आसमान छोटा नहीं है…

 कोई कितनी दूर तक जा सकता है…? मील…दो मील…? हजार मील या…? फ़ागुनी नहीं जानती थी कि कभी वह अपने पाँवों से चल कर मीलों का फ़ासला तय कर भी पाएगी या नहीं, पर इस समय वह इतना जरूर जानती है कि साँसों की डोर पकड़ कर वह अरबों मील दूर तक आ चुकी है और इतनी दूर से लौटना बेहद मुश्किल होता है…। फ़ागुनी को कभी विश्वास नहीं था कि वक़्त आने पर वह इतनी दूरी का सफ़र  पलों में ख़त्म करना चाहेगी, पर अब…?

          अब, जब सफ़र ख़त्म करने का वक़्त आया है तो विश्वास डगमगाने लगा है । क्या करे, लौट जाए ? पर जिस निश्चय के बल पर आई है, उसी दृढ़ता से क्या वापस लौट पाएगी…? और किसी तरह वापस लौट भी गई तो क्या दुबारा सफ़र जारी रख पाएगी ज़िन्दगी…?
वह सफ़र जारी रहे न रहे, पर पाँवों के सफ़र ने फ़ागुनी को बेहद थका दिया था । उसने आसपास नज़र दौड़ाई पर कहीं कुछ भी ऐसा नहीं दिखा जो उसे सक़ून का नर्म-मरहमी अहसास दे सके । दूर-दूर तक था तो बस अनन्त, अथाह समुद्र का बलुई तट और उस तट से बार-बार टकराती बेचैन लहरें…आसपास बिखरे कुछ अधफूटे सीप…और ठोकर मार कर बड़ी बेदर्दी से तोड़े गए बालू के कुछ घरौंदे…।

सहसा फ़ागुनी एक टूटे हुए घरौंदे के पास घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी । न जाने कितने बरसों का गुबार था जो आँखों की कोर से किनारा तोड़ कर बह निकला था…। आसपास फैले लोगों को फ़ागुनी के दुःख से कोई लेना-देना नहीं था । कुछ जोड़े दूर नँगे पाँव एक-दूसरे का हाथ थामे घूम रहे थे । उन्हें देख कर उसका जी कचोट उठा । इस भरी भीड़ में भी वह कितनी अकेली थी । उसके सिर के ऊपर पसरा आसमान एक मूक दर्शक की तरह उसके भीतर की नदी को वेग से बहते हुए देख रहा था और समुद्र…? वह तो जैसे खुद गिरफ़्त में था अपनी उलझनों के…। उसके तट पर सिर धुनती लहरें बार-बार उसे परेशान कर रही थी…।
यद्यपि वो भी फ़ागुनी के दुःख से कहीं-न-कहीं द्रवित थे, पर उसे इस बात का अहसास ही नहीं था । वह तो बस पागलों की तरह उस टूटे हुए घरौंदे के कणों को अपनी हथेलियों में समेटने की कोशिश में जुटी हुई थी, पर रेत के कण थे कि बार-बार सहेजने के बावजूद बंद मुठ्ठी के झरोखे से फिसल-फिसल जाते थे । थोड़ी देर और फ़ागुनी उन्हें सहेजने की कोशिश में जुटी रही , पर जब नहीं सहेज पाई तो उन्हीं कणों के ऊपर गिर कर फिर फ़फक पड़ी जोर से…।
नीम बेहोशी की सी हालत में फ़ागुनी न जाने कितनी देर तक रोती रही । जब होश आया तो आसपास बस इक्के-दुक्के लोग ही थे । फ़ागुनी ने ऊपर आकाश की ओर देखा । उसकी छाती से छिटक कर सूरज न जाने कब का समुद्र की गोद में जा समाया था । फ़ागुनी को आभास हो गया था कि भीतर के अंधेरे के साथ-साथ बाहर के अंधेरे ने भी उसे अपनी गिरफ़्त में लेना शुरू कर दिया है ।

सहसा अंधेरे के अहसास ने उसे बेहद डरा दिया । यद्यपि वह हमेशा से अंधेरे से ख़ौफ़ खाती रही है , पर आज के अंधेरे से उसे कुछ अजीब तरह का डर लग रहा था । अलग किस्म के इस डर ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हुआ क्या था जो वह ज़िन्दगी से इतनी दूर निकल आई कि अब वापस जाना मुश्किल लग रहा है…?
फ़ागुनी उस टूटे घरौंदे को फिर से एक आकार देने की कोशिश करने लगी । मौत के आगोश में जाने से पहले वह चंद लम्हों को और जीना चाहती है । हाँलाकि समीर ने बरसों पहले ही उससे यह अधिकार भी छीन लिया था , पर फिर भी वह इंतज़ार करती रही कि अघा जाने पर शायद समीर उसे उसका वह सुख लौटा देगा, लेकिन यह इंतज़ार करना इतना लम्बा खिंच गया कि अधीर होकर वह ज़िन्दगी से ही दूर चली आई ।
फ़ागुनी का मन अचानक ही कड़ुवाहट से भर गया । समीर का नाम ही अब उसकी ज़िन्दगी में कड़ुवाहट का प्रतीक बन चुका था । उसने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस समीर के लिए उसने ज़िन्दगी के मायने को समझना छोड़ दिया था , एक दिन समीर उसे कुछ दूसरे अर्थों में उसके मायने समझा देगा ।
यद्यपि एक बार माँ ने बहाने से उसे समझाने की कोशिश की थी,” बेटा…ज़िन्दगी में खुशनुमा मौसम के अलावा एक और ऋतु भी है और वह है पतझर…। इस पतझरी मौसम के लिए भी आदमी को तैयार रहना चाहिए । पूरी ज़िन्दगी को भरपूर जीने के लिए यह जरूरी भी है…।”
आज उसे अपने पर बेहद गुस्सा आ रहा है कि चार अक्षर पढ़ी अपनी माँ की उस बात की गूढ़ता को वह समझ क्यों न पाई ? क्यों उनकी बातों को भी निपट निरक्षरी-ज~झान समझ कर नज़र-अंदाज़ करती रही…? माँ आज पास नहीं हैं…। होती तो उनकी ममता भरी छाती से बच्ची की तरह लिपट कर खूब जी भर कर रो लेती और फिर माँ हमेशा की तरह उसका मुँह चूम कर उसे समझाती…” पगली है क्या…? जरा-जरा सी बात पर कोई इस तरह मायूस होता है भला ? ऐसी निराशा भी क्या कि ज़िन्दगी का अर्थ ही बदल जाए । अरे, ज़िन्दगी का तो बस एक ही अर्थ है , और वह है  उसके दायरे में आने वाले हर मौसम को दिल से स्वीकार करना…। बेटा, जिसने हर मौसम को जी लिया, समझो ज़िन्दगी उसकी बाँदी बन गई…।”
ज़िन्दगी भर बाबूजी की बाँदी बन कर जीने वाली माँ को वह कैसे समझाती कि माँ, ज़िन्दगी किसी की बाँदी नहीं बनती बल्कि वह तो अपनी ठोकरों के नीचे रख कर इंसान को ही बन्दी बनाए रखती है ताउम्र…और रही मौसम की बात…क्या तुम नहीं जानती कि मौसम तो सिर्फ़ पतझर का ही होता है एक औरत की ज़िन्दगी में…बाकी तो सब केवल बहाने हैं खुश होने के…।
समझाना चाह कर भी कभी माँ को वह समझा नहीं पाई, और खुद भी कहाँ समझ पाई थी उस दर्शन को…। शुरू में जब अधीर होकर समीर ने कहा था ,” क्या तुम मेरी ज़िन्दगी में आकर मेरी वीरानगी को दूर करोगी…?” तब वह अवाक रह गई थी । समझ नहीं पाई थी कि समीर को क्या उत्तर दे । उस छोटी सी पार्टी में वह अपनी सहेली की ज़िद पर आ तो गई थी, पर क्षण भर बाद ही वहाँ के अभिजात्य माहौल से असहज भी हो उठी थी । खास तौर से उस पल से तो और भी , जब सहेली ने उसे समीर की ओर दिखाया था । उसने तो ध्यान ही नहीं दिया था कि कोई उसे काफ़ी देर से घूर रहा था । सहेली ने कहा तो ध्यान गया ।
समीर नाम के उस नौजवान की ओर उसे छोड़ कर सभी का ध्यान था । वह था भी बेहद खूबसूरत…। उसके कीमती सूट-बूट, उसकी स्टाइल , उसकी हर एक हरकत में एक गजब का आकर्षण था । कुछ इतना अधिक कि उसे पाने की कामना में कोई भी लड़की पागल हो सकती थी, पर वह…। माँ ने कभी उसे इतनी छूट ही नहीं दी कि वह किसी के बारे में सोच सके । सहेलियाँ उसे छेड़ती तो वह हँस कर रह जाती पर उसके भीतर भी एक स्त्री के अरमान पनप रहे थे…लेकिन कुछ समाज और कुछ माँ के भय से कोंपलें कभी भी फूट कर बाहर नहीं निकल पाई…। समीर ने कहा तो कोंपलें मानो फूट कर बाहर निकलने को हुई, पर कुछ ही देर बाद छुई-मुई की तरह अपने में सिमट भी गई । समीर को शायद उसकी यही अदा भा गई थी , तभी दूसरे दिन अपनी लम्बी सी गाड़ी में वह उसके घर के सामने था । फ़ागुनी ने देखा तो एकदम अचकचा गई । माँ क्या कहेगी…? और फिर मोहल्ले के लोग…? वे तो उसका जीना हराम कर देंगे । समीर का क्या…धूल उड़ाता आया है और धूल उड़ाता चला भी जाएगा…। रह जाएगी तो वह धूल के उस अनचाहे अहसास को झेलने के लिए…।
वह धीरे से दरवाज़ा उढ़का समीर को कुछ कहने के लिए बाहर निकली ही थी कि तभी समीर ने उसकी बाँह पकड़ ली,” देखोऽऽऽ, बड़ी उम्मीद से तुम्हारी बाँह थामी है…इसे छुड़ाने की कोशिश न करना, वरना मैं जी नहीं पाऊँगा…।”
घबराहट में वह कुछ बोलना ही भूल गई थी । बस जड़-सी खड़ी थर-थर काँप रही थी । समीर ने पल भर मुस्करा कर उसकी ओर देखा , फिर धीरे से दरवाज़ा खोल कर माँ के सामने जा खड़ा हुआ था , बिना किसी हिचकिचाहट के…” माँजी, आप मुझे नहीं जानती, पर मैं आप को जानता हूँ…। आप फ़ागुनी की माँ हैं और इस नाते मेरी भी माँ हैं…। क्या एक माँ से उसका बेटा कुछ माँग सकता है…?”
उसके इस अप्रत्याशित आगमन और सवाल से माँ भी एकदम घबरा गई थी । उन्होंने सशंकित हो फ़ागुनी की ओर देखा पर फ़ागुनी तो पहले ही डरी हुई थी । समीर समझ गया । उसने तुरन्त बात सम्हाल ली,” नहीं माँजी…इसे कुछ मत कहिएगा…। आपके दिए संस्कारों ने इसे छोटा नहीं बनने दिया है…। यह तो मैं ही हूँ जो छोटा बन कर उसका हाथ आपसे माँगने आया हूँ…।”
अचानक माँ कुछ उत्तर नहीं दे पाई थी । भीतर के कमरे से बाबूजी भी बाहर आ गए, पर थोड़ी देर बाद ही समीर ने जैसे सब को समेट लिया था अपने भीतर…। वह भी बच नहीं पाई थी । न चाहने के बावजूद खुद तो समीर के भीतर तक समा गई थी, समीर को भी अपने भीतर उतरने से रोक नहीं पाई थी । कुछ अर्से बाद जब होश आया तो समीर की बाँहों में थी ।
सहसा फ़ागुनी चिहुँक उठी । बाँह में जैसे किसी ने बहुत जोर से चिकोटी काटी हो । नंगी बाँह पर चकत्ते से उभर आए थे । कोई जंगली चींटी थी शायद, जो ज़ख़्म देकर न जाने कहाँ गुम हो गई थी और अब सिर्फ़ ज़ख़्म के निशान भर शेष थे…।
फ़ागुनी ने तिलमिला कर निशान पर हाथ रखा तो हल्की सी जलन महसूस हुई । घबरा कर उसने हाथ हटा लिया । निशान अब धीरे-धीरे आकार लेने लगा था, पर फ़ागुनी को अब इससे फ़र्क नहीं पड़ रहा था । ज़ख़्म कितना भी बड़ा आकार ले ले या फिर गहराई तक उतर कर नासूर बन जाए, दर्द तो सहना ही पड़ेगा ।
आसपास कुछ और भी जंगली चीटियाँ थी जो शायद उस टूटे हुए घर में अपना एक नन्हा सा घर बनाने का सपना लिए घूम रही थी । उस सपने से भटक कर कुछ चीटियाँ उसके कपड़ों पर भी चढ़ गई थी । फ़ागुनी ने अचकचा कर उन्हें झटका तो सब फिर उसी टूटे घरौंदे पर गिर पड़ी । फ़ागुनी भी उठ कर खड़ी हो गई । सपना पालने वाले जीव को अब न जाने क्यों वह एक क्षण को भी बर्दाश्त नहीं कर पाती ।
फ़ागुनी ने आसपास के महौल को नज़रों से परखने की कोशिश की । थोड़ी दूर पर एक नन्हा सा बच्चा पैर की ठोकरों से बालू के कणों को आसमान की ओर उछाल कर खिलखिला रहा था और उसके माता-पिता उसे मुग्ध भाव से कुछ इस तरह निहार रहे थे जैसे सारे जहान की खुशियाँ उस पल उन्हीं के पास सिमट आई हों…।
फ़ागुनी के भीतर एक कचोट सी उठी । कुछ ऐसी ही नन्ही सी खुशी उसे भी मिल जाती तो समीर के दिए सारे दुःख वह इन्हीं बालू के कणों की तरह उछाल देती पर…। फ़ागुनी के मुँह से एक निःश्वास निकल गया । मौत के आगोश में जाने से पहले पता नहीं क्यों ज़िन्दगी सोच के दायरे में खड़ी होकर उसे अपनी ओर खींच रही है ।
अपनी ही सोच में डूबी पता नहीं और कितने देर वह वहीं बैठी रही , उसे खुद ही अहसास नहीं हुआ , पर यह देख कर हल्की सी सिहरन उसके भीतर उभरी कि उस जगह वह अब एकदम अकेली थी । बच्चा अपने माता-पिता के साथ कब का जा चुका था । और भी कई जोड़े, जिन्हें रोशनी पसन्द थी, उस अंधेरे स्थान को त्याग चुके थे । अब सिर्फ़ वही अंधेरे का दामन पकड़े वहाँ थी ।

पल भर यूँ ही गुमसुम सी बैठी फ़ागुनी अंधेरे को घूरती रही, फिर उसने अपनी सिहरन को दूर झटक दिया । ज़िन्दगी में जो कुछ उसने सहा है, इस अंधेरे से वह कहीं ज्यादा डरावना है । वहाँ भी तो वह बिल्कुल अकेली है । उसके निःसंतान होने का दुःख तो उसके साथ-साथ उसके माँ-बाप को था ही, पर इससे भी अधिक दुःख उन्हें इस बात का था कि उनकी बेटी की जगह समीर ने किसी और को दे दी थी और उनकी फूल सी बेटी काँटों में उलझ कर रह गई थी । पर संस्कारों में बंधे वे अपनी शादीशुदा बेटी को उसके पतिगृह में ही देखना पसंद करते थे । कहीं-न-कहीं उनके मन में अब भी एक क्षीण सी आशा बाकी थी कि उनकी बेटी के इस पतझरी जीवन में, थोड़ी देर से ही सही, पर वसन्त एक बार दस्तक जरूर देगा । पर थोड़ी देर क्या, वसन्त तो शायद बहुत देर से भी उसकी ज़िन्दगी में नहीं आना चाहता था । तभी तो यही आस दिल में लिए उसके माता-पिता को एक दुर्घटना ने हमेशा के लिए उससे छीन लिया था । अब तो फ़ागुनी और भी अकेली थी, निःसहाय…निराश्रित…।
अपने पैसे के बल पर समीर ने न केवल उसे एक नौकरानी का सा दर्जा दिया था, वरन लाख मिन्नतें करने के बावजूद उसे मुक्त करने से भी साफ़ इंकार कर दिया था । समीर ने उसे अपने मकड़जाल में कुछ इस तरह जकड़ रखा था कि वह बाहर के उजाले को तरसती बस छटपटा कर रह जाती थी ।
समीर उसे तलाक़ देने को भी तो तैयार नहीं था…। एक बार फ़ागुनी ने अपना हक़ माँगने की कोशिश की थी, पर समीर ने उसे दो टूक जवाब दे दिया था ,” शुक्र मनाओ कि मैं तुम्हें मारपीट कर घर से निकाल नहीं रहा…वरना तुम क्या…तुम्हारी औकात क्या…? किस चीज में हो तुम मेरे बराबर…? ये तो कहो , पता नहीं किस झोंक में आकर मैने तुमसे शादी कर ली, वरना तुम जैसी कितनी मेरी ज़िन्दगी में आकर कब चली गई , मुझे याद भी नहीं…एण्ड नाऊ, गैट लास्ट…। आइन्दा अगर कभी मुझसे ज़बानदराज़ी की तो धक्के मार कर निकाल दूँगा…फिर माँगना अपना हक़…किसी कोठे की ज़ीनत बन कर…।”
” कोठा तो इस घर को बना रखा है तुमने…” फ़ागुनी कहना तो चाहती थी, पर चुप रह गई । जानती थी, समीर सच कह रहा था…। इस दुनिया में अपने बल पर सुरक्षित रह कर जी सके, इतना आत्मबल और सामर्थ्य नहीं था उसमें…।
सहसा वह काँप उठी…कहीं समीर उसे फिर से वापस ले गया तो…? शारीरिक दुःख न सही, पर यह दुःख क्या कम था कि सारा दिन नौकरानी सी काम करके वह रात के एकान्त में अपने टूटे हुए तन-मन को आराम देने के लिए सोने की कोशिश करती तो समीर और उसकी प्रेयसी की मुक्त खिलखिलाहट उसे भीतर तक और तोड़ देती ।
नहीं…आत्मविश्वास के डगमगाने के बावजूद वह समीर के साथ जाने की बजाय मौत के आगोश में जाना पसन्द करेगी…फिर मौका मिले न मिले…।
थोड़ी ही दूर पर समुद्र दहाड़े मार कर अन्धेरे को चुनौती दे रहा था और अंधेरा एकदम सन्नाटे में था । फ़ागुनी ने अपने को मजबूत किया और फिर पूरी निडरता से आगे बढ़ गई । सहसा एक सिसकी सुन कर वह ठिठक गई । चारो तरफ़ आँखें फाड़ कर देखा तो किनारे, एक बड़े से पत्थर की आड़ में बैठा कोई सिसकी भर रहा था । फ़ागुनी से रहा नहींगया और पल भर को अपना दुःख भूल कर वह उस रोने वाले की ओर बढ़ गई ।
पास गई तो अवाक रह गई । एक जर्जर बूढ़ा घुटनों में मुँह छुपाए रो रहा था । फ़ागुनी वहीं उसके पास घुटनों के बल बैठ गई,” बाबूजी…रो क्यों रहे हैं…?”
फ़ागुनी ने जैसे ही उसे पुकारा , बूढ़े ने अचानक चुप हो लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया,” आ गई मेरी बच्ची…”, पर अपनी बेटी के स्थान पर फ़ागुनी को देख एकदम अचकचा गया,” माफ़ करना बेटी…। तुमने पुकारा तो लगा मेरी बेटी है…पर फिर याद आया, वो अब है ही कहाँ…?”
बूढ़ा फिर फफक पड़ा तो फ़ागुनी का मन कचोट गया । वह उसका कंधा सहलाती उसे ढाँढस बंधाने लगी। काफ़ी देर रो लेने के बाद जब बूढ़े का मन थोड़ा शान्त हुआ तो फ़ागुनी को लगा कि शायद वह उनका ग़म थोड़ा बाँट सकती है…। मरने से पहले क्यों न किसी का कुछ भला कर दे, शायद शान्ति से मर सके…। काफ़ी कुरेदने पर बूढ़े ने अपना ग़म उसके सामने उड़ेला था,” मेरी एक ही बेटी थी…बिल्कुल तुम्हारी तरह…। पति शराबी…जुआड़ी…चरित्रहीन…। एक रात मारपीट कर निकाल दिया मेरी बच्ची को…। वह पगली सोचती थी, पतिगृह से निकाली बेटी अपने माँ-बाप पर बोझ होती है…और इस लिए मुझ बूढ़े को दुनिया में अकेला , बेसहारा छोड़, यहीं…इन्हीं लहरों में समा गई हमेशा के लिए…। जाते वक़्त उसने इतना भी न सोचा कि उसके बाद उसका यह बूढ़ा, अशक्त बाप दर-दर की ठोकरें खाएगा…कौन उसका सहारा बनेगा…?”
वह बूढ़ा फिर रोने लगा तो फ़ागुनी भी अपने आँसू नहीं रोक पाई । उसे लगा जैसे उसके बाबूजी एक बार फिर उसके सामने बैठे हैं…बेहद असहाय से…।
अनायास फ़ागुनी के भीतर एक नई सोच ने जन्म लिया…। जिस तरह से सिर के ऊपर पसरा आसमान छोटा नहीं है, बहुत विशाल है…उसी तरह मानो तो दुःखों का आसमान भी अनन्त है…पर आसमान की छाती पर उगे सूरज की तीखी धूप से बचने के लिए आदमी या तो घर की छत के नीचे रहता है, या घने पेड़ की छाँह में पनाह लेता है । उसी तरह क्या वे दोनो मिल कर दुःखों की तीखी धूप से बचने के लिए एक छाँह का निर्माण नहीं कर सकते…?
सहसा फ़ागुनी के भीतर एक अनोखा आत्मविश्वास सा भर गया,” आप की बेटी आपको बेसहारा कहाँ छोड़ गई बाबूजी…? वह तो आपके सामने है…उल्टे आपसे सहारा माँगती हुई…।”
फ़ागुनी की बात सुन कर बिना कुछ बताए ही बूढ़ा शायद सब कुछ समझ गया था । तभी तो जब उन्होंने फ़ागुनी का हाथ अपने हाथों में लिया तो उसे उनकी आँखों में खुशी के साथ-साथ एक सांत्वना की रौशनी भी दिखी…और फ़ागुनी को लगा जैसे एक घने पेड़ ने खुद अपनी बाँहे फैला अपनी छाँव में उसे पनाह दे दी हो…।

-  प्रियंका गुप्ता

जन्म-       ३१ अक्टूबर, (कानपुर)

 शिक्षा-      बी.काम

 लेख़न यात्रा- आठ वर्ष की उम्र से लिख़ना शुरू किया,  देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

 विधा-       बचपन से लेखन आरम्भ करने के कारण मूलतः बालकथा बड़ी संख्या में लिखी-छपी,

                परन्तु बडी कहानियां, हाइकु,कविता और ग़ज़लें भी लिखी और प्रकाशित

 

कृतियां-             १) नयन देश की राजकुमारी ( बालकथा संग्रह)

                        २) सिर्फ़ एक गुलाब (बालकथा संग्रह)

                         ३) फुलझडियां (बालकथा संग्रह)

                         ४) नानी की कहानियां (लोककथा संग्रह)

                        ५) ज़िन्दगी बाकी है (बड़ी कहानियों का एकल संग्रह)  

 

 पुरस्कार-  1) “नयन देश …” उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा “सूर अनुशंसा” पुरस्कार प्राप्त

               2) “सिर्फ़ एक गुलाब” प्रियम्वदा दुबे स्मृति पुरस्कार-राजस्थान            

   3) कादम्बिनी साहित्य महोत्सव-९४ में कहानी “घर” के लिए तत्कालीन राज्यपाल(उ.प्र.)                    श्री  मोतीलाल वोहरा द्वारा अनुशंसा पुरस्कार प्राप्त

 

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