इक्कीसवीं सदी का अंतिम दौर

 

इक्कीसवीं सदी का अंतिम दौर था…
सुबह-सुबह हवा के साथ पड़ोस के कारखानों का धुआँ जब नाक में घुसा तो नींद टूट गई। सामने खड़े रोबोट ने आवाज़ दी- ”जानी, आज तुमने फिर ‘मिस’ कर दिया न पानी। पाँच मिनट के लिए नल आया था, चला गया। घर के बाकी लोग तो किसी तरह मुँह हाथ धो सके।”
मैं खीझ उठा। सुबह-सुबह फिर मूड खराब।
गवर्नमेंट को कोसने लगा- हर घर में कम्प्यूटर और इंटरनेट तो लगवा दिया लेकिन पानी की कोई व्यवस्था नहीं की। अब कम्प्यूटर से तो नहाना धोना होगा नहीं। पिछले कितने दिनों से बिना नहाए ही काम चल रहा है। सोचा था। आज जरूर नहाऊंगा। लेकिन लगता है किस्मत में गंधाती-देह ही लिखी है। आज भी ‘परफ्यूम’ से काम चलाना होगा।तभी मेरा नया पड़ोसी इलेक्ट्रॉन पहुँच गया। बहुत ही तरोताजा दीख रहा था। मैं कुछ पूछता इसके पहले ही वह तपाक से बोल पड़ा-
”यार, आज मैं बहुत खुश हूँ। डट कर नहाया जो हूँ। पूरे दस मिनट नल चला। पाँच गिलास पानी से नहा कर आज जीवन सफल महसूस कर रहा हूँ। अपने नहाने की खबर मैंने ‘फेसबुक’ पर भी दे दी है। ‘ट्वीट’ भी कर दी।बधाई सन्देश आ रहे हैं। ”
मैं भीतर ही भीतर जल कर राख हो गया। प्रकट में मुस्कराता हुआ बोला, ”तुम बड़े खुशनसीब हो यार, जो पाँच गिलास से नहा कर आ रहे हो। यहाँ तो चुल्लू भर पानी नसीब नहीं हो रहा है।”
”धीरज रखो फ्रेंड, सब कुछ ठीक हो जाएगा।” मित्र मुझे सांत्वना दे कर चला गया।
किसी तरह हाथ-मुँह धोने के लिए पानी का जुगाड़ करना था। पड़ोसी के पास पहुँचा – ”भइए, दो गिलास पानी उधार दे दो, कल वापस कर दूँगा।”
पड़ोसी ने पहले तो आनाकानी की, फिर सोचा होगा कि भविष्य में जब कभी उसके ऊपर संकट आएगा, तो वह पानी के लिए किसकी शरण में जाएगा ? इसी के पास आना पड़ेगा न, इसलिए उसने मुझे पानी तो दे दिया लेकिन बार-बार कहता रहा – ”कल ध्यान से लौटा देना पानी।”
मैं प्रसन्न था। मेरे पास दो गिलास पानी है। मुँह-हाथ ठीक से धो ही लूँगा। तभी अख़बार वाला आ गया। फौरन राशिफल पर नज़र डाली, लिखा था- ‘आज का दिन ठीक रहेगा। मनचाही मुराद पूरी होगी।”
पानी मिला, वो भी सुबह-सुबह और क्या चाहिए आदमी को?यानी दिन तो ठीक रहेगा ही।
इक्कीसवीं सदी खत्म हो रही है, लेकिन हम राशिफल देखना नहीं भूलते। अब तो कम्प्यूटर भी भविष्यफल बताने लगा है। मुझे कम्प्यूटर की यह उपयोगिता बहुत पसंद आती है। आदमी को आशावादी बनाए रखता है। घरेलू कम्प्यूटर ने मुझे बताया कि घर में किन-किन चीजों का अभाव है। पत्नी ने कल रात ही तमाम आवश्यक चीजें ‘फीड’ कर दी थी शायद। कम्प्यूटर उसे बहुत पसन्द है। वह रात को अपनी मनपसन्द की चीजें फीड करके सो जाती है, सुबह मेरा सिरदर्द बढ़ जाता है।
नारी मुक्ति का ज़माना लद गया। अब तो पुरुष मुक्ति का दौर शुरू हो गया है। नारियों के ‘अत्याचार’ से पुरुष को मुक्त कराने की माँग भी रह-रह कर उठ रही है। हर कहीं औरतों का वर्चस्व है। पुरुष अपनी करनी का फल भोग रहा है। सदियों तक उसने औरत को पैरों की जूती समझ रखा था, उसे ‘अबला’ कहता रहा। अब वह ‘सबला’ हो कर सिर चढ़ कर पुरुषों का तबला बजा रही है। मैं खुद दुखी हूँ, इसलिए नहीं कि औरत शासन कर रही है वरन इसलिए कि औरत-मर्द मिल कर नहीं चल रहे। होना तो यह चाहिए कि कोई भी एक दूसरे को कमजोर न समझे।
मैं इसी तरह की बातें सोचता रहा। कि दफ्तर जाने का समय हो गया। बाहर झाँक कर देखा तो निकलने की हिम्मत ही नहीं हुई। बेहिसाब भीड़। लोग ही लोग। खोपडिय़ाँ ही खोपडिय़ाँ। अपनी तो खोपड़ी ही घूम गई। ‘कॉपर टी’, ‘कंडोम’ आदि के विज्ञापन तो खूब दिखाये जाते रहे। बच्चे भी बचपन से ही ‘दूरदर्शनी’-कृपा से ‘निलोध-निलोध’ बाद में ‘कंडोम-कंडोम’रटने लग गए थे। लेकिन टीवी का सारा प्रचार टांय-टांय फिस्स हो गया। बहादुर नौजवानों के आगे सारे प्रयास निष्फल रहे। जनसंख्या दो अरब से अधिक हो चुकी है देश की। देश के हर शहर की आबादी, बनिए के ब्याज की तरह दुगुनी-तिगुनी हो गई है। सड़क पर चलना मुश्किल है। भीड़ महाभारत का चक्रव्यूह हो गई है, जिसको पार कर निकलना उपलब्धि हो सकती है आपकी। ट्रैफिक पुलिस वाला अब तक पान ठेलों के पीछे खड़ा मिलता है। पहले की ही तरह बतियाते या फिर गाडिय़ों को रोक कर सौ-दो-सौ रुपए वसूलते हुए। इसके नीचे तो साले बात ही नहीं करते हैं।
बड़बड़ाते हुए अचानक मैं उत्तेजित हो गया। कम्प्यूटर ने सलाह दी – ‘ज्यादा दुखी मत हो, ब्लडप्रेशर हाई हो जाएगा।”
मैं शांत होकर दप्तर के लिए निकल पड़ा। आजकल पैदल ही निकलता हूँ। मोटर गाड़ी से पहले ही पहुँचना हो जाता है।
दफ्तर के क्या कहने। हर चेहरे पर मुस्कान तैर रही है। यह मुस्कान पाँच बजे तक लगातार तैरती रहती है। ‘ऊपर’ से आदेश आया है कि सबसे मुसकरा कर बातें करो, फिर चाहे जितना ‘हलाल’ करो जनता को, सब चलता है। सारे अत्याचार मुसकरा कर करने का जो राजनीतिक चरित्र हमें विरासत में मिला, वह काम में आ रहा है।
सरकार कहती है – ‘लूटो-खसूटो, चाहे कुछ भी करो। बस, हमें डिस्टर्ब मत करो। हमारी कुर्सी को कोई खतरा न पहुँचे।’ लोगों का काम बन जाता है, लेकिन छोटे-छोटे काम के लिए भी रिश्वत की दर एक हजार रुपए से नीचे खिसकते ही नहीं। लोग भी अब बुरा नहीं मानते, काम बन जाए बस। कमीशन लेना-देना लोगों के संस्कार में है जैसे। आज से पचास साल पहले तक रिश्वत को, कमीशनखोरी को भ्रष्टïचार कहते थे, लेकिन उसी दौर में यही कृत्य ‘शिष्टïचार’ में तब्दील हो गया था। और अब तो यह रोजमर्रा की जरूरत हो गई है।
दोस्त मुझसे दुखी रहते हैं। आपस में चर्चा भी करते हैं -
”ये आदमी इक्कीसवीं सदी के लायक नहीं है। घूस जैसी प्रिय चीज से परहेज करता है इसीलिए तो थिगड़ेवाली पैंट पहनता है।” लेकिन मैं खुश हूँ। इस नए दौर में, कुछ लोग तो हैं घूस विरोधी। मेरा एक मित्र भी कहता है -
”भूखे हम मर जाएंगे,
घूस नहीं अपनाएंगे।”
हर आदमी आज एक दूसरे से कह रहा है- ”बधाई हो, अब हम बाइसवीं सदी में पहुँचने वाले हैं।” गोया, काफी मेहनत करने के बाद पहुँचने वाले हों। जैसे कभी आदमी चाँद पर पहुँचा था। अरे भई, आज नहीं तो कल बाईसवीं सदी में पहुँचना ही था। कोई सुखमय भविष्य लेकर तो पहुँच नहीं रहे हो। बेहिसाब आबादी, बेरोजगारों की अंतहीन भीड़ और खून की तरह शरीर में घुला-मिला भ्रष्टाचार ही तो लेकर आए हो। हम दुखी हैं, नई-नई शारीरिक-मानसिक परेशानियों के चलते।
परेशानियों की हड़बहड़ाहट के कारण ही जाने कैसे अचानक झटका-सा लगा और नींद टूट गई। अरे….मैं तो सपना देख रहा था। गनीमत है, अभी इक्कीसवीं सदी का अंत नहीं हुआ है।
यह तो शुरुआत है।

-गिरीश पंकज

प्रकाशन : दस व्यंग्य संग्रह- ट्यूशन शरणम गच्छामि, भ्रष्टचार विकास प्राधिकरण, ईमानदारों की तलाश, मंत्री को जुकाम, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएं, नेताजी बाथरूम में, मूर्ति की एडवांस बुकिंग, हिट होने के फारमूले, चमचे सलामत रहें, एवं सम्मान फिक्सिंग। चार उपन्यास – मिठलबरा की आत्मकथा, माफिया (दोनों पुरस्कृत), पॉलीवुड की अप्सरा एवं एक गाय की आत्मकथा। नवसाक्षरों के लिए तेरह पुस्तकें, बच्चों के लिए चार पुस्तकें। 2 गज़ल संग्रह आँखों का मधुमास,यादों में रहता है कोई . एवं एक हास्य चालीसा।

अनुवाद: कुछ रचनाओं का तमिल, तेलुगु,उडिय़ा, उर्दू, कन्नड, मलयालम, अँगरेजी, नेपाली, सिंधी, मराठी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी आदि में अनुवाद। सम्मान-पुरस्कार : त्रिनिडाड (वेस्ट इंडीज) में हिंदी सेवा श्री सम्मान, लखनऊ का व्यंग्य का बहुचर्चित अट्टïहास युवा सम्मान। तीस से ज्यादा संस्थाओं द्वारा सम्मान-पुरस्कार।

विदेश प्रवास: अमरीका, ब्रिटेन, त्रिनिडाड एंड टुबैगो, थाईलैंड, मारीशस, श्रीलंका, नेपाल, बहरीन, मस्कट, दुबई एवं दक्षिण अफीका। अमरीका के लोकप्रिय रेडियो चैनल सलाम नमस्ते से सीधा काव्य प्रसारण। श्रेष्ठ ब्लॉगर-विचारक के रूप में तीन सम्मान भी। विशेष : व्यंग्य रचनाओं पर अब तक दस छात्रों द्वारा लघु शोधकार्य। गिरीश पंकज के समग्र व्यंग्य साहित्य पर कर्नाटक के शिक्षक श्री नागराज एवं जबलपुर दुुर्गावती वि. वि. से हिंदी व्यंग्य के विकास में गिरीश पंकज का योगदान विषय पर रुचि अर्जुनवार नामक छात्रा द्वारा पी-एच. डी उपाधि के लिए शोधकार्य। गोंदिया के एक छात्र द्वारा गिरीश पंकज के व्यंग्य साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययन विषय पर शोधकार्य प्रस्तावित। डॉ. सुधीर शर्मा द्वारा संपादित सहित्यिक पत्रिका साहित्य वैभव, रायपुर द्वारा पचास के गिरीश नामक बृहद् विशेषांक प्रकाशित।

सम्प्रति: संपादक-प्रकाशक सद्भावना दर्पण। सदस्य, साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं सदस्य हिंदी परामर्श मंडल(2008-12)। प्रांतीय अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ राष्टभाषा प्रचार समिति, मंत्री प्रदेश सर्वोदय मंडल। अनेक सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध।

संपर्क :रायपुर-492001(छत्तीसगढ़)। 

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