अल्मोड़ा के संग -संग

21 दिसंबर 2016 । अल्मोड़ा को दूर से निहारने का समय समाप्त हुआ और उसके आगोश में जा सिमटने की  घड़ी आखिरकार आ ही गई। 2015 से,जब भी उत्तराखंड के नैनीताल या  उस हिस्से में ही कहीं और जाना हुआ, तो अल्मोड़ा जाने की चाह उभर आती, मगर संयोग नहीं बन रहा था। यह संयोग बना आकाशवाणी , अल्मोड़ा के पूर्व केंद्र निदेशक श्री बृजवाल जी एवं कार्यक्रम अधिशासी ओमप्रकाश जी के आमंत्रण पर। आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक डॉ. शिवमंगल सिंह मानवकी आंतरिक इच्छा थी, कि मैं रामगढ़ से वापस लौटते हुए अल्मोड़ा आकाशवाणी में रचना -पाठ करूँ। बतौर केंद्र निदेशक उन्होंने यहाँ अपनी छाप छोड़ी थी और यह उनके नाम और किए गए काम का असर था कि मुझे आमंत्रित किया गया था।

     रामगढ़ से अल्मोड़ा की दूरी बहुत अधिक नहीं थी, फिर भी पहाड़ी रास्तों पर शाम होने के पहले गाड़ी से सफ़र करना मुफ़ीद मानते हुए हमलोग शाम होते-होते अल्मोड़ा आ पहुँचे। देवदार की छाया के साथ ही  चीड़ का साथ भी मिलने लगा था। मेरे सहयात्री और साहित्यायन ट्रस्ट के अध्यक्ष ब्रजेंद्र त्रिपाठी ने हमारे ठहरने की व्यवस्था कुमाऊँनी विश्वविद्यालय के अतिथिगृह में कारवाई थी, हालाँकि इसके रख-रखाव के बारे में उन्हें भी बहुत जानकारी न थी।

     यह अतिथिगृह विशाल भवन था, मगर देखभाल के अभाव में दम तोड़ता -सा प्रतीत हो रहा था। कमरे और बाथरूम की हालत इतनी ख़स्ता थी कि रामगढ़ के सुसज्जित सुव्यवस्थित होटल से निकल कर बिलकुल टूटी-फूटी हालत में रहने को मन तैयार न हुआ, मगर मज़बूरी थी। बिजली कटने पर कोई व्यवस्था न थी, पानी खत्म होने पर भी कोई उपाय नहीं, चौकीदार जब सीढ़ियाँ चढ़ाता हुआ कमरे में ले गया तो एकबारगी मैं सिहर-सी गई। झड़ते प्लास्टर और टिमटिमाते बल्ब की जुगनू सी रोशनी के अतिरिक्त कमरे में कोई आकर्षण न था। खाने-पीने की व्यवस्था नहीं थी, पानी की बोतल के लिए भी ऊपर सड़क पर कोने में खड़ी इकलौती दुकान जो रेस्तरां की शक्ल लिए थी, हमारा आसरा बनी। उस विशाल भवन के अंदर जाने कितने कमरे थे, सब के सब खाली। सन्नाटे को आमंत्रित करते -से। मेरे लिए ऐसे वातावरण में रहने का पहला अवसर था। मेरे कमरे के बाद कई कमरे छोड़कर त्रिपाठी जी को कमरा दिया गया, कारण बाकी कमरों में कुछ न कुछ समस्या थी। रात बमुश्किल कटी। सोचा, जगह छोड़ दूँ, मगर छोड़कर निकलना हो न सका। सुबह उजाले ने पर्दे से ढँकी खिड़की से प्रवेश करने की चेष्टा की तो मैंने पर्दा हटा दिया। सामने हिमालय का वही टुकड़ा स्पष्ट दिख रहा था, जिसे बिनसर में कोहरे के कारण बड़ी मुश्किल से देख पाए थे।बर्फ़ कुछ इस तरह पड़ी थी कि ॐ पर्वत का गुमाँ होता था। हिमालय की चट्टानी देह पर बर्फ़ से स्पष्ट ॐ उभरा हुआ। आश्चर्य तब हुआ, जब यह पता चला कि यह दृश्य उस कमरे की खिड़की के  सिवा अल्मोड़ा के किसी व्यूपॉइंट से नहीं दिखता और हर समय नहीं दिखता। मुझे प्रतीत हुआ, शायद इसलिए यह कमरा मुझे मिला। मैंने त्रिपाठी जी को बुलाकर यह दृश्य दिखाया था, इसलिए वे मुझपर यक़ीन कर पाए, शेष वहाँ वर्षों से रहते लोगों  ने भी यक़ीन नहीं किया।

        सुबह दस बजे तैयार होकर हम आकाशवाणी के लिए निकल पड़े। पहाड़ की सड़कें समतल हों तो भी कठोरता का एहसास करा देती हैं, और ट्रेकिंग का आनंद भी नहीं देतीं। हाँ, गाडियाँ दौड़ाने के लिए बेहतर हैं। पदयात्रा करते हुए हम आकाशवाणी पहुँचे, वहाँ ड्यूटी अफ़सर राजीव सक्सेना ने जिस गर्मजोशी से स्वागत किया, सारी थकान मिट गई। थोड़ी देर में बृजवाल जी आए और वीआईपी गेस्ट रूम में ले गए। काफ़ी देर तक बातें करते हुए हम औपचारिकता की सीमा से निकल मित्रवत संवाद करने लगें, पता ही न चला, इसका श्रेय उनके  आत्मीय व्यवहार को जाता है। हमारी रिकॉर्डिंग हुई। हमने आभार व्यक्त करते हुए विदा माँगी, मगर मानवजी के नाम का प्रभाव ऐसा रहा कि उनलोगों की मेज़बानी हमेशा याद रहेगी। रेस्तराँ में चाय-कॉफी की सेवा के बाद वे ले चले आसपास की छिपी खूबसूरती के दर्शन कराने। दोपहर को सूर्यास्त के व्यू पॉइंट पर तस्वीरें लीं, ये तस्वीरें आत्मीयता के भावबोध को ज़िंदा रखने के लिए  यादगार के रूप में खिची गईं। बृजवाल जी ने अपने परिचित गाड़ी वाले को हमारे लिए बुक कर दिया । हम कसार देवी मंदिर, नंदा देवी मंदिर आदि जगहों पर  गए। जाने क्या है यहाँ जो नगर के मंदिरों में नहीं। शायद ऊँचाई पर बने मंदिर में शांति का प्रवाह, शांति पूर्ण आध्यात्म का वातावरण; पूजा- आराधना को व्यापार न बनाने की प्रवृत्ति और भक्तिभाव से  पूर्ण आचरण! राजरप्पा,तारापीठ हो या दक्षिणेश्वर या कि साईं बाबा का मंदिर– भीड़-भाड़ और शोर शराबे से दूर अंतस में भक्ति की ज्योत जलाता पवित्र वातावरण। ऐसा नहीं कि यहाँ भक्तों की भीड़ नहीं उमड़ती ,यहाँ मन्नत नहीं माँगे जाते या यहाँ चढ़ावा नहीं चढ़ाए जाते, मगर फिर भी असीम शांति का वास है यहाँ।

      मन तमाम झंझावातों से मुक्त सुकून पा रहा है। शाम होने को है । हमें डूबते सूरज का अप्रतिम दृश्य आँखों में सँजोना है। ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ ली है।

       हम सूर्यास्त के पहले ही उस स्थल पर पहुँच गए। अहा! बृजवाल जी और राजीव जी  भी यहीं हैं। ड्राइवर ने हमारा साथ छोड़ा और वे साथ हो लिए। हम विवेकानंद आश्रम गए, वहाँ जो देखा, महसूस किया, भीतर से एक ही प्रार्थना गूँजी, देश के हर प्रांत में स्वामी विवेकानद का आश्रम हो जो आज भी स्वामी जी के बताए रास्ते पर चलता हुआ समाज के उत्थान हेतु कार्यरत है, जो भगवा वस्त्र के पीछे समाज के नैतिक, आर्थिक और मानसिक विकास के लक्ष्य की पूर्ति में लगा है। जो लोगों को जगाने का काम करता है। यह और इस जैसे स्वामी जी के सभी आश्रम जनचेतना के विकास में सहायक हैं। तत्कालीन प्रभारी से मिलकर हम बड़ी- बड़ी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर, मुख्य मार्ग पर आए, जहाँ सूरज के प्रयाण की बेला हमारी राह देख रही थी। मैं उस देदीप्यमान गेरुवा रंगधारी योगी सूरज के सधे हुए क़दमों और उनके पीछे परछाई सी सिमटती किरणों को जाता देख रही हूँ। कितना शांत! कितना सौम्य! कितना अनुभवी ! है यह सूरज जो अपने तेज़ में अध्यात्म की आभा भर देता है और दुनिया को अनकहा संदेश देता है…. उदय पर दर्प न करो… अवसान निश्चित है ,इसलिए सबसे बड़ा सच है। स्वीकारो और सौम्य हो जाओ!

          डूबता सूरज आँखों को चुभता नहीं, शीतलता की अनुभूति से भर देता है, जैसे घर के बुजुर्ग की छाँह ! सूरज की अंतिम किरण के जाने तक मैं वही ठगी-सी रुकी रही। खामोश,अपलक उसे निहारती हुई। शेष जन विदा लेकर जा चुके थे। आसमान लोहित हुआ, फिर श्यामल, फिर चमकीली काली चादर ओढ़कर बैठ गया। अब उस चादर में टंके सितारे दिख रहे हैं– अरे! ये खिलंदर बादल कहाँ से आ निकले –रुई के फाहे -से ! ओहो, क्या- क्या आकृति बनाते हैं ये ! और आसमान! आसमान हमारे विस्मित चेहरों को देखकर मुस्कुरा रहा है….. हम चाँद से चाँदनी उधार लेकर अपनी राह रोशन किए बढ़ रहे हैं अतिथिगृह की ओर….    वहीं कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शेरसिंह बिष्ट जी के आवास पर चाय का न्योता है।

         शेरसिंह जी एवं उनकी पत्नी सरल , सुशील और सहृदय व्यक्तित्व हैं, व्यवहार में आडंबर का लेशमात्र नहीं। विविध साहित्यिक- सामाजिक विषयों पर चर्चा हुई। घड़ी की सूई खिसकती हुई हमें चेता रही थी कि अब हमें चलना चाहिए।उन्होंने सचेत किया कि रात 8 बजे के बाद यहाँ बाघ आता है, इन्हीं दिनों किसी पशु को पकड़ कर ले गया है। अतिथिगृह के चौकीदार ने भी आगाह किया था , मगर उनकी बात स्पष्टतया समझ नहीं पाए थे हम। शाम के साढ़े सात बज चुके थे। मैं दूर जाने से डरने लगी, थकान भी हावी हो रही थी। त्रिपाठी जी के बार- बार कहने पर निकल पड़ी, मिस्टर बाघ जी तो नहीं मिले, किंतु शराब के आदि कुछ  स्थानीय लोग लुढ़कती -सी स्थिति में ज़रूर मिले। रास्ते अजनबी से लगने लगे , यक़ीन ही नहीं हुआ कि अभी कुछ घंटे पहले तक ये हमारे संगी बने चल रहे थे। बहरहाल, रात्रि भोजन के लिए डेढ़ किलोमीटर की निरर्थक यात्रा के बाद, बंद रेस्तराँ  ने मेरे भीतर भरे दिन भर के  रोमांच को ख़त्म कर दिया था। दूसरी जगहमैं बिना भोजन किए सूप लेकर लौटी। रात के साढ़े नौ बज रहे थे। धुप्प अँधेरा ! कमरे में मोमबत्ती जलाई। एक क्षण को बिनसर में बिताई रात याद आ गई। ठंड कहर बरपा रही थी। रज़ाई में दुबकी, साँसें साधती हुई सुबह का इंतज़ार करने लगी। ओह! कितना लंबा था यह इंतज़ार!

      सुबह हिमालय -दर्शन कर, वापसी के लिए तैयार होकर विश्वविद्यालय परिसर का भ्रमण किया। ठीक दस बजे ड्राइवर सेवा में हाज़िर हो गया। मैं अल्मोड़ा से हुई  आधी- अधूरी मुलाक़ात से असंतुष्ट बालिका -सी, गुपचुप उससे फिर आने का वादा करती हुई गाड़ी में बैठ गई।गाड़ी काठगोदाम स्टेशन के लिए चल पड़ी ।

      गाड़ी चल रही है…. फिर खिली सुबह है , फिर मीठी  धूप है —–  फिर चीड़ का वही स्वागत संगीत राहों में….. संग-संग …  

 

 

- आरती स्मित

जन्म : 2 अगस्त, कटिहार,बिहार

संप्रति आवास :  गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स ,दिल्ली –92

 शिक्षा :स्नातकोत्तर (हिंदी), पीएच डी, ग्राम विकास में डिप्लोमा,  नाटक कलाकार आकाशवाणी – बी उच्च श्रेणी

 मौलिक कृतियाँ:अन्तर्मन एवं ज्योति कलश(कविता संग्रह), बदलते पल(कहानी संग्रह), फूल- सी कोमल वज्र –सी कठोर ( स्त्री विमर्श पर आधारित समालोचनात्मक कृति), तुम से  तुम तक (कविता संग्रह)

संपादित पुस्तक :पगध्वनि (कविता संग्रह), बिखरे पुष्प (कविता संग्रह)

 

पुस्तकों में संकलित रचनाएँ : देश देशांतर , लघुकथाएँ जीवन मूल्यों की, आधी आबादी का आकाश,उजास साथ रखना, डॉ. मधुकर गंगाधर की कहानी यात्रा, स्त्री सृजनात्मकता  का स्त्री पाठ,

बंदे शक्ति स्वरूपा  

 

अनूदित कृतियाँ: स्वामी विवेकानंद : युवाओं की शाश्वत प्रेरणा  (मूल अंग्रेज़ी : सन्दीपन सेन) ;राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ,नई दिल्ली ; दंबदेणीय अस्न ; सार्क कल्चर सेंटर, कोलंबो एवं दर्जन भर से अधिक बाल कृतियों का अनुवाद ;प्रथम बुक्स ।

संप्रति कार्य /व्यवसाय:महासचिव ;साहित्यायन ट्रस्टस्वतंत्र लेखन,संपादन, आलोचना, समीक्षा एवं अनुवादकार्य(विभिन्न प्रकाशन केन्द्रों के लिए,विशेष- प्रथम बुक्स, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, सार्क कल्चर सेंटर एवं एमनेस्टी इन्टरनेशनल के लिए)

 

 कात्यायनी प्रोडक्शनके लिए ‘चैतन्य महाप्रभु’ धारावाहिक नाटक लेखन एवं प्रसारण। आकाशवाणी के लिए कई धारावाहिकों एवं नाटकों का लेखन, भूमिका  एवं प्रसारण । आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कहानी, कविता का निरंतर प्रसारण । तीस से अधिक देश-विदेश की मुद्रित और वेब पत्रिकाओं में कई विधाओं – कहानी,कविता, आलेख/शोधपत्र, यात्रावृतांत, लघुकथा, हाइकु,चोका का निरंतर प्रकाशन।

प्रमुख सम्मान : काशी रत्न , नारायणी साहित्य सम्मान, गेस्ट ऑफ ऑनर (रोटरी क्लब)एक्सीलेंसी अवार्ड (मानव अधिकार संगठन) 

सम्पर्क : गणेशनगर पांडवनगर कॉम्प्लेक्स ,दिल्ली –92

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