्थ और तनाव मुक्त कर देंगे.“ उसने सतर्क होने का पूरा अवसर दिया.
”डाॅक्टर आपको याद होगा, मेरी अंतिम ‘सीटिंग’ में आपने सच्चे प्रेम की पहचान एक तड़फ और कशिश के रूप में की थी. इस कशिश को जीवन का सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ा दुःख बताया था. पिछले पन्द्रह बरसों से मैं अपने उन्हीं दोस्तों में से एक शख्स के लिए यही कशिश और ऐसा ही बड़ा सुख और दुःख महसूस कर रही हूँ. मैं अपने इस अहसास को भूलने की हर संभव कोशिश कर चुकी हूँ. पर, इस दौड़-भाग भरी जि़्ांदगी में जब भी पल भर के लिए रुकती हूँ, उस चेहरे की याद मुझे बरबस घेर लेती है. आपके कहे अनुसार मैंने इसे अपनी ‘अटैंशन सीकिंग पर्सनल्टी’ और ‘अफैक्सनेट टैंडेंसी’ मान कर सब कुछ झटकना चाहा. पर इन पंद्रह बरसों में से किसी एक दिन के लिए भी मैं ऐसा नहीं कर पाई. मैं अपने पति, परिवार और आॅफिस के कामों में पूरी तरह रच-बस गई. पर वह एक शख्स जैसे पल भर के लिए भी मुझसे अलग नहीं होता.“ पल भर मेरे चेहरे को ग़ौर से देखने के बाद उसने फिर बोलना आरंभ किया- ”इस शहर में लौट आने के बाद अपने पुराने दोस्तों के साथ बिना किसी दुविधा के बोलती हूँ, एक निश्चित दूरी भरा व्यवहार करती हूँ. पर शहर की किसी सड़क, किसी मोड़ पर उस शख्स के सामने आते ही मेरे भीतर की सारी हलचल जैसे थम जाती है. एक सच्चे प्रेम का यह प्रमाण भी तो आपने कहा था.
अब आप ही बताइये डाॅक्टर, अगर यह मेरी एब्नार्मल्टी नहीं है और आपके कहे अनुसार यह सच्चा प्रेम है तो आपकी ‘सोशियल साइको थ्योरी’ मुझे इस प्रेम की अनुमति देती है?“
मुझे एक बार फिर टटोलती नजरों से देखने के बाद उसने अपनी बात जारी रखी- ”डाॅक्टर, मैंने अपने जीवन की सारी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाई है और आगे भी निभाती रहूँगी. पर इन जिम्मेदारियों के रेगिस्तान में मेरे पास एक ही हरा पेड़ नहीं है. एक बीज बार-बार इस धरती से फूटना चाहता है पर आपकी हिदायतों की रेत मैं उस पर डालती रही हूँ. पिछले पन्द्रह बरसों से इस सूखी रेत में रहते-रहते मेरा जी घुट गया है. अब मैं थोड़ी-सी जिंदगी अपने लिए भी जीना चाहती हूँ, आपने जिसे सच्चा रिश्ता माना है वैसे रिश्ते के साथ जीना चाहती हूँ. अब आप ही बताइये डाॅक्टर मुझे क्या करना चाहिए?
कुछ पलों के लिए हमारे बीच सन्नाटा ठहर गया. मैंने मिसेज प्रसाद को एक सप्ताह बाद आने का कहा है. उनका सवाल बेशक दिलचस्प है. तीन दिन बीत चुके हैं. पर जवाब मिलने की बजाय सवालों के जंगल और घने होते जा रहे हैं. हाँ, अगर आपके पास जवाब हो तो सीध मिसेज प्रसाद को बता दीजिए ताकि वह मेरे पास लौट कर न आए. क्योंकि दरअसल, वह जिस शख्स की बात कर रही है, वह और कोई नहीं मैं ही हूँ.

 

- हरीदास व्यास

जन्म तिथि     :  25 मई 

शिक्षा          : एम ए, पीएच.डी (हिन्दी,पत्रकारिता एवं जनसंचार)

प्रकाशन              : तिनकों का ताप (कथा संग्रह)

              आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : सृष्टि एवं दृष्टि(आलोचना)

               आलोचना के आयाम(प्रकाशनाधीन आलोचना)

              मीडिया का राजस्थानी नारी पर प्रभाव एवं सांस्कृतिक परिदृश्य(मीडिया)

              हिन्दी पत्रकारिता और विज्ञापन,विज्ञापन का अर्थतंत्र एवं सौन्दर्य(प्रकाशनाधीन मीडिया)

संकलित        : नीम की पत्तियाँ ( सम्पादक – सुनील कौशिश )

सम्पादन       : रश्मि,मारवाड़ इमेज,अभयदूत (पत्र-पत्रिकाएँ)

              कविता के हस्ताक्षर (काव्य संग्रह), आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संत साहित्य (आलोचना संग्रह)

पूर्व सलाहकार   : दैनिक भास्कर,जोधपुर , प्राय: सभी राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

              आकाशवाणी-दूरदर्शन से प्रसारित, कुछ नाटकों में अभिनय, मोटिवेशनल-एंकरिंग ट्रेनर

सम्प्रति         : से.नि. एअसोसिएट प्रोफ़ेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, ज ना व्यास विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक

संपर्क         : जोधपुर (राजस्थान) 

     

One thought on “इससे पहले कि बादल बरसे

  1. मनोभावों की परतें किस रेशमी फाहें सी एक _एक कर उकेरी है साइकैटिस्ट या सायकोलोजिस्ट जी ने। खूबसूरत कहानी। लेखक जी का मनोरोगों से संबधिंत ज्ञान विज्ञता प्रमाणित करता है ।

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