इतना आसां नहीं

आशा अपनी कुर्सी पर तल्‍लीन बैठी  है। अचानक कुछ आहट होती है और वह देखती है कि रमेश खड़े हैं। अरे, आप बैठिये। बाईसाहेब, मैं आता नहीं, पर मुसीबत ही है ऐसी कि आपकी मदद चाहियै। मैं तुम्‍हारे किस काम में आ सकती हूं। वह अचानक आप से तुम पर आ गई। इसे कहते हैं मानसिकता।

 

रमेश खेड़े गाव से अपनी बहन की बात लेकर आया था। उसे पता था कि आशा कुछ मदद कर सकती है। रमेश कुर्सी पर बैठ गया। बोला, बाईसाहेब, मेरी छोटी बहन है। खेड़े गाव से 10 क्‍लास पास है। शादी करने का है और शादी के लिये एक नौकरी चाहिये।

 

सुना है अभी आपके हाथ में है, तो शायद कुछ काम हो जाये। नहीं तो मेरी बहन ऐसे ही मारी मारी घूमती रहेगी।‘ यह कहकर वह रोने लगा। औरत के लिये वैसे भी मर्द के आंसू नहीं देखे जाते। आशा ने लंबा हूं  करके कह दिया कि एक टाइपिस्‍ट की जगह खाली है। उसके लिये देखेंगे। अगले सोमवार को  भेज दो। रमेश आशा के पैर छूकर चला गया।

 

अगले सोवार को रमेश अपनी बहन को लेकर आया। उस दिन 10 आवेदक थे। आशा रमेश की बहन रमी का बायोडाटा देखा गया। वह किसी सड़कछाप संस्‍था में टायपिंग सिखाती थी। आशा का मकसद पूरा हो गया था। रमी लाल,पीले हरे कलर का पंजाबी सूट पहने थी। काला रंग, आदिवासी रंग के कानों के रिंग और नाक में नथ।

 

बाकी सारे आवेदक ऑफिस के ही थे, इसलिये बिंदास थे। रमी के चेहरे पर घबराहट थी। उसे एक पेपर दिया गया और टाइपिंग करने के लिये कहा गया। वह बड़े विश्‍वास से पेपर मशीन में डालकर बैठी उसे पता नहीं, मानो उसका हाथ जाम हो गया और वह टाइप नहीं कर पाई। आशा ने सिर पीट लिया। रमी के मन पर कोई चिंता नहीं थी। वह केबिन से बाहर आ गई। यहां वहां देखे बिना खुद को साधे साढ़ियां उतर गई।

 

आशा जिस पेनल पर थी, वहां से एक मैडम भागकर आईं और बोलीं कि वह लड़की दूर नहीं गई होगी। लंच टाइम है। आप दरवाजा बंद करके टाइप कर दीजीये। किसीका भला हो जायेगा। उन दिनों वहां बस कम चलती थीं, सो रमेश और रमी बसस्‍टॉप पर मिल गये। चपरासी ने कहा कि मैडम ने आपको बुलाया है। दोनों भाई बहन आंखों में आश्‍चर्य का भाव लिये हुए चढ़ने लगे।

 

भगाया गाया चपरासी गेट तक से वापिस आया तब तक आशा ने टाइप करके पेपर पैनल में सबमिट कर दिया। रमी ऊपर आई और पेनल पर इंटरव्‍यू ले लिया गया। दूसरे दिन से ऑफिस आना था। वह आशा की बहुत मेहरबान थी। इंटरव्‍यू अच्‍छा हुआ था। उसे फिर पेपर दिया और केबिन का दरवाजा बंद कर दिया। औपचारकता तो पूरी करनी ही थी।सब होने के बाद डीलिंग क्‍लर्क भी उठ गया। उसका लंच टाइम कम हो गया था।

 

रमी का एक ही दुर्भाग्‍य  था कि मां नहीं थी। 6 भाई होते हुए भी इतना खराब पहनावा। बात बात में गाली। वह धीरे धीरे आशा से खुलने लगी थी कि भाईयों…भाभियों का होना न होना एक बात थी। वह सबके लिये नौकरानी थी। सबसे छोटी होने पर उसे मां बना दिया गया था। आशा के सामने वह फूटकर रोती थी।

 

‘मैम, मैंने करमुरे खाकर दिन बिताये थे। कई बार तो वह भी नहीं होते थे। भाई भाभी का अपना संसार था। किसीकी डिलिवरी होनी है तो रमी चाहिये थी। वे लोग इतना कमाते थे, पर मेरी पसंद को मैं नहीं खरीद सकती थी। एसे कपड़े कौन पहनना चाहेगा। अब मुझे पगार मिलेगी, तो अच्‍छा खरीदूंगी।‘

आशा भी सब सुनने लगी थी। एक दिन रमी बोली…..आशा मैडम, आप मेरे घर चलिये। सब पता चल जायेगा। आशा ने इसमें कोई बात नहीं समझी और रविवार को वह चली गई। रमी स्‍टेशन पर लेने आई थी। घरमें खाना तैयार था। पूरा रमी ने बनाया था। छोले,दहीवडे, आलू की सब्‍जी। बहुत मजेदार खाना था।

 

थोड़ी देर में रमी की भाभी आईं, दुआ सलाम हुई और मौका पाकर फुसफुसफुसाते हुए बोलीं, आपका ऑफिस पांच बजे तक ही है न….रमी साढ़े छ: बजे तक आती है, इसलिये पूछा। वातावरण में कड़वाहट भर गई। आशा ने कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद रमी ने हंसकर कहा, मैडम खाईये, सब मैंने बनाया है। आशा हैरान ही हो सकती थी।

 

एक घंटे के बाद आशा उठने के लिये निकली और बोली, ‘इस समय 4 बजे हैं। मुझे साढ़े पांच बज जायेंगे। ऐसे शक नहीं करना चाहिये’ और रमी की भाभी कटकर रह गई थीं। रमी फिर आशा को स्‍टेशन छोड़ने के लिये आई थी। दूसरे दिन आशा आई और रमी से बोलीं कि भाभी मजेदार हैं, पर ज्‍यादा छूट मत देना।

 

हां, एक काम करो, तुम अपने कपड़ों के रंग बदल दो। तुम्‍हारा दबता रंग है। नथ पहनना भी बंद कर दिया था। काम सीखने में बहुत होशियार थी। टाइपिंग की स्‍पीड 50 प्रति मिनट थी। एक दिन रमेश फिर आफिस आये। इस बार नई समस्‍या, रमी शादी नहीं कर रही। बैंक का लड़का है। मैंने रमेश से जाने के लिये कह दिया।

 

रमी को बुलाया, उसे बताया। इस पर उसने जो उत्‍तर दिया मैं अवाक थी। बोली, मैं किसीसे जुड़ी हूं। उसने शादी का वादा किया है। मामला तो गंभीर था। ऑफिस के लड़कों से पता किया एक तो चपरासी रमी के चक्‍कर में था और वह शादीशुदा था।

 

आशा ने उसे बुलवाया तो बड़ी अक्‍खड़ता से बोला, अपन तो बिंदास है।…..आशा ने उसको जाने के लिये कह दिया। दूसरे दिन रमी को खाली कमरे में बुलाया और बोलीं, जो मैंने सुना है, वह सच है क्‍या। कोई फोटो कोई पत्र लेनदेन हुआ।

 

इस पर रमी चुप रही और आशा ने कहा, यदि ऐसा है तो तुम्‍हें नौकरी से निकाल भी सकती हूं, जैसे लगाया था। इस पर वह सहम गई। थोड़े दिनों के बाद  पता चला कि रमी की शादी बैंक के लड़के से हो गई थी। रमेश मिठाई लेकर आये और आशा ने कहा…. ये सब इतना आसां नहीं था।

आशा रमी खूब देखभाल करती। लेकिन एक बात नोट की जा रही थी। नयी होते हुए भी लोगों के साथ बडी़ बिंदास थी। फैकल्‍टी हो या ऑफिसर। एक दिन आशा ने पूछा….छोटों.बड़ों का आदर होता है। आगे से ख्‍याल रखना। वह बातों को हवा में उड़ाकर चली गई।

 

धीरे धीरे आशा भी उसकी ओर से लापरवाह होती गई। लड़कों ने मौकों को हाथ से न जाने दिया। आशा के मुंह पर तो वे उनकी तारीफ करते, पर बाद में रमी से धीरे धीरे से कहते…..कशाला इतका भाव (इज्‍जत) देतेस। काम केल तर मेहरबानी केली क्‍या।

 

आशा समझने लगी थी। जब रमी को बदनामी की चिंता नहीं थी,तो वह खुद को क्‍यों कमजोर करे। रमी का चपरासी प्रेमी मुखर हो चला था। लोग आशा से कहते, समझाओ मैडम, आपके लिये तो बेटी के बराबर है। अब यह व्‍यंग्‍य थी या बात, पता नहीं।

 

वह झगड़ालू बनती जा रही थी…कोणाचे बापाचा काय खातात। संस्‍थान में यूनियन बनने लगी थी….

 

यूनियन, ओबीसी और अनुसूचित जाति व जनजाति। सब सदस्‍य बनने लगे थे। उनके कुछ लोगों को काम ही था कि काम करनेवाले लोगों को डिस्‍टब करना। रमी यू ट्यूब पर गाने सुनने लगी थी। आशा ने कहा…काम पहले कर लो। इस पर वह बोली मन नही है। थोड़ा चेंज तो मंगता है।

 

शादी से पहले तो   विनम्र थी, अब क्‍या हो गया। यूनियन के लोग कहते, घाबरयच नहीं, अम्‍हीं तुझा मागे आहोत। हालात बिगड़ते जा रहे थे। सच में उससे बात करने में डर लगता था। रमी के चेहरे पर हरामीपन टपकने लगा था जबान पर हरामी, हलकट तो 24 घंटे थे।

 

एक दिन रमी फिर आशा के कमरे में थी। रमी, यह सब क्‍या देख रही हूं। ऐसी तो तुम नही्ं थीं। इस पर वह तमककर बोली, कोई नहीं चाहता कि हम खेडे गाव के लोग आगे बढ़ें। अब अच्‍छी तरह रहती हूं, तो सब जलते हैां।

 

अब मेरी समझ में आ गया कि रमी को उसकी बॉस से अलग किया जा रहा था। बात बात में फिक्‍क से हंसना। रोनेदार पायल, छम छम चलना। आशा ने आंखें उठाई। उनमें हल्‍का सा पानी था। फिर भी हंसकर कहा, मैंने सोचा था कि तुमको अपना जैसा बना लूंगी। अनुासन सिखाऊंगी।

 

यह सब बेकार गया। मैं शायद भूल गई….सॉरी रमी। आज से हमारे रास्‍ते अलग होंगे।

 

 

- मधु अरोड़ा

  • कृतियां:
  • · ‘बातें’- तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर।
  • · ‘एक सच यह भी’- पुरुष-विमर्श की कहानियां- संपादक- मधु अरोड़ा, प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • · ‘मन के कोने से’- साक्षात्‍कार संग्रह, यश प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • · ‘..और दिन सार्थक हुआ’- कहानी-संग्रह, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली।
  • · ‘तितलियों को उड़ते देखा है…?’—कविता—संग्रह, शिवना प्रकाशन, सीहोर।
  • · मुंबई आधारित उपन्‍यास प्रकाशनाधीन
  • · भारत के पत्रकारों के साक्षात्‍कार लेने का कार्य चल रहा है, जिसे पुस्‍तक रूप दिया जायेगा।
  • · सन् २००५ में ओहायो, अमेरिका से निकलनेवाली पत्रिका क्षितिज़ द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्‍मान से सम्‍मानित।
  • · ‘रिश्‍तों की भुरभुरी ज़मीन’ कहानी को उत्‍तम कहानी के तहत कथाबिंब पत्रिका द्वारा कमलेश्‍वर स्‍मृति कथा पुरस्‍कार—२०१२
  •  उपन्‍यास…उम्‍मीद अभी बाकी है’ प्रकाशित….2017…… मिररस्‍टोरी, मुम्‍बई
  • · हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, परिकथा, पाखी, हरिगंधा, कथा समय व लमही, हिमप्रस्‍थ, इंद्रप्रस्‍थ, हंस, पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।
  • · जन संदेश, नवभारत टाइम्‍स व जनसत्‍ता, नई दुनियां, जैसे प्रतिष्‍ठित समाचारपत्रों में समसामयिक लेख प्रकाशित।
  • · एस एनडीटी महिला विश्‍वविद्यालय की हिंदी में एम ए उपाधि हेतु कहानी संग्रह ‘और दिन सार्थक हुआ’ में वर्णित दाम्‍पत्‍य जीवन पर अनिता समरजीत चौहान द्वारा प्रस्‍तुत लघु शोध ग्रंथ…..२०१४ —२०१५
  • · उपन्‍यास…’ज़िंदगी दो चार कदम’ प्रकाशनाधीन
  • · अखिल भारतीय स्‍तर पर वरिष्‍ठ व समकालीन पत्रकारों के साक्षात्‍कार का कार्य हाथ में लिया है।
  • · आकाशवाणी से प्रसारित और रेडियो पर कई परिचर्चाओं में हिस्सेदारी। हाल ही में विविध भारती, मुंबई में दो कहानियों की रिकॉर्डिंग व प्रसारण। मंचन से भी जुड़ीं। जन संपर्क में रूचि।
  • सन् 2015..2016 का महाराष्‍ट्र राज्‍य हिंदी साहित्‍य पुरस्‍कार मिला तथा डाक्‍टर उषा मेहता अवार्ड से सम्‍मानित किया गया।

 

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