अश्वत्थामा… यातना का अमरत्व

“यदिहास्ति तदन्यत्र..  यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ||
अर्थात् जो यहाँ इस महाग्रंथ में है वह अन्यत्र मिल सकता है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं जो इसमें ना हो और अन्यत्र उपलब्ध हो.
श्लोक किसी दूसरे सन्दर्भ का है लेकिन ‘महाभारत’ के महाग्रंथ पर सटीक है.
निस्संदेह यह ‘महा’भारत है. इसमें प्रेम है, मोह है, राग है, द्वेष है, छल है, कुटिलता है, विवशता है, षड़यंत्र है, प्रतिशोध है, स्वार्थ है, धर्म भी है और अधर्म भी.
इस महान महाभारत का एक-एक प्रसंग शिक्षाप्रद है, एक-एक पात्र समझने योग्य है.
चाहे वह इस महासमर की नींव रखने वाले महाराज शांतनु हों या इस युद्ध को होते हुए देखने को विवश, प्रतिज्ञाबद्ध कुरूकुलश्रेष्ठ भीष्म. चाहे वह पुत्रमोह में अंधे धृतराष्ट्र हो या स्वार्थ की मिट्टी से जन्मा दुर्योधन.
एक ओर जहाँ सोलह कला पूर्ण श्रीकृष्ण का प्रत्येक घटना में व्याप्त दिव्य चरित्र है तो वहीं कुछ महत्वपूर्ण चरित्र ऐसे भी हैं, जिन्हें लोक में पर्याप्त महत्व नहीं मिला.
ऐसा ही एक रहस्यमयी गूढ़ चरित्र है चिरंजीवी ‘अश्वत्थामा’ का.
यह पात्र सर्वश्रेष्ठ शस्त्रास्त्र विशेषज्ञ गुरु का पुत्र था, शास्त्र मर्मज्ञ कृपाचार्य का भागिनेय था, ब्रह्मास्त्र का ज्ञाता था, मगर फिर भी पूरे महासमर में अल्पख्यात रहा. और जब पटल पर आया तो ऐसे कि आज भी उसके प्रति घृणा ही उपजती है.
‘अनघा जोगलेकर’ जी के लघु उपन्यास का मुख्य पात्र यही युगों युगों से चिरंजीवी ‘अश्वत्थामा’ है.
अश्वत्थामा के विषय में अनेक किंवदंतियाँ हैं. इनमें भी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध किंवदंती है उसके अमर होने के श्राप की.
जी हाँ, अमर होने का ‘श्राप’.
अनघा जोगलेकर जी ने ‘शारणदेव’ नामक सूत्रधार पात्र के माध्यम से इस रहस्यमयी पात्र के जीवन की घटनाओं व उनका उसके जीवन पर पड़े प्रभाव का विशद उद्घाटन करते हुए उस महानिन्दनीय भूल की वजह का आँकलन करने का प्रयास किया है जो उसके श्राप का कारण बनी थी.
उनका यह प्रयास बेहद सराहनीय बन पड़ा है. उपन्यास प्रारम्भ से ही रूचि उत्पन्न करने में सफल रहता है. संध्या होने पर जब शारणदेव घर लौटता है तो उसके साथ पाठक भी बेसब्री से सुबह होने का इन्तजार करने लगता है कि कब सुबह हो और कब आगे की कथा का तन्तु जुड़े. यह लेखिका की सफलता है कि वे पाठक को सतत साथ लिए जाती हैं.
कथा महायुद्ध के कई दशकों बाद की है, जब अपनी करनी के फलस्वरूप ‘यातना का अमरत्व’ भोगता अश्वत्थामा अकस्मात् शारणदेव से मिलता है. जिज्ञासु शारणदेव उसके जीवनवृत्त को सुनने की उत्सुकता दर्शाता है.
बीच-बीच में प्रसंगवश आई महाभारत की विभिन्न घटनाओं पर मानवीय दृष्टिकोण रखा गया है, जो पाठक के लिए बोनस की तरह है.
इस लघु उपन्यास में शारणदेव व अश्वत्थामा के जरिए द्रोण के जन्म से लेकर अश्वत्थामा का निर्धन बालपन, दूध के अभाव में सत्तू घोलकर पिलाना, द्रुपद द्वारा हुए अपमान से गुजरकर द्रोण का महान हस्तिनापुर साम्राज्य के आचार्य बनना, दुर्योधन के दुष्ट स्वभाव को जानते हुए भी अश्वत्थामा की उससे मित्रता, कर्ण के प्रति सहानुभूति, द्यूतक्रीड़ा व द्रौपदी चीरहरण के समय कुछ न कर पाने की विवशता, अभिमन्यु के नियमविरूद्ध छलपूर्ण वध की ग्लानि के साथ-साथ अंतिम सोपानस्वरूप युद्ध समाप्ति के बाद धोखे से शिविर में सोते पांडवपुत्रों की हत्या व उत्तरा के अजन्मे गर्भ पर ब्रह्मास्त्र के प्रयोग जैसे अतिशय निकृष्ट कृत्य तथा उसके कारण श्रीकृष्ण से मिले यातना के अमरत्व के श्राप तक विविध घटनाओं का प्रभावी चित्रण किया गया है.
अंत में सम्भवतया ‘भ्रूणहत्या’ का दण्ड कहते हुए अमरत्व के श्राप का औचित्य स्पष्ट कर हम सभी को इस जघन्य अपराध के प्रति आगाह किया गया है.
अश्वत्थामा एक भ्रमित व निर्णायक दूरगामी दृष्टि न रखने वाला अल्पसत्व चरित्र था. वह ग़लत-सही जानता तो था, मगर कभी मार्ग तय नहीं कर पाया.
इस अल्पज्ञात चरित्र पर बेहतरीन जानकारी रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करने में लेखिका अनघा जोगलेकर जी पूर्णतः सफल रही हैं.
कहीं-कहीं कुछ संक्षेप में कही घटनाओं को विस्तार देना चाहिए था तो कहीं विस्तृत कही गई घटनाओं को संक्षिप्त किया जा सकता था.
अश्वत्थामा के जीवन की कुछ और घटनाओं का समावेश भी किया जा सकता था.
शुरू-शुरू में कुछ पंक्तियों का दोहराव सा लगता है तथा मुद्रण व वर्तनी की त्रुटियाँ हैं. मगर जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, अध्याय दर अध्याय लेखन मजबूत होता स्पष्ट दिखता है.
शैली रोचक है, कथानक बाँधे रखने वाला व लयबद्ध है. पाठक, पुस्तक को एक ही बार में लगातार पढ़ने के लिए घटनाओं के साथ बहता चला जाता है.
बहरहाल यह उपन्यासिका पाँच में से चार प्लस स्टार वाली है, जरूर पढ़ी जाने वाली है. लेखिका के लेखन का वह मैजिक टच नज़र आता है. अनघा जी ने अपने पिछले पुरस्कृत उपन्यास ‘बाजीराव बल्लाळ’ से जो धमक जगाई थी, इस उपन्यासिका से वह बरकरार रखी है.
‘अश्वत्थामा… यातना का अमरत्व’  की सफलता व आगामी लेखकीय प्रस्तुति की अग्रिम शुभकामना सहित अनघा जोगलेकर जी को बहुत बधाई.
- डॉ. कुमारसम्भव जोशी
जन्मतिथि  :- 25 नवम्बर            
जन्मस्थान  :- सीकर (राजस्थान)
शिक्षा  :-        बी ए एम एस
व्यवसाय  :-   आयुर्वेद चिकित्साधिकारी,
आयुर्वेद विभाग राजस्थान सरकार में वरिष्ठ चिकित्साधिकारी के पद पर सेवारत
लेखकीय प्रगति :- 
• अक्टूबर 2016 से लघुकथा विधा में सक्रिय.
• शताधिक लघुकथाओं का लेखन.
• दो चिकित्सा विषयक पुस्तकों “चिकित्सा संभव” एवं “निदान संभव” का लेखन (शीघ्र प्रकाश्य)
• साझा लघुकथा संकलन- नयी सदी की धमक, आस पास से गुजरते हुए, उद्गार, लघुकथा कलश,  आदि में लघुकथाऐं प्रकाशित.
• स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में लघुकथाओं का प्रकाशन.
• विभिन्न फेसबुक समूहों में कई लघुकथाऐं पुरस्कृत.
साहित्यिक उपलब्धि-
• अमन साहित्यपीठ संस्था, लक्ष्मणगढ़ द्वारा वर्ष के साहित्यकार से सम्मानित.
•  मेरी लघुकथा ‘गुब्बारे’ पर आधारित शॉर्ट फिल्म इन्टरनेशनल शॉर्ट फिल्म फैस्टिवल हेतु चयनित.
• दिशा प्रकाशन की महत्वपूर्ण शृंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ खण्ड 29 में विमर्श व समीक्षार्थ चयनित.
पत्र व्यवहार हेतु पता  :-            
वार्ड नं- 36, बसन्त विहार,
सीकर (राजस्थान)    

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