अस्तित्व के लिए

 

कॉलेज से घर लौटना कितना सुकून देता है। लगता है, पंख लगाकर उड़ते हुए पल-क्षण में ही घर पहुँच जाऊँ। आराम से पैर पसारकर कुछ देर सुस्ता लूँ। कोई एक कप चाय का पकड़ा दे, और प्यार से पूछे, ‘‘गरम पकोड़े खाओगी, भूख लग रही होगी न?’’ पर यह केवल मेरा खयाली पुलाव ही है और रहेगा भी। घर की हालत, महानगर की महामारी और घर को आर्थिक सहारा देने के लिए लायी गई बहू से भला कौन पूछेगा कि बहुत थक गई है, थोड़ा आराम कर ले। अपने इसी खयाली पुलाव को रोज पकाने की चाहत के स्वप्नलोक से बाहर आती हूँ और अकेले ही खिड़की की तरफ मुँह करके मुस्करा देती हूँ। धड़धड़ाती हुई एक लोकल ट्रेन ने दूसरी को क्रॉस किया और एक छोटे प्लेटफॉर्म पर रूक गई। सामने की दीवार पर कई दिनों से एक विज्ञापन लगा है, इसी विज्ञापन के पैंफ्लेट्स महानगर की दीवारों, ट्रेन, बस सब पर छपा  हैं। एक विचित्र वहषीपन सा झलकता है उनमें। मैं रोज देखती हूँ और सोचती हूँ, क्या लोग वहाँ जाते होंगे? ट्रेन चल पड़ती है और विचार वहीं छूट जाता है।

 

ट्रेन से उतर लोकल बस और फिर एक किलोमीटर पैदल चलती हूँ, तब पहुँचती हूँ घर। घर? महानगर की एक चालनुमा बिल्डिंग के तीसरे माले पर दो कमरे एक किचन और, माले के आखिरी छोर पर बने लेटबाथ। हाँ बस यही है घर। बस से उतर अपने इसी घर तक का रास्ता तय करने के क्रम में मेरी आत्मा जिस यातना के भार से दबी जा रही है! वह यातना उन टूटे हुए ख्वाबों की है, जो यथार्थ के धरातल पर सिर पटक-पटककर टूट गए। उस कल्पना-संसार के बेरंग होने की है, जिसमें रंग भरे ही नहीं जा सके। घर जहाँ फैला होगा, सारे दिन के कोहराम का पसारा, पर फिर भी उस घर में भी लौटना अच्छा लगता है, क्योंकि नन्हीं-सी प्रिया और परागी बेताब होती हैं उसके गले में बाँहें डालने के लिए। परागी देखते ही लिपट जाती है, और सूखी पड़ रही अंतडि़यों में भी स्तन चूसती सो जाती है। भूख से बेहाल होते हुए भी उसके नन्हे होठों का स्पर्ष पाते ही जाने कहाँ से उसको सुलाने लायक दूध उतर आता है स्तनों में।

 

‘‘मम्मी, मम्मी! अम्मा ने हमें मारा।’’ प्रिया आँखों से हाथ मलती हुई कहती है।

‘‘तुमने शैतानी की थी क्या?’’ दुलारती हूँ बच्ची को।

घर में फैला पसारा समेटती जाती हूँ। दूसरी तरफ गैस पर चाय का पानी चढ़ा देती हूँ, पर पतीली खाली पड़ी है। दूध नहीं है उसमें, काली चाय में नींबू निचोड़ वही गटक लेती हूँ। दो कमरों का घर है, अम्मा, बाबूजी, विनोद, गुड्डी के साथ-साथ हमारा परिवार मैं, मदन, प्रिया और परागी। अम्मा माला लेकर बैठ जाती हैं, मैं भी सांझ का दीया-बाती करती हूँ। अम्मा हाथ जोड़ प्रार्थना के स्वर में रोज गिड़गिड़ाती है भगवान की तस्वीर के आगे, ‘‘ठाकुरजी एक पोता भी दिखा दो। एक पोते की आस में दो छोरियाँ सँभालनी पड़ रही हैं।’’

कॉलेज में महिला-दिवस पर एक संगोष्ठी का आयोजन है, सुबह जल्दी जाना है। रात में ही सुबह के कामों की तैयारी करके रख लेती हूँ, सुबह पाँच बजे उठकर सब्जी-रोटी बनाकर रख दी और अम्मा को जगाया।

 

‘‘अम्मा, आज जल्दी जाना है,’’ सहमे-से स्वर में समझाया।

‘‘अच्छा, अब ये सब भी करना पड़ेगा का?’’

‘‘नहीं अम्मा, खाना बना दिया है।’’

‘‘अच्छा, जा।’’

फिर वही एक किलोमीटर पैदल, फिर लोकल बस तक पहुँचना। कदम जैसे घड़ी के कांटों की तरह चलने लगते हैं। बस, ट्रेन, भागती-दौड़ती और वही विज्ञापन!

लौटते वक्त सरला भी साथ थी, आज उसे इधर ही कहीं जाना था। सरला मेरे साथ कॉलेज में ही प्रोफेसर है, और मैं लाइब्रेरियन। सरला का पुस्तक प्रेम हमारी दोस्ती का कारण है। वह अक्सर किताबें लेने आती है और वहीं बैठ जाती है।            सरला के हाथ में एक पत्रिका है, मैं उससे वह पत्रिका लेती हूँ। पन्ने पलटते ही एक खबर बॉक्स में छपी दिखती है, यह खबर जगह-जगह लगे उस विज्ञापन की तरफ ध्यान फिर खींच लेती है। पत्रिका में बड़े अक्षरों में एक लेख छपा है, ‘‘गर्भजल परीक्षण।’’ क्या हम फिर मध्ययुग में लौट रहे हैं? एमीनोसिंथेसिस द्वारा चिकित्सक गर्भ-परीक्षण करके यह बता रहे हैं कि, गर्भ में पलने वाला शिशु  लड़का है या लड़की।

सरला को पढ़कर सुनाती हूँ-‘‘एक अध्ययन के अनुसार गर्भजल परीक्षणों के बाद हुए 10000 गर्भपातों में 8,999 गर्भपात कन्याओं के हुए और सिर्फ एक गर्भपात लड़के का कराया गया।’’ मैं सरला को देखती हूँ। वह मेरी आँखों में उस भय को पढ़ती है और कहती है, ‘‘हाँ तो गलत क्या है हमारी तरह जिंदगी घसीटती लड़कियाँ न ही जन्मे तो अच्छा है।’’

‘‘तुम लड़की होकर इस तरह की बात कर रही हो।’’ आश्चर्य होता है मुझे।

‘‘लड़की हूँ, तभी तो कह रही हूँ।’’ सरला हँसते हुए कहती है, पर शायद उसके अंदर भी कोई रोई थी इस बात पर।

 

‘‘बेटे की चाह में जाने-अनजाने ही एक हत्यारे समाज को जन्म दे रहे थे लोग।’’ मैं कड़वा घूंट निगल लेती हूँ।

‘‘इसको रोकने के लिए कानून भी बन गए तो क्या हुआ? जानती नहीं क्या? कानून बनने पर यह बात रूक जाएगी क्या? समाज में लड़की यूँ ही बोझ समझी जाती है। दहेज हो या बलात्कार, सब लड़की को झेलना होता है। ऐसी स्थिति में लड़की न ही हो तो अच्छा है।’’ सरला प्रोफेसर है अपनी फिलासफी झाड़ने लगी।

‘‘पढ़ी-लिखी प्रोफेसर से यह सुनना कितनी अजीब बात है, सरला।’’ मैंने उसे व्यंग्यात्मक लहजे में कहा।

 

वह मेरा आशय समझ गई-‘‘तेरी भी दो बेटियाँ हो चुकी हैं, वंदना, तब भी तू इसका महत्व नहीं समझी, पगली है तू। आजकल सभी लोग इस परीक्षण के लिए उतावले हैं। गरीब लोग सामान गिरवी रखकर डॉक्टर की फीस दे रहे हैं। उन्हें यह समझाया जाता है कि अभी थोड़ा खर्च करना है, बाद में तो ढेर सारा दहेज भी देना है और आजकल तो पढ़ाना-लिखाना भी है! लड़की यानी डबल खर्चा। अरे, अगर मोहल्ले में, चाल में एक औरत यह परीक्षण करवा आई होती है और फिर लड़का होता है तो वह दूसरी को, दूसरी तीसरी को यह बात बताती है, सास दूसरी सास को उकसा देती है और हो गया इस विज्ञापन का प्रचार। बची कसर ये पोस्टर पूरी कर देते हैं।’’

‘‘ये डॉक्टर भी न।’’ मैं बात टालना चाहती हूँ।

 

‘‘डॉक्टर क्या करें इसमें। यह तो खोज है विज्ञापन की, हमारे देश के लोग, हमारा समाज ही तो पागल है। पहले साधु-महात्मा और तांत्रिक गंडे-ताबीज बांटते थे, अब डॉक्टर पानी जांचते हैं।’’ सरला वहीं उतर गई और मैं अपने खयाली पुलावों में खो गई थी। प्रिया को इस साल नर्सरी से स्कूल में डालना है और परागी को बेबी सिटर में, अम्मा की जली-कटी रोज सुनने और लड़कियों को कोसने से बचाने के लिए अब यही एक रास्ता है। कल से सामने वाले बबलू की ट्यूशन ले लूंगी, परागी के क्रैच का खर्च तो निकल ही आएगा। पत्रिका हाथ में ही रह गई, सरला जल्दी में भूल गई, पर्स में डालती हूँ पत्रिका। चलो इस बहाने रात में पढ़ने को कुछ मिल गया।

घर के दरवाजे पर अम्मा पसरकर बैठी हैं-प्रिया और परागी टकटकी लगाए अम्मा के हाथ देख रही हैं।

 

‘‘अम्मा ने प्रिया के लिए छोटी-सी गुडिया बना दी है। लकड़ी के बिता-भर टुकड़े पर चिंदियाँ लपेट-लपेटकर बांधते हुए, फुलझड़ी के तार पर कपड़े की चिंदी से बनी छोटी-छोटी-सी बांहे, मोजे के अंगूठे में रूई भरकर काट लिया और स्किन कलर का गोल चेहरा गढ़ लिया था अम्मा ने। पुरानी साड़ी की किनारी लपेटकर हाथ-पैर-धड़ सब बना दिए और काले धागे की आँख, नाक, लाल धागे के होंठ। शादी के पुराने जूड़े के बाल लग गए और लाल-पीले कपड़े से कपड़े बन गए।’’

‘‘वाह अम्मा, आपने तो गजब की सुंदर गुडि़या बना दी।’’ मैं देखती रह गई उस खिलौने को, प्रिया और परागी भी चूमने लगीं। दोनों को चाहिए थी वह तीसरी लड़की, उनके जैसी। बस वे सजीव हैं और वह पुतली। मैंने अम्मा के हाथ में चाय का प्याला पकड़ाते हुए कहा, ‘‘अम्मा, आपने प्रिया-परागी के लिए कितनी मेहनत की आज। ये बेटियां होती ही ऐसी प्यारी हैं, पर अब कल एक और बनानी पड़ेगी देखो दोनों को वही चाहिए।’’ मैंने गुडि़या से खेलती प्रिया-परागी की तरफदारी का ध्यान चाहा, पर वे जाने किस मूड में थीं।

‘‘ई खिलौना नहीं है बहू, ई तो टोटका है टोटका। अरे, तीसरी लड़की ना हो, इसलिए मैंने पुतलन बना ली, अब बेटा होना चाहिए-प्रिया-परागी की राखी के वास्ते।’’ अम्मा ने सच उगल दिया था।

अम्मा की साफगोई अच्छी लगी, मैं हँसते हुए परागी को उठा सुलाने ले गई। परागी सो गई, उसका गोरा-गोरा गोल-मटोल चेहरा और पतली-सी सुतवा नाक देखती रह गई मैं। यह गुडि़या मैंने गढ़ी थी। इतनी सुंदर प्यारी-सी ही है प्रिया भी। पर अम्मा ने टोटके के लिए बनाई गुडि़या? झूठ ही कह देतीं कि बच्चों के खेलने के लिए ही बनाई है तो मन में कसक तो नहीं होती। बात मैंने मदन को बताई थी। मदन ने हँसते हुए अम्मा की बात पर मोहर लगा दी, ‘‘हां तो गलत क्या कहा मां ने।’’ मदन ने मुझे पास समेटते हुए कहा।

‘‘अभी परागी छोटी है और आजकल दो बच्चे पर्याप्त हैं, अब हमें नहीं चाहिए बच्चा-वच्चा।’’ मैंने मदन के अपने पर झुकते हुए चेहरे पर हाथ रख दिया।

 

‘‘वाह! कैसे नहीं चाहिए! इस बात पर तो आज ही अम्मा की इच्छा पूरी कर देते हैं।’’ मदन पूरे मूड में थे, मेरी ना-नुकर नहीं चलती थी, नहीं चली। गोली मुझे सूट नहीं करती और दूसरे साधन भी मुझे ही तकलीफ देते हैं। मदन के मूड पर निर्भर करता है बचाव, वरना तो….

पत्रिका पर्स में ही पड़ी रही, सुबह जब कॉलेज के लिए लोकल ट्रेन में पर्स खोला तो पत्रिका हाथ में आ गई। पूरा अंक ही गर्भजल-परीक्षण पर विषेषांक था।

पहला ही आलेख था, ‘‘एमीनोसिंथेसिस है क्या?’’ सच तो यह है कि यह प्रक्रिया क्या है, मैं खुद भी नहीं जानती हूँ। सोचा, चलो पढ़ लिया जाए। डॉक्टर के लिखे उस आलेख में लिखा है- एमीनोसिंथेसिस एक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया है जिससे गर्भधारण के 16 सप्ताह बाद यह पता लगाया जा सकता है कि गर्भ में पलने वाली संतान लड़का है या लड़की। यह पता गर्भजल में विकसित क्रोमोजोम द्वारा ही लग सकता है। गर्भधारण के सोलह सप्ताह बाद गर्भजल (एमिनियोटिक द्रव) में भ्रूण के क्रोमोजोम विकसित होने लगते हैं। इस समय गर्भ से सीरिंज द्वारा यह एमिनियोटिक द्रव निकाला जाता है। इस द्रव की मात्रा 10 घन सेंटीमीटर होती है। इस द्रव की चिकित्सकीय प्रयोगशाला में क्रोमोजोम की जांच कर यह निश्चित किया जाता है कि शिशु पुत्र है या पुत्री। 23 जोड़े क्रोमोजोम में से केवल एक जोड़ा इनके अंतर को स्थापित करता है, एक्स और वाई क्रोमोजोम का मेल लड़के के जन्म का कारण बनता है।

ट्रेन धड़धड़ाकर अंधेरी सुरंग पार करने लगी तो मैंने पत्रिका फिर पर्स में डाल दी और मन उस अंधेरी सुरंग तक पहुँचे विज्ञापन की रोशनी के पहुँचने पर सोचने लगा। बच्चा होने की सारी जिज्ञासा….नौ माह का इंतजार ही खत्म कर दिया इसने तो?

कॉलेज से लौटते और कॉलेज जाते जिंदगी एक ही रास्ते पर चल रही है, आज शाम को थोड़ा जल्दी आकर परागी के झूलाघर होती हुई आऊँगी। यही सोचकर घर से निकली तो रास्ते में फिर सरला मिल गई, बस स्टाप पार करते हुए। चलो अच्छा हुआ, एक घंटा ट्रेन में गप्पे लगाते हुए रास्ता अच्छा कटेगा-यही सोच रही थी। ट्रेन सामने थी, पर पैर रूकने लगे उबकाई-सी आई है और चक्कर आने लगे। सरला ने बॉटल से पानी निकाला, ‘‘क्या कर रही है,वंदना! ट्रेन छूट जाएगी।’’

‘‘तू जा सरला…मैं नहीं चढ़ पाऊंगी।’’ मैंने ऊबकाई रोकी।

‘‘कुछ हुआ? कुछ बासी खाना-वाना खा लिया क्या?’’ सरला पर्स में इलायची ढूंढने लगी।

 

‘‘नहीं तो।’’ बोलते-बोलते प्लेटफार्म पर ही उल्टी हो गई।

‘‘वंदना, कहीं तू….?’’ सरला ने आश्चर्य से पूछा था!!

‘‘…ऽऽऽ….शायद….ऽऽऽ….’’

ट्रेन पटरी पर सरकती रही और मैं सरला के साथ प्लेटफार्म की बेंच पर बैठी सामने की दीवार पर लगे विज्ञापन को देखती रही। अब क्या होगा?

ऑटो पकड़ा और घर लौट आई, सरला अगली ट्रेन से मेरी अप्लीकेशन ले कॉलेज चली गई थी। घर लौटकर आंखें बंद कर लेट गई, बहुत बेचैन था मन, पढ़ी-लिखी हूँ? कौन कहेगा मुझे पढ़ी-लिखी! अभी तो मेटरनिटी लीव ली थी सवा साल भी नहीं हुआ अभी, कॉलेज में सब मजाक बनाएंगे सो अलग। फिर तीसरे बच्चे पर लीव भी….और सबसे बड़ी चिंता-अगर इस बार भी…ऽऽऽ…?

एमीनोसिंथेसिस…सोनोग्राफी…क्या करूँ?

सोनोग्राफी इतनी जल्दी नहीं बता सकती। तो क्या विज्ञापन वाली जगह…ऽऽऽ…अम्मा की खुरदुरी हथेली ने माथे का स्पर्श  किया।

 

‘‘काहे बहू, मन ठीक नहीं है का…’’

जबरन आंखें खोलनी पड़ीं, ‘‘हाँ, जी घबरा रहा है।’’

‘‘ले नींबू-पानी पी ले, पित बढ़ गया होवेगा, खाली पेट रहती है सारा दिन।’’ अम्मा के मातृत्व के आगे मैं न नहीं कर पाई, चुपचाप ग्लास खाली कर दिया था। थोड़ी ही देर में ऐसी उबकाई आई कि सब पानी बाहर आ गया।

अम्मा पहचान गई तबीयत का रूख। ‘‘बहू, तेरे कहीं दिन तो नहीं चढ़े?’’

‘‘मालूम नहीं अम्मा…देखती हूँ नहीं तो डॉक्टर के पास जाती हूं।’’

पूरे घर में यह खबर फैल गई कि बहू का पैर फिर भारी है। मदन ने आते ही मुझे चेतावनी-सी देते हुए कहा-

‘‘इस बार बगैर जाँच के नहीं चलेगा। अम्मा कह रही थी तुम्हें उल्टियाँ हो रही हैं।’’

‘‘हां!’’

‘‘तब फिर?’’

‘‘तब फिर? परेशान कर रखा है सबने।’’ मैं करवट बदल लेती हूँ, नजरें नहीं मिलाना चाहती मैं, इतनी जल्दी क्या थी बेटे की? भुगतना तो हर हाल में मुझे है। क्या करूँ? एमीनोसिंथेसिस? सीरिंज से एमिनियोटिक फ्लूड का निकाला जाना, कल्पना मात्र से सिहर उठी मैं। प्रिया-परागी को मच्छर या चींटी भी काटे तो परेशान हो जाती हूँ और अपने ही उस नन्हे से जीव में जान पड़ने से पहले ही कोई शीशी भर निकालेगा तो….कैसा अजीब-सा मन होने लगा और अगर इस बार भी लड़की ही हुई तो? तब क्या करूँगी मैं? एबॉशन? औरत होकर भी औरत के खिलाफ हो पाऊँगी मैं? ‘‘एक्स-एक्स’’ और ‘‘एक्स-वाई’’ के चक्कर में क्या मदन को समझा पाऊँगी कि बेटियों के लिए तुम जिम्मेदार हो, क्योंकि वाई क्रोमोजोम्स औरत के पास होता ही नहीं।

 

सुबह-सुबह मदन ने चाय लाकर दी-‘‘वंदी, उठो! आज मैंने भी छुट्टी ले ली है, डॉक्टर अग्रवाल के क्लीनिक पर चलते हैं।’’

मगर मैंने ना कर दी।

घर में कोहराम मच गया, अम्मा हे प्रभु….हे प्रभु….करने लगी, मदन ने खाने की भरी थाली यूं ही पटक दी और चले गए दफ्तर। अम्मा ने सुबह से एक बार भी नहीं पूछा, ‘‘बहू, जी कैसा है?’’ केवल एक ” ना ” करने पर और वह भी केवल परीक्षण  नहीं करवाने के लिए।

औरत रहेगी ही नहीं तो पुरूष को वंशज उत्पन्न करने के लिए कोख कहां से मिलेगी? पर कौन समझाएगा इस ‘‘मोक्ष’’ के लालची समाज को। पुत्र तार देगा और पुत्री जीते-जी मार देगी! जो समाज इस मानसिकता के साथ आज भी चल रहा है उसके खिलाफ किसी को तो लड़ना होगा। मैं चुपचाप डॉक्टर अग्रवाल के क्लीनिक की ओर चल देती हूँ। डॉक्टर अग्रवाल को समझाती हूँ-‘‘मुझे हर हाल में रिपोर्ट सिर्फ बेटे की चाहिए।’’

डॉक्टर अग्रवाल मदन को फोन करती है-‘‘रिपोर्ट लेते जाना, कल वंदना आई थी जांच के लिए।’’

शाम को मदन मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए घर लौटते हैं, घर में फिर कोलाहल मचता है, इस बार खुशी का।

नौ माह उसी तरह सहेजते हुए गुजरते हैं, इस बार बेटा है बहू के गर्भ में। अम्मा ने अब प्रिया-परागी को भी प्यार करना शुरू कर दिया-उनकी पीठ पर भाई जो आ रहा है। मैं अकेले में अपनी बढ़ती कोख पर हाथ फेरती हूँ, बच्चे मुझे माफ कर देना, तुम जो भी हो, मेरे हो। तुम्हें बचाने के लिए एक झूठ बोला है मैंने, मैं जानती हूँ तुम्हें मारने के पाप से यह झूठ कहीं बड़ा पुण्य है।

 

प्रसव-पीड़ा का सारे घर को इंतजार है, पीड़ा की लहरें यह सोचने ही नहीं दे रही हैं कि तुम जो आनेवाले हो, तुम कौन हो-लड़का या लड़की। एक जोरदार दर्द की लहर से सारा लेबररूम घूम गया और मैं पीड़ा-मुक्त हुई, पर बच्चे की आवाज नहीं आई थी रोने की, डॉक्टर ने सॉरी कहा और मेरे सामने मेरी मृत जन्मी बेटी को कपड़े में लपेट दिया। अम्मा और मदन को यह खबर हो गई थी, दोनों मेरे सिरहाने खड़े थे-नम आँखें और उतरा चेहरा लिए। मैंने नर्स से कहा, ‘‘मैं देखना चाहती हूँ अपनी बच्ची।’’

मैंने गोद में लिया उसे, प्यार भी किया, पर जीवन नहीं दे पाई। शायद अभिमन्यु की तरह मेरी बेटी ने भी कोख में ही जान लिया था कि उसका परिवार नहीं चाहता कि वह जन्म ले, पर मैंने तो कोशिश की थी। अपने ही (स्त्री के) आस्तित्व को बचाने की।

 

- डा. स्वाति तिवारी

 

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क -  चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

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