अप्रत्याशित

 

ऑफ़िस में उसे आता देख, सबकी निगाहें उसी पर टंग जातीं। यानी आज तक सबठीक है। उन निगाहों में छिपा सवाल पल्लवी को अन्दर तक मथ जाता। पिछलेएक-डेढ़ वर्ष में निखिल की हालत बद से बद्तर होती जा रही है। एक-एक करकेसब सहानुभूतिपूर्ण स्वर में निखिल का हाल पूछतीं। उनके ताज़्जुब की एक वज़हयह भी थी कि पल्लवी के ओंठों की मुस्कराहट में कोई फ़र्क नहीं आया था। हाथमें भारी से बैग के साथ ओंठों पर खिली सदाबहार मुस्कान, पल्लवी की पहचान थी,जो आज भी बदस्तूर थी।

 

‘क्या हाल है निखिल का?’

 

‘आज सुबह काफ़ी अच्छा महसूस कर रहे थे। बहुत दिनों बाद आज कुछ देर बाहरतक गए।’ उत्फुल्ल चेहरे से पल्लवी ने जवाब दिया।

 

‘चल अच्छा है। तेरी तपस्या सफल हो।’ जैसे कुछ निराश- सी शीला जी पीछे हटगईं।

हर सुबह सबका पल्लवी से एक ही सवाल रहता। आंशु को बुरा लगता, कौन नहींजानता बचपन की डाइबेटीज़ ने गम्भीर रूप धारण कर लिया था। एक्यूट डाइबेटीज़के साथ निखिल की दोनों किडनियाँ जवाब दे गईं। दिल भी अब उतना मज़बूतनहीं रह गया था कि दोनों किडनी आसानी से ट्रांसप्लांट की जा सकें। डाइलेसिस केवक़्त भी कार्डियोलॉ जिस्ट साथ खड़े, दिल की धड़कने गिनते रहते। न जाने कबदिल बोझ लेने से इंकार कर जाए।

 

निखिल की गम्भीर बीमारी के बावजूद पल्लवी नियमित रूप से ऑ फ़िस आती।घर में भी तो कोई ऐसा नहीं था जो उसके साथ खड़ा होता। वैसे भी एक-दो दिनकी बीमारी में लोग भले ही साथ दे लें, रोज़ की बीमारी में किसके पास इतना वक्तहै कि अस्पताल के चक्कर काटे जाएं।

 

बैग रख, पल्लवी अपनी जगह आ बैठी। बिना सवाल किए, आंशु पल्लवी के पासवाली कुर्सी पर बैठ गई।

 

‘आज डाइलेसिस नहीं है, पल्लवी?’

 

‘नहीं, डॉक्टर अब तुरन्त किडनी ट्रांसप्लांट कराने की बात कह रहे हैं।’

 

‘इतनी ज़ल्दी क्यों, पल्लवी?’

 

‘डॉक्टर का ख़्याल है, अभी दिल शायद आपरेशन का बोझ उठा सके। देर होने परदिल का भरोसा नहीं किया जा सकता।’ चिन्ता की लकीरें पल्लवी के माथे पर उभर आई।।

 

‘ओह ! इतनी ज़ल्दी डोनर का इंतज़ाम हो जाएगा, पल्लवी ?’

 

‘हाँ, डॉक्टर ने कुछ अस्पतालों से सम्पर्क कर रखा है। शायद दिल्ली में इंतज़ाम होजाए।’ पल्लवी आशान्वित थी।

 

पल्लवी के आशापूर्ण स्वर के बाद आंशु और कुछ न पूछ सकी उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठता, किडनी ट्रांसप्लांटेशन के लिए रूपयों की व्यवस्था पल्लवीकहाँ से करेगी ? एक बार डाइलेसिस में ही काफ़ी बड़ा खर्च आ जाता है। मध्यवर्गीयनौकरी पेशा वालों के पास इतना पैसा कहाँ से आएगा ? पिछले दो-ढ़ाई महीनों सेनिखिल डाइलेसिस पर चल रहे हैं। अक्सर बदन में फ़्लूइड भर जाता तो ज़मीन परपांव रखना भी मुश्किल हो जाता। निखिल का सूजा बदन और मुँह देख पानासबको सहज नहीं हो पाता। उसी निखिल के बारे में पल्लवी जिस सहजता से बातेंकरती कि लोग दातों तले उंगली दबा लेते। पल्लवी की एक और ख़ास बात थी।अपने दुख और समस्याओं की चर्चा उसने कभी किसी से नहीं की। आंशु को लगतावह किसी ख़ास मिट्टी की बनी थी वर्ना जहाँ ऑफ़िस की दूसरी महिला सहकर्मीज़रा-ज़रा -सी बात का रोना ले बैठतीं, अपनी गम्भीर समस्या के बारे में पल्लवी नेकभी एक शब्द भी नहीं कहा।

ऑफ़िस की पार्टी-पिकनिक में पल्लवी की उपस्थिति कुछ लोगों को आश्चर्य में डालदेती। पीठ पीछे की फुसफुसाहटें आंशु को ही नहीं, शायद पल्लवी को भी सुनाईपड़ती हों.

 

‘कमाल है घर में पति इतना सीरियस है और यह यहाँ मजे़ उड़ा रही हैं।’

‘मानना पड़ेगा, बहुत बड़े ज़िगरे वाली है। हमारे उनको तो मामूली बुख़ार भी हो जाएतो सच मानो जान ही निकल जाती है।‘ मिसे़ज मलकानी फुसफुसातीं।

 

‘ठीक कहती हैं, पल्लवी के पति को तो मामूली बुखार नहीं है न?’ चिढ़कर आंशुजवाब दे डालती।

 

‘तू तो बेकार ही नाराज़ हो जाती है। क्या हमें उससे हमदर्दी नहीं, पर हर बात कीएक हद होती है।‘ शीला जी तिलमिलातीं।

 

‘हाँ, हर बात की एक सीमा होती है। क्या आप नहीं जानतीं पिछले एक-डेढ़ वर्ष सेपल्लवी कैसी जिंदगी जी रही है। क्या ज़रा सी- खुली हवा में साँस लेने का उसेअधिकार नहीं? आंशु नाराज़ हो उठती।

 

‘हमें क्या पड़ी है, जिसका जो जी चाहे करे।‘ मिसेज़ मलकानी ने मुँह फेर लिया।

 

‘तू क्यों मेरे लिए सबसे झगड़ा मोल लेती है, आंशु? तू मुझे समझती है, बस मेरेलिए इतना ही काफ़ी है।’ पल्लवी आंशु को समझाती।

 

‘बात लड़ाई की नहीं है, मुझे उनकी ज़हालत पर गुस्सा आता है। क्या फ़र्क है इनमेंऔर अनपढ़ औरतों मे ? आंशु उत्तेजित थी।

 

‘जाने दे आंशु, खुद मेरा क्या कहीं आने-जाने का मन करता है ? निखिल ही बार-बारज़िद करके भेजते हैं। न जाऊँ तो उनका अपराध-बोध इस हद तक बढ़ जाता है किसम्हाल पाना मुश्किल हो जाता है। एकदम अपसेट हो जाते हैं।’

 

‘जानती हूँ, पल्लवी। तीस वर्ष की उम्र में तू तपस्विनी बन गई है। जिस हिम्मतके साथ तू स्थिति का सामना कर रही है, शायद उसी की वज़ह से निखिल इतनेसामान्य रह सके हैं।’

 

‘हाँ आंशु, निखिल कहते हैं बात सिर्फ़ मेरी नौकरी के पैसों की ही नहीं है, उन्हेंलगता है मेरा घर से बाहर निकलना इसलिए भी ज़रूरी है कि चार लोगों से बातकरके मन बदल जाए, वर्ना कमरे की चाहरदीवारी और अस्पताल के वार्ड्स में हीज़िंदगी सिमटकर रह जाती है। कहते हैं कमरे की क़ैद उनकी तो मज़बूरी है, परमेरी क़ैद उन्हें मंजूर नहीं…..।’ पल्लवी की आवाज़ रूंध -सी गई।

 

‘ठीक ही तो कहते हैं। तू बड़ी बहादुर है, पल्लवी। अगर तू ऐसी न होती तो निखिलकी ज़िंदगी और भी बोझिल हो उठती।’

 

‘जानती है आंशु, कभी मैं ‘डरपोक लड़की’ के नाम से पहचानी जाती थी….।’ हल्कीमुस्कान के साथ पल्लवी ने पहली बार अतीत के पृष्ठ पलटे थे।

 

‘कांट बिलीव। तू और डरपोक?’ आंशु हंस पड़ी।

 

‘सच कहती हूँ आंशु किसी मौत की ख़बर सुन, पूरी रात सो नहीं पाती थी। एम0ए0करने तक छिपकली से डर कर, अम्मा से चिपट कर सो पाती और अब हर पलमौत की आहट सुनते हुए निःशंक सो जाती हूँ। म्लान मुस्कान ओं ठो पर तैर गई।

 

‘घबरा नहीं, तेरी तपस्या बेकार नहीं जाएगी। किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद अक्सरलोग बिल्कुल ठीक हो जाते हैं। अब तू सममुच बहादुर है, पल्लवी।‘ आंशु ने बातपरिहास में टाल देनी चाही।

 

‘असल मे मैं सिर्फ़ डरपोक ही नहीं, बेहद नर्वस टेम्परामेंट वाली लड़की थी। घर मेंसबसे छोटी होने की वज़ह से सबकी लाड़ली थी। कभी कोई काम इंडिपेंडेंटली करनेका मौक़ा ही नहीं मिलता था।’

 

‘फिर अब तूने इतना सब कैसे सम्हाल लिया है, पल्लवी? निखिल को डाइलेसिस केलिए ले जाना, दसियों बार अस्पताल के चक्कर लगाना, घर-ऑफ़िस, बेटी सब कुछतेरे ही कंधों पर तो हैं।’

 

‘दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है, आंशु। निखिल अकेले बेटे हैं। एक बहिन है वह भीदुबई चली गई। ससुर जी उम्र की  वज़ह से अशक्त हो चले हैं फिर भी घर मेंउनकी उपस्थिति से बल मिलता है….।

 

‘सच वक़्त के साथ इंसान कैसे बदल जाता है, तू इसकी जीती-जागती मिसाल है,पल्लवी।’ आंशु के स्वर में आदर -सा उभर आया था।

 

‘आज जिस पल्लवी को तू देख रही है, वह अपने अम्मा-बाबूजी की नहीं, निखिल कीपल्लवी है।’ हल्का -सा गर्व छलक आया था पल्लवी की आवाज़ में।

 

‘एक बात बता, हर सुबह सबके सवालों का ज़वाब देते तो खीज़ नहीं जाती?’

 

‘नहीं आंशु, पर एक डर ज़रूर लगता है……एक दिन शायद सब ठीक न रहे। कैसेकह सकूंगी निखिल नहीं……। अचानक पल्लवी सहम -सी गई।

 

‘ऐसा क्यों सोचती है, पल्लवी?’

 

‘क्योंकि निखिल का ठीक होना चमत्कार ही होगा। लोग अगर उसी प्रत्याशित कीप्रतीक्षा कर रहे हैं, तो क्या उनकी सोच ग़लत है ? दूसरों की क्यों, क्या खुद मैं भीउसी का इंतज़ार नहीं कर रही ?’ पल्लवी की आवाज़ जैसे कहीं दूर से आ रही थी।

 

‘छिः तू इतनी हिम्मत वाली है फिर भी दिल छोटा कर रही है। भगवान पर भरोसारख।’

 

‘हाँ आंशु मैं सचमुच साहसी हूँ। मौत की पदचाप सुनते हुए, सोने की आदत डाललेना किसी कमज़ोर इंसान को शायद ही संभव हो।’

 

‘चल काफ़ी हाउस चलते हैं, तेरा मन बदल जाएगा।’

 

‘न, आज नहीं, निखिल की ब्लड-रिपोर्ट कलेक्ट करनी है।’

 

‘सच तू सच्ची साधना कर रही है, पल्लवी।’

 

‘अगर कोई किसी को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करे तो उसके लिए कुछ भीकरना बहुत आसान लगता है। तपस्या या साधना जैसे शब्द उसके आगे बेमानीहैं।’

 

‘तू निखिल को बेहद चाहती है न पल्लवी? उनके बिना  जीने की आदत कैसे…।अचानक अपनी बात कहती आंशु ने जीभ काट ली। क्या कह गई वह ?

 

‘हाँ आंशु, निखिल के बिना रह पाना शायद आसान न हो, पर डॉक्टर हर बार कहतेहैं किसी भी सिच्चुएशन के लिए मुझे तैयार रहना चाहिए।’

 

‘जानती हूँ उधर डॉक्टरों की चेतावनी, इधर लोगों के सवालों का आतंक, कैसे झेलपाती है, पल्लवी।

 

‘लोगों से शिकायत क्यों? वे तो अपना फर्ज़ अदा करते हैं। हाँ कभी उनकी आँखों मेंझांकता सवाल-और कब तक खींच सकेगी, तिलमिला जाता है। कभी-कभी हमदर्दीभी पीड़ा का कारण बन जाती है आंशु, यह बात अब जानी है।’

 

‘निखिल की मनःस्थिति तो और भी ज़्यादा तकलीफ़देह होगी, पल्लवी।’

 

‘यही तो ताज़्जुब है आंशु, जिंदगी से बेहद प्यार करने वाले निखिल जानते हैंज़िंदगी उनके हाथ से फ़िसली जा रही है फिर भी कोई शिक़ायत नहीं, कोई अवसादनहीं। मुझे हिम्मत देने के लिए कभी बेहद तकलीफ़ होने के बावजूद सामान्य रह,जबरन मुस्कराते हैं। कभी उनकी आँखों में अनगिनत सपने हुआ करते। सारीदुनिया को जीत लेने की आग रहती। वह आग अब मंद पड़ गई है, सपने जम गएहैं, लेकिन मुझे तराशने में जी-जान से जुटे हैं।’

 

‘क्या, निखिल तुझे तराश सकते हैं?’

 

‘हाँ आंशु, शादी के बाद हर काम के लिए निखिल पर निर्भर रहती। जिस दिननिखिल को अपनी बीमारी की गम्भीरता का एहसास हुआ, हर छोटे-बड़े काम कीज़िम्मेवारी मेरी होती गई। मैं रोई, प्रतिरोध करना चाहा, पर निखिल ने कभी प्यारसे, कभी डांट कर हर काम सिखाया। धीरे-धीरे निखिल कमज़ोर होते गए और मुझेमज़बूत बनाते गए। बेटी को होस्टेल में रखकर पढ़ाने का निर्णय आज ठीक लगताहै, पर तब मैं बहुत रोई थी।

 

‘देवयानी की पढ़ाई कैसी चल रही है, पल्लवी?’

 

‘बहुत तेज़ है, हर परीक्षा में फ़र्स्ट आती है। होस्टेल भेजते वक़्त उसके पापा ने कहाथा उसे डॉक्टर बनकर अपने पापा की बीमारी पूरी तरह से दूर करनी है। बस जी-ज़ान से पढ़ाई में जुट गई है।’

 

‘सच निखिल जैसे इंसान कम होंगे। इतने कर्मठ, सक्रिय व्यक्ति को घर पर रहनाकितना खलता होगा?’

 

‘जब तक शरीर ने पूरी तरह जवाब नहीं दे दिया, अपना हर काम खुद करते रहे।धीमे-धीमे ऑफ़िस जाना बंद कर देना पड़ा। अब निखिल की जगह मैंने ले ली है।निखिल घर में हैं और मैं ऑफ़िस आती हूँ।’ बात ख़त्म करती पल्लवी हाँफ़- सीउठी।

 

‘तू तो दूसरों के लिए एक मिसाल है, पल्लवी।’

 

‘नहीं आंशु मैं इन शब्दों के लायक़ नहीं। आदमी हमेशा से लापरवाह होते हैं।निखिल को बचपन से डाइबेटीज़ थी। डॉक्टर ने उन्हें जो सावधानियाँ रखने कोकहीं, उन्होंने उन पर ध्यान नहीं दिया। अगर डाइबेटीज़ पर नियंत्रण रखा जा सकेतो शायद किडनी और दिल बचाए जा सकते हैं। काश ! मैं उनकी ठीक केयर लेपाती।‘ पल्लवी ने लम्बी साँस ली थी।

 

‘जाने दे, होनी को कौन टाल सका है। अब तो उनकी केयर लेने में तू कोई कसरनहीं छोड़ रही। भगवान चाहेगा सब ठीक हो जाएगा।’

 

‘तेरी बात सच हो, आंशु। मैं तो विश्वास हार रही हूँ।’ पल्लवी उदास हो आई।

 

चार-पाँच दिनों से पल्लवी ऑफ़िस नहीं आ रही थी। पता लगा, निखिल की किडनीके लिए कोई डोनर मिल गया है। निखिल को लेकर पल्लवी दिल्ली गई है।

 

महिला सहकर्मियों की चिन्ता का ख़ास विषय यह था कि पल्लवी ने उतने ढ़ेर सारेरूपयों का इंतज़ाम कहाँ से किया होगा ?

 

‘किडनी ट्रांसप्लांटेशन में दो-तीन लाख रूपयों से कम का खर्च तो नहीं आएगा?किसने दिए होंगे ? निखिल के ऑफ़िस ने तो पहले ही आर्थिक सहायता देने सेइंकार कर दिया था। प्राइवेट नौकरी में ज़्यादा की उम्मीद ही बेकार है।’ मिसेज़जादवानी सचमुच कंसर्न थीं।

 

‘हाँ जमा-पूँजी तो बार-बार के डाइलेसिस पर ही खर्च हो गई होगी।’ जैसे शीला जीके पास निखिल के हर बार के डाइलेसिस का पूरा लेखा-जोख़ा था।

 

‘शायद ऑफ़िस से पी0एफ़0 लोन लिया हो।’ सरस्वती फिर भी सही लाइन परसोचती।

 

‘ख़ाक लोन मिलेगा। बड़े बाबू कह रहे थे मैडम का सारा पी0एफ0 उनके पति कीबीमारी खा गई।’ मिसेज़ नारायण की हमेशा से दूसरों में रूचि अधिक रहती।

 

‘अच्छा हो हम पैसों की व्यवस्था की चर्चा की जग़ह, भगवान से निखिल जी केस्वास्थ्य-लाभ के लिए प्रार्थना करें।’ सख़्त लहजे़ में अपनी बात कहकरआंशु नेफ़ाइल में सिर झुका लिया।

 

‘हमे क्या पड़ी है दूसरों के बारे में सिर खपाने की। साथ में काम करते हैं, सोसोचना तो पड़ता ही है।’ शीला जी ने नाराज़गी ज़ाहिर की।

 

‘ठीक कहती हो। हमे तो डॉक्टर साहनी ने बताया है निखिल जी के दिल की हालतभी काफ़ी नाजुक है। किडनी ट्रांसप्लांटेशन शायद आसान न हो।‘ मिसेज़ जादवानीने शीला जी की बात का समर्थन किया।

 

‘ओह उस हालत में तो रूपए भी बेकार पानी में जाएँगे। इससे अच्छा तो जो पासमें है उसे बचाकर रखती। सामने बेटी है, कल को उसका भी ब्याह करना होगा।मिसेज़ नारायण ने अपनी राय दी।

 

‘माफ़ करें, पल्लवी की जिंदग़ी, उसके सोच पर सिर्फ़ उसका अधिकार है हमें अपनीराय देने का हक़ नहीं है।’ आंशु चिढ़ गई थी।

 

‘तू तो ऐसी बात करती है, मानो तू ही उसकी सच्ची हमदर्द है। आखि़र पल्लवी सेहमारा भी कुछ रिश्ता है। शीला जी नाराज़ हो गईं।

 

निखिल के बारे में सब जानने को उत्सुक थे। बेचैनी से आपरेशन के परिणाम काइंतज़ार था। अक्सर उनकी चर्चा का विषय आपरेशन की सफलता या असफलतारहता। ऊपर से कुछ भी कहा जाता, अन्दर से असफलता का ज़्यादा विश्वास था।दूसरे शब्दों में अब क्लाइमेक्स आ पहुँची थी। बस किसी भी घड़ी चले आ रहेनाटक का परदा गिरने ही वाला था। दिल्ली से लौटे गुप्ता बाबू ने जब बतायानिखिल का आपरेशन सफल हो गया तो लोगों के बीच सन्नाटा- सा खिंच गया।

 

‘क्या कहते हैं गुप्ता जी, यह तो सचमुच चमत्कार ही हो गया।’ सरस्वती विस्मितथी।

 

‘अरे अभी क्या कहा जा सकता है, पहले यह तो देखो बाडी किडनी एक्सेप्ट करती हैया नहीं। मैं कई लोगों को जानती हूँ, जिनका आपरेशन तो हो गया बाद में शरीर नेप्रत्यारोपित अंग को स्वीकार नहीं किया।’ शीला जी ने अपना ज्ञान बघारा।

 

‘यही चाहती हैं, आप?’ आंशु अपना नियंत्रण खो बैठी।

 

बात सचमुच सोचने की थी। आपरेशन की असफलता की स्थिति में हमदर्दी जतानेके लिए हज़ार बातें थीं। शीला जी ने दूर तक की सोच रखी थी। पल्लवी का दिलजीतने के लिए अपने घर में एक कमरा मामूली किराए पर देने का निश्चय वहकर चुकी थीं।

 

‘भगवान की कृपा है। पल्लवी जीत गई, पर आगे भी सब ठीक रहे। शीला जी नेमुश्किल से बात कही।

 

‘हाँ बेचारी पर भगवान को तरस आ ही गया। हमे तो उम्मीद कम थी, पर चमत्कारभी होते हैं।’ मिसेज़ जादवानी ने तरस दिखाया।

 

‘पल्लवी कभी बेचारी नहीं थी। क्या उसने कभी किसी की सहायता माँगी, किसी केसामने रोई-गिड़गिड़ाई?’ आंशु का स्वर उत्तेजित था।

 

‘हाँ आंशु की यह बात तो सच है। पल्लवी ने किसी पर ज़ाहिर नहीं होने दिया किघर में उसका पति इतना सीरियस है। हमेशा हंसकर अपना दुख पीती रही।‘पहलीबार मिसेज़ जादवानी ने पल्लवी के प्रति सहानुभूति दर्शायी।

 

अब सबको पल्लवी का इंतज़ार था। एक महीने बाद अपनी पुरानी मुस्कान के साथपल्लवी ऑफ़िस में हाज़िर थी। सबने घेर कर  बधाइयों की बौछार कर डाली-

 

‘भई पल्लवी, मिठाई कहाँ है?’

 

‘हमें तो ग्रैंड पार्टी चाहिए, सिर्फ मिठाई से काम नहीं चलने वाला।’

 

‘हाँ भई अब तो निखिल भी कमाएंगे। दुगनी इनकम हो जाएगी।‘ शीला जी कीईर्ष्या बज उठी।

‘लगता है सिर्फ पैसा कमाने के लिए ही निखिल जी को नई ज़िंदगी मिली है। क्यों,शीला जी?’ आंशु का व्यंग्य स्पष्ट था।

‘छोड़ आंशु। ढे़र सारा काम पेंडिंग पड़ा है, पहले वो तो निबटा डालूं।‘हल्की मुस्कानके साथ पल्लवी ने बात टाली थी।

एकांत पाते ही आंशु ने पूछा-

‘अब कैसा महसूस करती है, पल्लवी? लगता होगा वर्षो का दुख, पल भर में दूर होगया ?

‘हाँ आंशु, आज ऑफ़िस में बड़ी विचित्र सी अनुभूति हुई….।’ पल्लवी कुछ कहते रूकगई।

‘क्या हुआ, पल्लवी?’

‘सबकी दयापूर्ण नज़रें झेलने की आदत बन गई थी। आज बधाइयों के पीछे छिपीनिराशा इतनी साफ़ चमक रही थी….. उसे झेल पाना सच बहुत मुश्किल लगा।’पल्लवी की आँखें पनीली थीं।

पल्लवी के गम्भीर चेहरे को आंशु अवाक् ताकती रह गई।

 

- पुष्पा सक्सेना

प्रकाशन और प्रोफाइल

पीले गुलाबों के साथ एक रात, वह सांवली लड़की, उसका सच, एक रोचक कहानी संग्रह, सूर्यास्त के बाद, पुष्पा सक्सेना की कलम से कुछ और रोचक कहानियां, अनारकली का चुनाव, विशुद्ध हास्य-रस से सराबोर नाटक जो जीवन को हास्य के इन्द्रधनुषी रंगों में रंग देते हैं, नन्हे इन्द्रधनुष, अनोखा रिश्ता (अंग्रेजी, मराठी और पंजाबी अनुवाद)

प्रकाशन:

२४ किताबें:

  • ९ कहानियों के संग्रह
  • ५ बेस्ट सेल्लिंग उपन्यास
  • ७ बच्चों के लिए कहानी की किताबें
  • ३ प्रेमचंद और दूसरों की सरल कहानियों और एक अधिनियम नाटकों का संग्रह
  • मॉस्को विश्वविद्यालय, रूस के हिंदी विभाग में पाठ्य पुस्तक की रूप में मेरी किताब को इस्तेमाल किया जा रहा है
  • कई कहानियाँ वाशिंगटन विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं
  • 100 से अधिक कहानियां, लेख, यात्रा विवरण, लोकप्रिय भारतीय राष्ट्रीय पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित :
  • धर्मयुग; इंडिया टुडे; हंस; कादम्बिनी; वामा; साप्ताहिक हिंदुस्तान; वर्त्तमान साहित्य; समां कल्याण; वागर्थ; सरिता; मनोरमा; घर शोभा; मुक्त; आज कल; वनिता; अन्य

 

टेलीविज़न:

  • कई पटकथाएं को शैक्षिक फिल्मों में विकसित किया और स्थानीय और भारतीय राष्ट्रीय टीवी पर उसका प्रसारण किया गया,
  • “प्रयास” टेली फिल्म के लिए पटकथा, नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कार्पोरेशन, मुंबई द्वारा बनाई गई
  • “वजूद” एक चार प्रकरण धारावाहिक, दिल्ली दूरदर्शन पर प्रसारित
  • बच्चों के लिए प्रश्नोत्तरी लेखन और दूरदर्शन पर आयोजन
  • “चूना है आकाश ” एक शैक्षिक टेली फिल्म दिल्ली दूरदर्शन पर प्रसारण
  • रांची दूरदर्शन द्वारा प्रसारित फिल्मों के लिए पटकथा लेखन
  • “पुकार” कन्या भ्रूण हत्या पर एक वृत्तचित्र भारत के फिल्म प्रभाग द्वारा निर्मित
  • लघु टीवी फिल्म स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा विकसित
  • भीमसेन जोशी, राजेन्द्र यादव, तीजन बाई, किरण बेदी, अन्य, जैसे कई प्रसिद्ध हस्तियों के लिए टीवी साक्षात्कार आयोजित

 

रेडियो:

  • एड्स के बारे में जागरूकता बढ़ाने और रोकथाम के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के द्वारा ऑल इंडिया रेडियो पर ३ सालों तक प्रसारित कार्यक्रम में १२ क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन
  • नई दिल्ली और रांची आकाशवाणी द्वारा प्रसारित कई नाटकों, नाटक, शैक्षिक और काल्पनिक कहानियां

 सम्मान और पुरस्कार: 

  • बी ए, हिंदी, तीन स्वर्ण पदक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, भारत
  • अकादमिक उत्कृष्टता के लिए यु पी राज्य सरकार मेरिट छात्रवृत्ति
  • तीन विशिष्ट सेवा पुरस्कार – सेल, रांची, भारत
  • नवाचार ट्राफी, मॉरीशस
  • हिंदी के कार्यान्वयन के लिए पूर्वी क्षेत्र भारत ट्रॉफी
  • कहानी / लेख हिंदी में के लिए तीन राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार
  • भारत के लेखक गिल्ड, पुस्तक “अलविदा” के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार

 

शिक्षा: 

  • पी.एच.डी. (हिन्दी) रांची विश्वविद्यालय, झारखंड
  • एम.ए. (हिन्दी) रांची विश्वविद्यालय, झारखंड
  • एम.ए. (भूगोल) इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
  •  बी.ए. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद

 

अनुभव: 

  • कार्यक्रम के निदेशक – सेल संचार नेटवर्क (केबल टीवी नेटवर्क) – 9 वर्ष
  • वरिष्ठ हिंदी अधिकारी – अनुसंधान एवं विकास केंद्र, सेल, रांची – 12 साल
  • कॉलेज प्राचार्य, बोकारो गर्ल्स कॉलेज – 5 साल
  • प्राचार्य, लाला लाजपत राय स्कूल रांची, झारखंड – 3 साल
  • सेंट जेवियर्स, बोकारो, बोकारो गर्ल्स कॉलेज, बोकारो, हिंदी और भूगोल के लिए इस्पात पब्लिक स्कूल, राउरकेला में व्याख्याता; वसंत वैली, नई दिल्ली – 20 साल

 

सदस्यता: 

  • सदस्य, भारत के लेखक गिल्ड
  • सदस्य, लेखिका संघ, नई दिल्ली
  • हिंदी संगठनों के एक नंबर के सदस्य
  • सदस्य, कार्यकारी समिति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ, नई दिल्ली

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