इक्कीसवीं सदी का महिला कथा लेखन

                              बीसवीं सदी के उतर्रार्ध में सन् 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला  वर्ष   घोषित किया गया.अब तक बहुत सी महिलाये घर की देहरी लांघकर  बाहर आ चुकी थी.अलग अलग क्षेत्र   में अपने जौहर दिखा चुकी थी .लोग उम्मीद लगा चुके थे कि आने वाली सदी में जाने क्या करतब दिखायेंगी ये महिलाये.बीसवीं सदी के अंत में ये जुमले मशहूर हो रहे थे कि“ इक्कीसवीं की स्त्री “इक्कीसवीं सदी की औरत “.ऎसा लगता था कोई धमाकेदार नेट प्रोग्राम डाउनलोड होने वाला है .और किसी क्षेत्र   में हुआ हो या ना हुआ हो महिला कथा लेखन ने  बीसवीं सदी की मृगमरीचका से लगते आयाम को सच ही छू लिया है ,अपना एक इतिहास रचा है .
पुरुष व्यवस्था स्त्री को दोयम दर्ज़े की नागरिक करार करते हुए जिस दृष्टि से देखता है उसी का पर्याय बन गई थी  बीसवीं सदी के उतर्रार्ध में सुधा अरोड़ा की कहानी `रहोगी तुम वही `. इस सदी का मूल स्वर था `मै जीना चाहती हू `.ये शीर्षक डॉ .नीलिमा सिन्हा की कहानी का है जिसकी नायिका के पति को एड्स है ,सास बार बार रात में उसे उसके कमरे में भेजती है  लेकिन वह जीने का फैसला करती है .यही स्वर लगभग हर कथा लेखिका की लेखनी में धड़कता दिखाई  देता है. वैसे भी स्त्री कलम कथाओं में जाने अनजाने स्त्री विमर्श रच डालती है क्योंकि किसी भी स्त्री की इससे अलग परिभाषा कहाँ  है ?
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बीसवीं सदी की आदि कथाकार प्रेमचंद जी की पत्नी शिवरानी ,सुभद्रा कुमारी सिन्हा ,सुभद्रा कुमारी चौहान व महादेवी सहित  भी स्त्री विमर्श को रचने से अछूता कैसे रह सकता था ?बीसवीं सदी के उतर्रार्ध से स्त्री लेखन ने जो प्रगति की है उससे इक्कीसवीं   सदी तक आते आते कोई विषय अछूता नही रहा है .ये बात और है बीसवीं सदी के उतर्रार्ध मेंकृष्णा  सोबती , मन्नू भंडारी , उषा प्रियंवदा , मेहरुनिस्सा परवेज़ व ,सूर्यबाला ,दीप्ति  खंडेलवाल ने स्त्री विमर्श का बिगुल बजाया। चित्रा मुद्‍गल ,मृदुला गर्ग  , मैत्रेयी पुष्पा ,ममता कालिया ,सुषमा मुनींद्र , दीपक शर्मा व अन्य बहुत सी लेखिकाये अपने लेखन की अलग पहचान बनाती चली गईं  .सुधा अरोड़ा  व नमिता सिंह जी ने क्रमश; `बोलो भ्रष्टाचार की जय `व गिनी पिग्स `कहानि याँ  लिखकर स्त्री लेखन को नए आयाम दिए . संतोष श्रीवास्तव व रजनी गुप्त ने भी कुछ अलग किस्म के स्त्री पात्र चुने हैं। `कथादेश `में  में प्रकाशित कहानी “तू पन  कहाँ  जायेगी ?“[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]का आरंभ एक रेलवे लाइन के किनारे शौच करती एक कचरा बीनने वाली स्त्री से आरंभ होता है ,जो कि एक सायकल वाले को गाली दे रही है .ये उसे खुले में शौच करते सायकल रोककर घूर रहा है . नही पता था  कि ये समस्या पंद्रह वर्ष पश्चात शौचालय बनाने का राष्ट्रीय मुद्दा बन जायेगी .
इक्कीसवीं सदी  के आरंभ में मुक्त स्त्री विमर्श से प्रेरित कहानियों  का दौर रहा। एक नई पीढ़ी उभरी जो अभिव्यक्ति में बेझिझक थी ,ईमानदार थी। जिनके  लिए चित्रा मुदगल  जी ने कलमकार फ़ाउंडेशन , देल्ही  के पुरस्कार वितरण  कार्यक्रम में स्वीकारा था कि ,“हमने जब लिखना आरम्भ किया था तो मुठ्ठी भर कहानीकार ही थी . आज तो लेखिकाओं का झुण्ड का झुण्ड कहानियाँ लिख रहा है। बड़ी बेबाकी से देह की चीर फाड़ कर रहा है। “
उक्त कार्यक्रम की उद्घोषिका गीताश्री ने भावुक होकर कहा था ,“और ऐसी लेखिकाएं गालियाँ  भी तो खा रही है। “
कहना ना होगा इस केटेगरी में रमणिका गुप्ता जी ,मैत्रेयी पुष्पा ,मनीषा कुलश्रेष्ठ ,सोनाली सिंह ,जयश्री रॉय को लिया जा सकता है . मैत्रेयी पुष्पा जी ग्रामीण स्त्रियों की अनकही बातों को साहित्य के माध्यम से  बहुत सशक्तता से इसी के केंद्र में लेकर आईं. मनीषा कुलश्रेष्ठ व जयश्री राय कहानी में एक मोहक वातावरण रचने में सिद्धहस्त हैं । यदि हम अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात करते हैं तो रायपुर में रमणिका जी व मैत्रेयी जी का एक साहित्यिक अपमान भर्त्सना की बात है सिर्फ़  इसलिए कि वे बेबाकी से स्त्री कामनाओं को चित्रित करतीं हैं? वडोदरा की एक गुजराती कवयित्री ने भी मुझसे कहा था  कि हमें गुजराती साहित्य की गोष्ठी में प्रेम कविता पढ़ने से मना किया जाता है जबकि हम जानते हैं गुजरात कितना प्रगति शील राज्य है। इस  बात की चर्चा इसलिए ज़रूरी हो गई है कि स्त्री को अपनी स्त्री सुलभ भावनाओ को अभिव्यक्त करने का अधिकार नहीं है। जो जबरन ये अधिकार छीन रही है ,उनकी कहानियों की  `बोल्डनेस `को या स्त्री देह से जुड़े सत्य को खुले मन  से साहित्य में स्थान देना होगा लेकिन बिना बात अश्शलीलता भी स्वीकार्य नहीं होगी।
कहानीकार अलग अलग व्यवसायिक क्षेत्र से जुडी होने के कारण अलग अलग विषयों पर लेखनी चला रही है जैसे लेस्बियन समस्या   ,उदाहरण के लिए संगीता कांदली की `कथादेश `में प्रकाशित कहानी `फ़ीनिक्स `व नीलिमा सिन्हा की `हंस `में प्रकाशित `मंगला गौरी `,एम एन  सी में किसी प्रबंधन कार्य करते हुए किसी मुस्लिम से प्रगाड़ता तो दूसरे सहकर्मियों का जलना या जताना कि हम तुम्हें  इस मुस्लिम से बचाकर रहेंगे ,पर्यावरण सरंक्षण की बात करना. `हंस `में  प्रकाशित   `सफ़ाई `उन कहानियों का आरम्भिक काल थी जब से  कथाओं में पर्यावरण चेतना  का संचार हुआ था . इस सदी की कहानियों की विवधता में अपनी दो कहानियों का नाम लेना चाहूँगी सरोगेट मदर की मर्मांतक तकलीफ  पर आधारित `रस– प्रवाह `व `गिनी पिग्स `,जो सन २०१० में लिखी  क्लीनिकल ट्रायल की हिंदी की प्रथम कहानी  भी हो सकती है कि किस तरह मनुष्यों को क्लीनिकल ट्रायल के नाम से मौत दी जाती है .यदि वे  दवाई के प्रयोग के कारण  भयंकर बीमार हो जाए तो अनुबंध के अनुसार उन्हें दवाई कंपनियां पैसा भी नहीं देती .आलोचकों की नजर ऐसी कहानियों पर कम पड़ती है . या कहिये नौ  -दस वर्ष पूर्व स्त्री पुरुष के रसीले संबंधों का ही अधिक  दौर था इसलिए सामज के विभिन्न पहलुओं पर लिखी कहानियों की कहानीकार आलोचकों की लिस्ट में नहीं पाईं।
हिन्दी साहित्य में लेखिकाओ की कहानियों को अलग अलग रेखांकित ना करके  मैं  इस सदी की कुछ ऐतहासिक  घटनाओं  को ले रही हूँ   , जिससें इक्कीसवीं सदी का महिला कहानियों  का परिद्रश्य  परिलक्षित हो जायेगा .अब तक का सबसे बड़ा संकल्प है रमणिका  गुप्ता जी का जो चालीस भाषाओं की रचनाकरो   की स्त्री विमर्श की रचनाये हिन्दी में अनुवादित करके “हाशिये उलांघती औरत `से उन कटु सत्यों को कहलवा रही है कि औरत को हाशिये उलांघने की क्यों जरूरत पड़ती है .इस श्रंखला के हिन्दी के तीन व  ग्यारह भाषाओं के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं .
अब तक जो भी अंक प्रकाशित हुए हैं उनमें से बाज़ी मारी है तेलुगु लेखिकाओ ने स्त्री अंगों से जुड़े प्रश्नों को बहुत जीवट से सामने रखकर  ..ओल्गा सीधे ही ` अयोनि` कहानी से योनि के प्रश्न उठाती हैं –` उन सर्पों को छुरे घोंपकर मार डालना चाहिए जो नन्ही बच्चियों  को एक अंग विशेष के कारण अगवा कर लेते हैं .`चंद्र्लता `अपनी कहानी`बैलेंस शीट `से बरसों से स्त्री पुरुष के बीच खोयी हुई बैलेंस शीट को खोजने  का सफल प्रयास करतीं  हैं – -वह भी एक ऑफ़िस की खोयी हुई बैलेंस शीट के माध्यम से .वे एक जीवट विमर्श रचकर समाज के सामने माँग रखतीं है कि जब स्त्री को मासिक धर्म हो तो ना उसका मज़ाक उड़ाया जाए ,ना उसे नीचा  या  अछूत समझा जाए .बल्कि उसकी  सहायता  की जाए .कुप्पली पद्मा की दो देह व्यापार करने वाली नायिकायो के वीभत्स अट्टहास  से आपका  दिल दहल जायेगा क्योंकि उन्हें एड्स हो चुका है ,वे हंस रही  है ,“ अब वे आज़ाद है ,रात में भी कहीं घूम सकती है क्योंकि कोई पुरुष उन्हें तंग नही करेगा.“
तेलुगु भाषी महिलाये स्त्री के इस अंग विशेष पर बेबाक  विमर्श कर सकी हैं इसका कारण इनके समाज के एक विशेष परंपरा को जाता है .आंध्र प्रदेश में बेटी के रज्ज्सवला होते ही एक पार्म्परिक उत्सव का आयोजन होता है व निमंत्रण दिया जाता है -` बेटी  पुष्पावती हो गई है .“
हालाँकि कर्नाटक में जैसे जैसे शिक्षा बढ़ी है वहां ऎसे आयोजन बंद हो गए हैं .हैदराबाद में रहने वाली लेखिका ओल्गा के अनुसार ,“बीच में कुछ वर्ष ये आयोजन बंद रहे थे कि क्योंकि शिक्षा के  कारण लोगो को समझ आ गाया था कि बेटी के सम्बन्ध में ये कोई शोर मचाने वाली बात नही है लेकिन जैसे जैसे दस पन्द्रह वर्ष  से लोगों  के पास पैसा बढ़ता गया   वो इस उत्सव को मानकर आपने पैसे का प्रदर्शन करने लगे हैं .
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गुजराती से हिंदी  अनुवाद में दो  प्रतीक कथाएं हैं “ताश की बाज़ी `मे एक लड़की दरवाज़े खोलती जाती है ,सब पुरुष की तरफ खुलते हैं लेकिन अंतिम दरवाज़ा वह अपने लिए खोलकर ही दम लेती है व सुहास ओझा की कहानी में अदना सी नौकरानी एक योद्धा की मूर्ति  के पीछे बनी निढाल सी  कमज़ोर औरत की मूर्ति को घर में पार्टी के दिन सामने की तरफ रख देती है ,ये बात घर के मालिक को बिलकुल पसंद नहीं आती।
बीसवीं सदी में श्री यशपाल जी ने `ओ भैरवी `में लिखा था -` मुझे आधुनिक शिक्षित स्त्रियों को देखकर बहुत हंसी आती है कि इनके आदर्श आज भी सीता और सावित्री हैं .`ख़ुशख़बरी ये है कि बिना यशपाल जी के विचार जाने भारत भर में रचनाकार पौराणिक स्त्री पात्रों की चीर फाड़ कर रही हैं ..“सीता ,द्रौपदी व अन्य पौराणिक स्त्री चरित्रो की वेदना से सदियों से भारतीय स्त्रियों का दिल चकनाचूर होता रहा है .जैसे ही उनके हाथ में कलम आई, इस तकलीफ़ व विद्रोह को स्वर मिलने लगे .
अस्मिता ,महिला बहुभाषी मंच की वड़ोदरा की अरविंद आश्रम की गोष्ठियों में मैंने इस विद्रोह की धड़कने सुनी व नमिता सिंह जी के प्रोत्साहन पर मैंने देश भर की  शीर्षस्थ लेखिकाओ से रचनायें    मँगवा कर  पुस्तकें संपादित की `धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत`[[शिल्पायन प्रकाशन ,दिल्ली ]व `धर्म के आर पर औरत “[किताबघर  ,देल्ही ].यदि स्त्री की तेज़ धार वाली कलम के पौराणिक स्त्री चरित्रो व धर्म के स्त्री शोषण  के चक्रव्युह में धँस जाने व अपना शौर्य दिखाने को देखना हो तो इस सदी में की विशिष्ट कहानियां हैं —-`वेंकटासनी  व नारियों `[महाश्वेता देवी ] जो आंध्र प्रदेश में पिता व भाइयों की मर्ज़ी से  पुजारियों  के धर्म के नाम पर कमसिन लड़कियों शोषण  की  कहानी है,`कोख` [नमिता सिंह ],  `  कटाक्ष`  `    [म्रदुला गर्ग ],`संगसार` [नासिरा शर्मा ],`मेनका `[ रमणिका  गुप्ता ],`नेपथ्य` [अर्चना सिंह ].
“धर्म की बेडि़या खोल रही है औरत “का दूसरे  खंड मे कहानियां हैं भीष्म पितामह से हाशिये की स्त्री की तरह प्रश्न करती हिडिम्बा `एक और प्रश्न `[नताशा अरोड़ा], गार्गी के याग्यवल्क्य को कोंचते प्रश्न परिप्रेक्ष्य में `केय र ऑफ़ स्वात घाटी  “[मनीषा कुलश्रेष्ठ ], `मंदिरों के मठाधीशों की  पोल खोलती` दास्तान -ए कबूतर `[ कुसुम अंसल ] ,पौराणिक स्त्री शोषण की कथाएं `ओघवती –अन्य –और विषकन्याएं  `[संतोष श्रीवास्तव ],जीवन से पलायन सार्थक है  जीवन को निबाहना `योगक्षेम [ सुषमा मुनींद्र  ]`वासवदत्ता   एक गणिका ?`[डॉ.मीरा रामनिवास ]  कहना ना होगा कि इस सदी  की स्त्री कलम अपने अतीत या  पौराणिक आख्यानों में स्त्री की स्थिति की पड़ताल कर स्वयं  अपने रास्ते तलाश  रही है।
सन  २००८ से आरम्भ हुए कागज़ ,कलम के  इस संगठित विद्रोह  ने सिर्फ पृष्ठभूमि बनाई थी और उद्घोष -णा भी की थी कि ये सभी धर्म की करोड़ों स्त्रियों का क्रंदन है।  हम सबने ७-८ वर्ष  बाद देखा कि स्त्रियां  धर्म की अवधारणाओं की मज़बूत दीवार को तोड़ने मैदान में उत्तर आई हैं चाहे वह शनि शिंगणापुर का मंदिर हो या मुम्बई की हाज़ी  अली  की दरगाह। लेखिका अन्नदा पाटनी  ने ये भी बताया की जैन मुनि ,जो अब तक साध्वियो को मान्यता नहीं देते थे ,वे भी उन्ही आदर देने लगे हैं व उच्च पदों पर आसीन  करने की सोचने लगे हैं।ये हज़ारो साल का लावा है जो बह निकला है।
यदि आप चाहे तो इक्कीसवीं सदी की   दूसरी बड़ी साहित्यिक घटना इसे मान सकते हैं  जिसकी प्रेरणा बनी वड़ोदरा व अहमदाबाद में मेरे द्वारा स्थापित -अस्मिता . यानि कि 15-20 शिक्षित स्त्रियां अस्मिता के नाम इक्कठ्ठी हुई  और पौराणिक स्त्री चरित्रो व अपनी स्थितियों पर चिंतन हुआ और एक ये  देश की रचनाकारों  से जुड़कर एक मील का पत्थर बन गया .
इस सदी  में तीसरा ऐतहासिक संगठित स्त्री लेखन साहित्यिक  इतिहास रचा  इसी बात को मद्दे नजर रखते हुए  कमर मेवाड़ी  जी की पत्रिका `संबोधन `ने स्वाति तिवारी के संपादन में` लिव-इन रिलेशनशिप `पर एक विशेषांक   प्रकाशित किया   .आज की महानगरों में लिव-इन में रहने वाली  पीढ़ी  को मार्गदर्शन की  ज़रूरत है .इस सदी में लिखी इन कहानियों ने इस सम्बन्ध का भरपूर विवेचन किया है कि जब दो लोग साथ रहते है तो किस तरह समय पर कोई रिश्तेदार साथ नहीं होता या इस तरह के रिश्ते में क़ानून बन गया  हो  तब भी स्त्री असुरक्षा महसूस करती है .इस अंक की ये उपलब्धि रही कि अनेक लेखिकाओ ने ज़ोर दिया कि जब  लिव -इन के लिये शादी के क़ानून खंगालने पड़ रहे हैं तो शादी ही एक पुरुष व स्त्री के साथ रहने की व्यवस्था क्या बुरी है ?
बहुत से लोगो को ये भ्रांति है कि मैत्री करार व लिव- इन -रिलेशनशिप एक ही बात है . बीसवीं सदी के आठवें दशक के अंत में अहमदाबाद में  फ़्रेंडशिप   कॉन्ट्रेक्ट [मैत्री करार ]का बोलबाला था .जो इस शहर से दूसरे शहरों तक फैल रहा था फर्क नहीं  समझते. ये सच है विवाह भारत में क्या विदेशों में भी एक धार्मिक अनुष्ठान है .इसमे भी स्त्री सुरक्षित  नहीं थी तो कड़े क़ानून बनाए गए .  सन् 1981 में अहमदाबाद में ही साढ़े तीन हज़ार मैत्री करार करने वालों की संख्या थी तो गुजरात में ऎसे जोड़ों की संख्या कितनी होगी .
सन-२००६ में घरेलु हिंसा का जो क़ानून बना उस में लिव -इन रिलेशन में रहने वाली औरतों को भी क़ानूनी पत्नी को मिलने वाले सुरक्षा के अधिकार दिए गये. सन-२००८ में सुप्रीम कोर्ट ने लिव -इन रिलेशन शिप से जन्म लेने वाले बच्चों को क़ानूनी शादी से जन्म लेने वाले बच्चों जैसे अधिकार दिए.. ज़ाहिर है इसमें  मीडिया या साहित्य  योगदान तो है ही। इस सदी में एक दो कहानियों में इस कानून के भी नकारा होने की बात को उठाया गया  है

आकांक्षा पारे ने इस सदी की नई अदा यानि आई टी प्रोफ़ेशनल  पर आधारित कहानी लिखी थी   `शिफ़्ट +कंट्रोल =डिलीट[ `हंस `से प्रथम पुरस्कार ]। ये बताने की कोशिश   थी कि आई टी सेक्टर में काम करने वाले  बेतरतीब ज़िंदगी जीते हैं व वीडियो गेम के लिए पागल होने की सीमा तक दीवाने हैं। ग़नीमत है इस सेक्टर  में  सिरफ़िरे चंद लोग  ही हैं लेकिन इस नई पीढ़ी का सच तो इसमें था।
चार वर्ष पूर्व वर्ष बैंगलोर के पाँच आई.टी.  प्रोफेशनल्स ने एक साहित्यिक वेब साइट  आरंभ की जिसकी हिन्दी अधिकारी भी एक महिला वीणा वत्सल सिंह हैं .उन्होंने एक कथा प्रतियोगिता आयोजित की .उसमें पुरस्कृत  प्रज्ञा रोहिणी  की  कहानी`तकसीम `का ज़िक्र करके नई पीढ़ी के लेखन व  आज के पाठक को समझना होगा .लोग समझते हैं कि आज की पीढ़ी  दुनिया से असम्प्रक्त है ,उसे किसी की परवाह नही है लेकिन इस प्रतियोगिता में ना चुनी गई कोई प्रेम कहानी या पति पत्‍नी और वो की दास्ताँ, ना आकांशा  पारे की`हंस `से प्रथम पुरस्कार पाने वाली कहानी ,यानि कि पाठक क्यों  करे चिन्ता इस कहानी के सनकी आई टी प्रोफेशनल की  जो फाँसी से पहले निंजां  वीडियो गेम की फ़रमाइश करता है .इस नेट पर साहित्यिक रूचि  के पाठक को चिन्ता है समग्र समाज की ,उसकी शान्ति की ,सांप्रदायिकता के जहर को समाप्त करने की  तभी प्रज्ञा की कहानी ने ये पुरस्कार जीता .स्त्री लेखन की साम्प्रदायिकता के विष को समाप्त करने का आवाहन करती ये इस सदी की कहानी है . इस कहानी से साहित्य मर्मज्ञों को भी सन्देश मिला कि ऑनलाइन पत्रिका या वेबसाइट चलाने वाले या इनमें लिखने वाले ऐरे  गैरे  लापरवाह  नहीं हैं।
इसी सदी मे लिखी गई किरण सिंह ने एक दुर्लभ कहानी `द्रौपदी पीक  `[हंस]`जिसे पढ़कर में सोचती रह गई कि इतनी सशक्त ,इतनी क्लिष्ट ,इतनी विषमताओं को समेटती ऐसी कहानी कोई कैसे लिख सकता है .इसमे है रसूलपुर की नाचने वाली  की समस्या ,नागा बनाने की प्रक्रिया ,उनकी अंदरूनी घृणित राजनीति .पर्वतों पर खाली टीन के डिब्बे व प्लास्टिक थैली व रेपर्स फेंककर पर्यावरण दूषित कराते लोग हैं .दूसरी राजनीति मल्टी नेशनल कंपनियों की घृणित साज़िश -उनके विज्ञापन, जिससे लोग द्रौपदी पीक यानि कि माउंट एवरेस्ट की यात्रा पर जाने के एडवेंचर को भोगने लालायित हो   और उनका पर्वतारोहण के लिए जरूरी सामान बिके . जिस यात्रा से पहले यात्री से लिखवा लिया जाता है कि यदि वह मर गया तो उसके शव को  धूंढ़कर  उसके घरवालों  तक पहुँचाने  की ज़िम्मेदारी प्रशासन की नही है . मेरे ख्याल से ये अकेली ऐसी कहानी होगी जिसके प्रकाशन के तुरंत बाद `हंस `में  इस पर २-३ पृष्ठ का लेख प्रकाशित हुआ था।
सन  २०१६ में प्रकाशित हु कहानी संग्रह `रिले रेस `.जब मैं इसे सम्पादित कर रही थी तो नमिता सिंह जी ने कहा था ,“तुम कैसे स्त्री के अलग अलग अंगों  की कहानियाँ  लेकर स्त्री विमर्श रचोगी ?“लेकिन ये हो गया। बाद में प्रीतपाल कौर ने `टांगें `की समस्या पर भी कहानी लिखी है कि स्त्री की विभिन्न पोशाकों में दिखाई देती अर्द्धनग्न  `टांगों से समाज कैसे परेशान  रहता है? सन २०१७ में मेरा एक और सम्पादित कहानी संग्रह आया `आप ऊपर ही बिराजिये `यानि कि कर्मठ व ईमानदार स्त्रियों को किस तरह से इस व्यवस्था से निष्कासित किया जाता है ,जैसे कि धार्मिक देवियाँ पहाड़ों पर बसाई जातीं हैं . स्त्री से जुड़ी समस्यायों से संघर्ष करती स्त्री की दास्ताँ है। ये मेरी पुस्तकें हैं,इनके विषय में ज़्यादा क्या कहूँ ? इनका आंकलन होना बाकी है।
नई पीढ़ी की योगिता यादव ,आकांक्षा पारे ,इन्दिरा नाग ,व सिनीवाली शर्मा, डॉ. नीरज शर्मा ,अंजु शर्मा की कहानियों का वातावरण व शैली का बिलकुल अपनाअंदाज़ है। योगिता की कहानी `क्लीन चिट `में इंदिरा गांधी जी की ह्त्या के बाद सरदार परिवारों की विधवाओं का वर्णन है। हत्यारों को किस तरह क्लीन चिट  दे दी जाती है। ` इंद्रप्रस्थ भारती `के वार्षिक अंक में प्रकाशित सिनीवाली की कहानी `करतब बायस ` बहुत चौंकाती है  क्योंकि इसमें एक भी स्त्री पात्र नहीं है व ये गाँव के  चुनावी वातावरण को पाठकों के सामने आंचलिक भाषा के शब्दों सहित जीवंत कर  देती है। इस कहानी  की तारीफ़ मैत्रेयी जी ने  भी की है. हुस्न तब्बसुम निहां जैसे कि मुस्लिम स्त्रियों की समस्यायों  के विषय में तो दुनिया को बता ही रहीं हैं ,साथ में उन्होंने हिंदी साहित्य को कुछ सार्थक कहानियां भी दीं हैं। प्रत्यक्षा  की ताज़ातरीन कहानी `बारिश के देवता `चेरापूंजी  की परिस्थितयों के विषय में बताती एक विलक्षण कहानी है। अंजु  शर्मा ने ग्रहणी व स्वतंत्र रहने वाली स्त्री के चिरपरिचित द्वन्द को आज के माहौल  में ढालकर पारिवारिक व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए `नेमप्लेट `कहानी लिखी है। वीणा वत्सल सिंह की `इरावती `में प्रकाशित कहानी में जंगल विभाग का वर्णन है , जो पहले स्त्री लेखन में  पढ़ने को  नहीं मिला है . पहले कभी सोचा नहीं जा सकता था  कि कोई महिला [मृदुला श्रीवास्तव ]कोयला खदानों पर इतनी प्रामाणिक कहानी  लिखेगी “ `पी के टू की लोरें `   या कहानी `निचली अदालत` में यूथनेशिया [मर्सी किलिंग ]पर चर्चा होगी।   `  . पटना की विद्यालाल कहानी क्षेत्र में अपनी जगह बना रहीं थीं   कि दास्ताँ आरम्भ होते ही वह दूर देस जा बसीं। अंजलि देशपांडे पत्रकार हैं इसलिए उनकी कहानी से गुज़रना  ऐसा है जैसे यथार्थ के धरातल पर चल रहे हों।  निर्देश निधि में भी संभावनाएं हैं लेकिन अभी वे एक सशक्त  `झांनवादन `ही दे पाईं हैं। ईरा टाक `युवा पीढ़ी में एक लोकप्रिय नाम इसलिए बन गया है क्योंकि वे अधिकतर युवा समस्याओँ पर कहानियां लिख रहीं हैं।  हो सकता है आंकलन में कुछ वरिष्ठ या नए नाम  छूट भी गए हों।
इस सदी की युवा कहानीकार पीढ़ी  ख़ुशनसीब है क्योंकि अनेक पुरस्कार योजनाएं हैं जो प्रोत्साहित कर  रहीं हैं  कहानी लेखन एक सोद्देश्य कार्य है। कभी कभी मुझे लगता है कि  इस सदी में शायद ही कोई किरण सिंह` द्रौपदी पीक  `जैसी कहानी लिख पाये  लेकिन मानदंड तो टूटते ही हैं .आज जो महिलायें  लिख रही है उनके लिए नेट पर लिखने के द्वार खुल गए हैं  . पिछली पीढ़ी  ने जो संपादकों की मानसिकता व राजनीति झेली है उससे ये स्त्री मुक्त है. मनचाहा नेट पर लिख रहीं हैं या कहिये सौ प्रतिशत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सुख भोग रहीं हैं। । तो उस दवाब से मुक्त ये कितने ऊँचे मानदंड स्थापित करेंगी कौन जाने अभी तो आधी सदी भी नही गुज़री है   .

- नीलम कुलश्रेष्ठजन्म :     आगरा

शिक्षा :      रसायन विज्ञान में एम.एस सी.,एक्सपोर्ट मार्केटिंग में डिप्लोमा

लेखन परिचय :    वड़ोदरा में  स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता   -एन.जी.ओ`ज व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्तियों के साक्षात्कार ,विविध विषयों पर शोधपरक  लेखन

उपलब्धियां :  1.    गुजरात के ` हू इज हू `में से एक

2,तीन कहानियों को अखिल भारतीय पुरस्कार ,

3.रचनाओं का अनेक  भाषाओँ में अनुवाद ,

4.`अपने घर की ओर`कहानी पर टेली फिल्म ,

5,वृन्दाबन की बंगाली  विधवा  माइयों , मानव संसाधन मंत्रालय .नई दिल्ली की योजना `महिला समाख्या `, भारत के बाईस विश्व विद्यालय  के नारी शोध केन्द्रों पर राष्ट्रीय स्तर पर भारत में सर्वप्रथम लेखन

6.गुजरात की लोक अदालत को भारत में लोकप्रिय बनाने के योगदान ,

 

पुस्तकें ; 1.  सन २००१ में प्रकाशित  `हरा भरा रहे पृथ्वी का पर्यावरण `[सामयिक प्रकाशन ,नई दिल्ली ]

सन २००४ व २००५ में गृह मंत्रालय की सर्व श्रेष्ठ पुस्तकों में से एक , तीन संस्करण , गुजरात साहित्य अकादमी से  पुरस्कृत

2, सन२००२ में प्रकाशित `ज़िन्दगी की तनी डोर ;ये स्त्रियाँ“ [मेधा बुक्स ,नई दिल्ली ]

[द सन्डे इंडियन `की विश्व की  सर्व श्रेष्ठ नारीवादी पुस्तकों की सूची में शामिल ]` तीन संस्करण .गुजरात साहित्य अकादमी से  पुरस्कृत

 

3. नारीवादी कहानी संग्रह `हेवनली  हेल `[शिल्पायन प्रकाशन . नई दिल्ली ]

को अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य  पुरस्कार .

4प्राचीन स्त्री चरित्रों के व धर्म के  स्त्री शोषण के विरुद्ध .एक आन्दोलन की शुरुआत   सम्पादित पुस्तकों से

[1]“धर्म की बेड़ियाँ kiबेड़ियाँ खोल रही है औरत ` [शिल्पायन प्रकाशन ,नई दिल्ली ,सन २००८ में व सन 2010   में दूसरा संस्करण प्रकाशित  ]

[2]. `धर्म के आर पार औरत ` [किताब घर ,नई दिल्ली ]

[3.] तीसरी पुस्तक`धर्म के आर पार औरत “खंड  -२  प्रकाशाधीन

 

5 नारीवादी पुस्तक .;`परत  दर परत स्त्री `.नमन प्रकाशन से सन २००१2 में प्रकाशित  कुल आठ पुस्तकें  कुल आठ पुस्तकें

6 ` गुजरात;;सहकारिता ,समाज सेवा और संसाधन `.`किताब घर ,नई दिल्ली —– सन २००१2 में प्रकाशित –

7.`गंगटोक का एक भीगा भीगा दिन`[कहानी संग्रह ] -ज्योति पर्व प्रकाशन ,नई दिल्ली

कुल आठ पुस्तकें

प्रकाशाधीन पुस्तकें ;

1..सम्पादित नारीवादी कहानी संग्रह -नॅशनल पब्लिशिंग हाउस ,जयपुर

2.` कुछ रोग ;कुछ वैज्ञानिक शोध `,नमन प्रकाशन. नई दिल्ली

3..`वडोदरा  नी नार`[वड़ोदरा की अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रिय स्तर पर विशिष्ठ काम करने वाली महिलायों के इंटरव्यू

सम्प्रति ;   वड़ोदरा [सन ११९० में ]व अहमदाबाद[सन २००९ में ] में महिला बहुभाषी साहित्यिक मंच `अस्मिता ` की स्थापना , जो निरंतर अपनी कलम से ,मंच से स्त्री के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है

संपर्क - अहमदाबाद -३८००१५

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