अमृत काव्य कुंभ

वस्तुतः शुद्धता के लिए
तपना अनिवार्य था
लेकिन
कंचन की गुड़िया के
माटी के गहने और
नमक से बनी मोती वाली नथ
क्या प्रारब्ध था ?
अपने ही घड़ों को
फोड़कर
फिर से चाक पर चढ़ा
पैरों से रौंदता
गलीच कुम्हार
क्या वैतरणी पार कर पाएगा ?
मौलिक रचनाएँ
अर्थपूर्ण प्रमाण को तरसती
प्रकाशन होना सिद्ध करेगा
इनकी सार्थकता ?
शब्दों की सूंदर माला को
तोड़ – मरोड़ कर स्वान्त सुखाय हेतु
न जाने कितने अर्थ निकाले गए
बंधु , यह  जीवन झमेला
जो बुनती चली जा रही हूँ
यहाँ मोती भी माटी ही जानो
जो संचित हो रहे है कर्म के
अमृत काव्य कुम्भ में ।।
- सारिका पारीक ‘ जुवि ‘
मुझे याद नही मैंने लिखना कब से शुरू किया था । मन का लिखती हूँ , स्वयं के लिए लिखती हूँ, वास्तविक नाम सारिका पारीक है।और निवास स्थान मुंबई से हूँ । सारिका को लिखने का मौका नही मिला इसलिए ‘ जुवि ‘ लिखती हैं। *जुवि* मेरा उपनाम है जिसे तखल्लुस भी कहा जाता है। मेरी रचना  दैनिक अखबार ‘युगपक्ष ‘ , युग प्रवर्तक , मासिक पत्रिका सरस्वती सुमन और अंतरराष्ट्रीय पत्रिका सेतु में प्रकाशित हो चुकी हैं ।
कविता और संवाद में मेरी खास रुचि है । कविता मेरे मन के भाव है ,मेरे अंतस की पुकार है ,जो मैं पन्नों पर उतारती हूँ।कविता जब तक पूरी नही होती जब तक उसका हर शब्द बोलने न लगें ।कितनी ही कल्पनाएँ मन में प्रस्फूटित होती है , कितनी पीड़ा ये समाज , ये जीवन हमें देता है , तब कही एक कविता जन्म लेती है । बस इन्हीं अधपके ख्यालों के साथ जुवि लिख रही है और लिखती रहेंगी।

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