अपनों का दर्द

उनकी जिंदगी की वह खूबसूरत शाम थी, जबकि उसने यह कहकर कबूल कर लिया था कि जिंदगी उस कागज के बने नाव का नाम है, जिसकी बनावट और आकृति देखने में मनमोहक तो होती है, मगर जरा सा पानी की बूंद से गलने लगता और वह रफ्ता रफ्ता खो देता है सब कुछ -जीवन, यौवन और अपना उपवन। इस कालमयी सत्यता को किस नाम से पुकारा जाय या यूँ ही बर्दाश्त कर चुप रहा जाय के प्रश्न के जालों में फंसा अंकुर अपने दर्दों को उकेर देना चाह रहा था।

शाम सुहानी होती है, या लगती है यह एक जटिल प्रश्न है। लोगों की अवधारणा मन में बैठ गई है कि शाम सुहानी होती है, अथवा है यह कहकर वे अपने आप को आराम की दुनियां में ले जाना चाहते या फिर सन्तोष कर लेना चाहते, विचित्र प्रश्नवाचक है। अलबत्ता आज की शाम अपनी मन्द मन्द मुस्कान देकर पहाड़ियों की ओट से निहार रही थी चुपके से यथा – कोई नवबधू अपनी घूँघट के अंदर से झांक लेती है अपने प्रियवधू को आरम्भन में।

सच में यह जीवन भी क्या है? क्यों है? किस कदर है? ये प्रश्न तब और भी जटिल हो जाता, जब जीवन की राहों में अनगिनत निराशा एक के बाद एक करके आती रहतीं और दूर तल्क आशा की कोई भी शिखा, कोई भी किरण नजर नहीं आने लगती। आज अंकुर के मष्तिष्क में कुछ ऐसी ही उलझनें उनके अपने भविष्य को लेकर थीं, जो स्वाभाविक ही था। परिश्रम जब अपने गर्भ से सफलता रूपी वत्स को जनन नहीं दे पाती या फिर जनन देने लायक नहीं होती तो उसे अजननी कह देने में क्या हर्ज है? जब जन्मदातृ ही के मन में लिंग भेद की भावना उत्पन्न हो जाये तो जन्मोपरांत भी जननी कहना कहाँ तक उचित है? फिर जन्म देकर भी उचित ममता, स्नेह, वात्सल्य, और प्रेम की पवित्रता को सही पैमाने पर नहीं दे सकने में समर्थ हो सकी तो उसे जननी कहना कहाँ तक और किस एक्सटेंट तक सही है? इस तरह के अनेक सवाल के मध्य खुद को पाते अंकुर आज अपने दिल के दर्दों को खोलकर रख देना चाहता था, जिस किसी के भी सामने उस सुहानी शाम को।

यह दृश्य कुछ ख़ुशी भी देती है और कुछ दर्द भी। दर्द क्या चीज होती है, इसे दुनिया का कोई भी चिकित्सक परिभाषित नहीं कर सकते न ही माप सकते और न ही इसके उठने की निश्चित जगह को इंगित कर सकते। केवल एहसास कर सकते, और वह भी साहित्य की सरावोर में डूबते उतराते एक सह्रदय जन, जिसकी कल्पना, नभ को भी भेद कर पार कर जाती और भूतल को भी, जहाँ किरणें असंख्य, अनगिनत और अपरिमित होती।

दर्द की गहराई में बैठा आज अंकुर एक ऐसी लोक में पहुंच गया था , जहां काव्य की देवी ही जा सकती थीं या फिर बहुत जख्म खा चुके एक अभागा ही, जिसकी उत्पत्ति-सीमा संसार से पृथक और परे हों।

कहते हैं, वक्त बड़े से बड़े सख्शियत को भी अपने शिकंजे जकड़ लेता, चाहे वह उम्र की किसी भी पड़ाव पर ही क्यों न हो? अपराध नहीं मरता, भले ही अपराधी मर जाता है। अपराध और अपराधी दोनों ही एक दूसरे को लांछना देती, लेकिन सच्चाई यह है कि अपराध के कारण ही अपराधी बन जाता कोई और इसकी सजा मिल जाती उन्हें। सज़ा कठोर हों या कमज़ोर पर इसका प्रभाव जीवन के हर पहलुओं को प्रभावित कर डालती है। इस कदर के नाना प्रकार की बातें अंकुर की आँखों के सामने नाचने लगती और वह फिर खो जाता ।

वह यकायक उस दहलीज पर जा पहुंचा, जहां उनकी प्रिया के साथ हुई दोस्ती की पहली गुफ़्तगू उन्हें कचोट डालतीं – हाँ, हाँ, मालूम है। मुझको सब कुछ मालूम है। प्रिया उतनी ईल माइंडेड भी नहीं है। अरे पहले बायो से पास आउट हुई है, फिर पी.जी. में जाकर एंथ्रो रक्खी है।

अच्छा प्रिया, तुम ये बताओ कि तुम क्या सोचती हो लाईफ के बारे में?

नथिंग, कुछ भी नहीं।

क्यूं?

यूँ ही, क्या होगा सोचकर । मिला है, किसी को कुछ सोचकर…?

क्यों नहीं, सब कुछ तो सोच से ही मिलती है न?

नहीं, सोचने से कोई राह मिलती नहीं यारो, गर कुछ करनी है तो अलग विश्वास पैदा कर।

हर वक्त ये शेरो-शायरी काम नहीं आती। समझे?

जी, आती नहीं है। बट, शायद तुमको मालूम होगा कि दो पंक्तियाँ दो सौ साल तक जिन्दा रहती हैं।

इससे क्या हो जाता?

देखो, मैं यहां डिबेट नहीं कर सकता। यह कोई कम्पटीशन का प्लेटफार्म नहीं है। बी कूल एंड एन्जॉय।

एन्जॉय का क्या मीनिंग हुआ?

मतलब आनन्द, खुश और क्या?

तो तुम ये चाहते कि खुश रहूँ।

और क्या?

ख़ुशी का कोई पैमाना नहीं होता, और न ही कोई ऑब्जेक्ट। एक ही चीज किसी को ख़ुशी दे सकती है, तो किसी को तकलीफ।

सो कैसे?

जो किसान रबी की फसल लगाया हों, उसके लिए जल का होना उस वक्त ख़ुशी देता है, वहीं किसी के घर, जिसने उजाड़ रखा है, तकलीफ भी। और भी बहुत हैं।

जैसे?

जैसे क्या? हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। किसी की प्रिया की शादी उसे तकलीफ देती है, तो किसी को ख़ुशी भी, जिसके साथ शादी होनी होती है। एक रिजल्ट किसी के जीवन को लेकर आती है, तो वही रिजल्ट किसी के मौत का कारण भी बन जाती है।

ओह… ऐसी बात है?

तो…?

फिर ख़ुशी किसमें है?

ख़ुशी किसी में नहीं है। मन में है। अपनी इच्छा में है। सोच में है। अपनापन में है। सच ही कहा जाता रहा है कि “ख़ुशी सपनों में नहीं अपनों में है”।

कैसे….

अगर ख़ुशी सपनो  में होती तो आई ए एस करने के बावजूद बक्सर के कलक्टर ने सुसाइड क्यों की?

अरे, बाप रे! तुम तो हद से भी ऊपर हो।

क्यों?

कलेक्शन…अपडेट, प्रजेन्स ऑफ़ माइंड….

और बोलती जाओ। कुछ बाकी है तो।

नहीं, समझ गई।

क्या?

यही कि ख़ुशी क्या है, किसमें है, किस तरह है।

फूल… मूर्ख, तुम कुछ भी नहीं समझ पाई। अभी तो मैं कुछ बोला ही नहीं।

क्या और भी एक्जामपल देने हैं?

जी, एक और।

क्या? बोल ही डालो।

जी, जब सीता जी राम के साथ थी तो उसे हिरण चाहिए था, और वही सीता जब सोने की नगरी में थी तो उसे राम चाहिए था, सोने की नगरी नहीं।

मतलब क्या हुआ?

बस, यही की खुशियां वस्तु में नहीं, परिस्थितियों में होती है।

अच्छा बाबा समझ गई। बहुत इंटेलीजेंट हो।

नहीं, इंटेलीजेंट की बात नहीं है।

ओ, एक बात बताओगे अंकुर?

बिल्कुल, हंड्रेड परसेंट।

अच्छा ये बताओ, अगर मैं तुमसे रोज बातें करूँ तो तुम कैसा फील करोगे?

बहुत ही बुरा…

सच

जी, बिल्कुल सच।

क्यों?

यूँ ही मेरा मन, और क्यों?

तब भी, आखिर बुरा मानने की कोई वजह तो होगी न?

अरे, वजह ढूँढ़ने वालों की वजह होगी। हमको बेवजह कोई वजह नहीं ढूँढ़नी है।

फिर भी ….

देखो प्रिया, मौत से कोई बातें करना पसंद करेगा?

बेवकूफ़… कांच के टुकड़े।

ये कौन सा प्रोवर्ब है?

है, यूनिवर्सल ट्रुथ।

जी, ये क्या ट्रुथ पेस्ट की बात कर रहे हो जी।

ओ, तुमको ये टूथ पेस्ट नजर आते…?

तो….

नहीं, तुम न, खाली डिब्बा हो।

कैसे?

जिस डिब्बे में कुछ नहीं रहता, वह खाली ही होता है न?

मतलब, मैं बेवकूफ हूँ। खाली डिब्बा हूँ। मुझमें कोई इनिसिएटिव नहीं है?

है, बट, तुम न होलो  हो, होलो ।

अरे, ये क्या वर्ड ले आई फिर…

लाई कहाँ, पहले से ही थी। मैं तो सिर्फ एप्रोप्रियेट प्लेस पर हैंग कर दी।

तुम न प्रिया, सचमुच जहां जाओगी सब को उल्लू बना दोगी।

और जहां पहले से उल्लू होगा, वहां?

वहां बोतल छाप, समझी।

तुम सीरियसली ले ली क्या?

इसमें सीरियस और जेनरल की क्या बात है। तुम मेल जाति न अपने को हमेशा से होशियार समझते रहे हो। लेकिन सच्चाई यह है कि तुम मेल को जन्म देनेवाली कोई फीमेल ही रही होगी। अपने आँचल में पालकर बड़ी की होगी। और हाँ उस वक्त तुम मेल ने कभी यह नहीं कहा होगा कि बोतल है,बोतल। अरे अंकुर, खुद को देखो। तुम कैसे लगते हो।

इसका मतलब मैं बोतल हूँ। नहीं जी, मैं खुलकर बातें कर लेती हूँ, इसका कभी यह मतलब नहीं समझ लेना कि मैं बेवकूफ हूँ। जी.जी.एम.पी. नहीं हूँ, समझे। अपने को बहुत ही ज्यादा काबिल मत समझो। मेरे पास आइना है, आइना। दिखा दूंगी। पता चल जायेगा अपनी सूरत का।

देखो, प्रिया, देखो जंगल की ओर देखो। घने से घने जंगल में भी हवाएं गीत गाती है। अपनी धुन में सितार बजाती है। इतना ही नहीं डालियों की बांह में बैठकर मुरली भी बजाती है।

जी, तुम्हारा कपार। और बोलो न कन्हैया बनकर बांसुरी की तान भी सुनाती है।

जी, यह भी तो… इतना ही नहीं। कभी-कभी तो इंद्र भगवान की सारथि बनकर सैर भी करती है।

देखो प्रिया , एक बात कहूँ…?

नहीं….,

तुम नर जाति न, बहुत ही धूर्त होते हो। पहले ही यह वादा करा लेते हो कि ‘बोलो, कोई तकलीफ तो नहीं होगी…. किसी को बोलोगे तो नहीं…. बात तो मान लोगे… बुरा तो नहीं मानोगे… वगैरह-वगैरह…. ताकि बेवकूफ बनाने का कोई कसर बाकी न रहे और मोटीवेट करने का अच्छा मौका मिल जाये’।

इस कदर की फ़िजूल बातों से कुछ भी होने को नहीं है। तुम नाहक ही दोष देती हो। अगर इतना ही दोषपूर्ण होते हैं ये नर जाति तो फिर इसी के लिए क्यों इतनी मारा मारी होती है। स्मार्ट, नौकरी, तो कभी इंटेलिजेंट, की तलाश क्यों करती है, लड़कियाँ…?

चलो कुछ दिल की बातें करूँ।

कहाँ चलूं…?

जहाँ सूरज न जा सके, न चंदा लुभा सके, न ही हवाएं डिस्टर्ब करे और न ही कोई आता जाता हों।

फिर भी कहाँ? जमीं के ऊपर या आशमा के नीचे….?

बहुत मुश्किल है जगह तय करना। हालात जहाँ ले जाये, चाहे वह आशमां के ऊपर हो या फिर जमीं के नीचे।

तुमको पता है अंकुर मैं परित्यक्ता हूँ। मीनिंग समझ रहे हो न..?

जी, नहीं ।

मतलब किसी की बनी थी फिर मुझे त्याग कर दी गई।

सच…. श्वांसों को लंबी खींचते हुए…

जी, सच… मैं एक अभागिन हूँ। समाज की नजरों में एक कलंक। एक बोझ, एक प्रिया।

तो फिर बोलूं..?

बिल्कुल।

मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ। बहुत ही ज्यादा।

हूँ, क्यूँ?

बस दिल आ गया। काबू नहीं कर पाया और धीरे धीरे मन से बहुत ही करीब होता चला गया।

लेकिन….?

क्या…?

यही कि तुम्हारी हर ख़ुशी से खुश होता और किसी भी तरह की परेशानी से काफी परेशान हो जाता।

लेकिन… उहुँ , नहीं प्रिया, तुम झूठ बोल रही हो।

मैं झूठ नहीं बोलती हूँ। मैं सच बोलती हूँ। मैं एक ऐसी प्रिया हूँ, जिसे समाज के लोग बदचलन के नाम से जानते हैं। काले करतूत करनेवाली एक काली प्रिया। समाज द्वारा घृणित एक अभागिन।

लेकिन, ऐसा हो सकता है? तुम सच नहीं बोल रही हो प्रिया। मुझे तुमसे मुहब्बत हो गई है। मैं तुम्हारी आवाज, तुम्हारे विचार से प्रभावित होकर प्यार करने लगा हूँ।बहुत दूर निकल चुका हूँ। बहुत दूर….जहां से वापस आना बड़ी मुश्किल होगा। नहीं प्रिया, तुम मुझसे ……नहीं, नहीं…

जी अंकुर, भावना में बहना और जीवन साथी के रूप में जीवनभर रहना दोनों अलग अलग चीज होती है। मेरी एक सहेली ने मुझे लिखा – “मैं नशा हूँ… बट, पीने के पहले की या फिर पीने के बाद की”। बात कुछ नहीं है, लेकिन कितनी बड़ी बात है कि अगर कन्या हूँ तो यह केवल उपभोग मात्र है या फिर खिलौने की तरह। हर पुरुष जाति की यह मंशा होती है कि मुझे जो भी कन्या मिले, शुद्ध मिले, पूर्ण मिले, और सुंदर मिले।

ऐसे में, मैं शुद्ध नहीं हूँ, न ही सुंदर और पूर्ण हूँ। क्यों मेरे साथ तुम भी अपमानित महसूस करोगे? अरे, अंकुर, हम नारी तो हमेशा से अपमानित होते रहे हैं, परीक्षा देते रहे हैं, और कौन ऐसा पुरुष है, जिसे हमने जन्म नहीं दिया, दूध नहीं पिलाया, पाला-पोषा नहीं? बावजूद हम हमेशा से दोषी ठहराते रहे।

नहीं प्रिया, तुम कुछ ज्यादा ही बोल रही हो। एक्चुअली, अक्सर लोग यह सोचकर भूल करते हैं कि पुरुष जाति शकी होता है, बट मुझको लगता है, यह मिथ्या है, झूठ है,भरम है। आज तक के जितने भी बड़े-बड़े युद्ध हुए, सब नारी की रक्षा के लिए ही हुए हैं।अगर पुरुष जाति को नारी जाति पर विश्वास या ट्रस्ट नहीं होता तो ये युद्ध फिर क्यों करते?

तुम्हारा भी कहना सही है, लेकिन कोई भी युद्ध नारी के उत्थान के लिए उनके हक और हुक़ूक़ पुरुष द्वारा छीने जाने के विरुद्ध नहीं हुआ। यह सही है युद्ध हुआ। लेकिन अपनी पत्नी के रूप में, प्रेमिका के रूप में या फिर सम्बन्ध में प्रगाढ़ता की रक्षा के लिए हुआ है। अगर महाभारत का युद्ध हुआ तो अपनी भगिनी कुंती की रक्षा के लिए, राम और रावण में भी युद्ध हुआ तो अपनी पत्नी सीता की अस्मिता के लिए, ट्रोजन वॉर भी हुआ तो हेलन की वापसी के लिए हुआ। अन्य जितने भी तरह के युद्ध को देंखे तो लगभग एक ही बात सामने आती रही है और वह है रिलेशनशिप की रक्षा।

इतने भावावेश में जाने की जरूरत नहीं थी तुमको प्रिया। मैंने तो केवल यह आशंका जाहिर की थी कि तुम परित्यक्ता नहीं हो सकती, पाकिजा हो पाकिजा।

हर पुरुष, नारी को अपनाने के पूर्व सती, सुंदरी, चन्द्रमा, अफ्सरा और न जाने क्या-क्या कह देते हैं, लेकिन तुम ही सच बताओ अंकुर, उपरांत प्राप्ति क्या यह उपमा बरकरार रख पाते हैं? उत्तर होगा, नहीं…।

और हाँ, अंकुर, आखिर तुमने मुझसे प्यार करने की जरूरत क्यों समझा? ऐसी क्या चीज देखी, जो फिदा हो गये? और सच बताओ इस प्यार की आखिरी मंजिल, जिसे तुम जैसे नर सपनों में रखते हैं वह क्या है? इतनी मीठी-मीठी वाणी जो लबों पर प्रशंसा की लाते हो उस वाणी का मकसद क्या है? इरादा क्या है? आखिर इस मुहब्बत के रास्ते का अंतिम पड़ाव कहाँ है? कब तक तुम पुरुष इस तरह के आवरण को आँखों में छुपाकर आकर्षित करने के नाम पर इमोशनल ब्लैकमेल करते रहोगे? कब तक…

अरे तुम भी न बेवजह की बात पर डॉयलॉग दिए जा रही हो। यह सच है कि पुरुष ऐसा हो सकता है, बट इस प्रकार का दोषारोपण सम्पूर्ण पुरुष जाति पर देना कहाँ तक उचित है? नारी जिसे पुरुष समाज ने प्रथम देवी का रूप माना है, क्या गलत है? कोई भी अपमान अथवा बदसलूकी का मामला अगर किसी नारी का आया है, तो वह केवल और केवल नारी के द्वारा ही। नारी का दुश्मन या अहितकर कह लीजिये पुरुष नहीं नारी ही है। सीता जी को क्या जरूरत थी सोने के हिरण के लिए जिद्द करने की? हेलेन क्यों खाना परोसने के समय अन्य से प्रभावित हो गई? पार्वती को क्या जरूरत पड़ गई तपस्या में जाने की? और भी बहुत ही ऐसे उदाहरण हैं जो यह दर्शाता है कि नारी ही दोषी है, फिर भी पुरे नारी समाज को कलंकित करना मैं अंकुर, उचित नहीं मानता हूँ।

तुम नारियों की यही आदत तुम्हें नीचा करने के कारक और कारण बन जाते हैं। खुद की बात करने की बेवजह की आदत किसी को आहत भी कर देती है। फूलों को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे लोग इसलिए चाहते हैं कि वह सुन्दर है, बल्कि यह सोचना चाहिए कि उसकी बर्बादी उसकी सुन्दरता के कारण कितनी जल्दी हो सकती है। और तो और, इसके बिखर जाने पर इसकी कोई अहमियत ही नहीं रह जाती। हर वर्ष महिला दिवस मनाया जाता, क्यों? इसकी भी वजह जानना जरूरी होनी चाहिये। सुबह-सुबह सुनने को मिलता है “हम नारी नहीं चिंगारी हैं”। कोई भी जब चिंगारी बनेगी तो अंगार में परिणत होगा और फिर वह ज्वाला का रूप लेगा और जब ज्वाला होगा तो कोई न कोई उसे ही बुझा देगा। अरे! हम पुरुष तो नारी को लौ की तरह पूजते रहे हैं। अपनी हथेली को जलाकर भी उसे न बुझ जाने की कोशिश करते रहे हैं, बावजूद नारी इतनी बेवफा होती है कि लता की तरह किसी भी सामने आये पेड़ अथवा झाड़ी से लिपटकर जीवन गुजार लेती है।

लेकिन, इसके विपरीत भी तो  हो सकती है?

क्या….? पुरुष, पाखंडी, धूर्त और झूठा भी होता है। प्रलोभन के चक्रव्यूह में फंसाकर नारी का मानसिक और शारीरिक शोषण करता है।

जी, अब तुम सही जगह पर पहुँची हो। तुम ही बताओ क्या कभी किसी पुरुष ने नारी पर यह कहके मुकदमा किया कि उसने उसका मानसिक दोहन किया? उसे शारीरिक शोषण का शिकार बनाकर उसके सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया? उसकी अस्मत लूटकर किसी और से ब्याह रचा ली? उसकी सारी इच्छाओं का कत्ल कर दी? उसके साथ उनकी भावना और भविष्य को अंधकारमय कर दी?

उत्तर होगा नहीं…। अरे नादाँ! तुम औरतों को भद्दी गाली, रूखे व्यवहार और एहसान फरामोशी के सिवा कुछ आता भी है क्या? तुम तो पीपल के पत्ते की तरह होती हो। जरा सी हवा के चलने से अपना रुख बदल लेती हो। इस बात को मत भूलो कि तुम छाल हो। जी, पेड़ की छाल। तुम्हारी अहमियत और कीमत तब तक ही है, जब तक तुम पेड़ से लिपटी रहो, पेड़ से अलग होने पर तुम्हारी कोई कीमत नहीं, कोई अहमियत नहीं। केवल और केवल बिच्छु के बच्चों के बसेरा के सिवा किसी काम के नहीं।

बहुत हो गया अंकुर, बहुत… अब तो बस करो।

नहीं, प्रिया, जब कोई बात दिल में आ जाये तो शेयर करना चाहिए। इससे दिल का भड़ास भी निकलता है, और उसके प्रति भावना का भी पता लगता है। केवल एक तरफ की बातों से निर्णय कभी सही नहीं हो सकता? बावजूद इसके अब तुम बताओ कि तुम कहना क्या चाहती हो?

कुछ नहीं….

नहीं, यह सही नहीं है। कुछ तो बातें हैं, जो तुम कहने से परहेज कर रही हो? मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं तुम्हारी भावना का सम्मान अवश्य करूँगा और कोई भी ऐसी बातें नहीं करूँगा, जिससे तुमको ठेस पहुंचे।

सच????

जी, बिल्कुल ही सच।

अच्छा तो श्रीमान, क्या सचमुच तुम मुझे बहुत चाहते हो?

जी, लेकिन जब से तुमनें अपने बारे में बताना शुरू की, थोड़ा कम हो गया।

क्यों…?

सच-सच बोलूं या घुमा फिराकर?

घुमा फिराकर ही बोलो…।

जी, ऐसा है न लड़कियां आजकल बड़ी चालाक बनने लगी है। एक-एक के चार चार यार हो जाने लगे हैं। मेरे कहने का मतलब बेड सेंस नहीं है, बट, ऐसे में अरुचि हो जाती है। कोई भी बॉय नहीं चाहता है कि उसके गर्ल फ्रेंड को और फ्रेंड हो, या रहा हो। फिर तो उसके आचरण पर संदेह होने लगता है और विश्वास नहीं बना पाता।

लेकिन, तुमने तो घुमा फिरा कर नहीं बोला?

जी, घुमाकर ही बोला…

अगर डायरेक्ट बोलते तो क्या कहते?

यही कि प्रिया, तुमको अपने प्रेमी के ही साथ रहना चाहिए। हर कोई अलग होने पर खुद पर दोष नहीं लगाता।

तो फिर तो तुमने कह ही दिया न?

क्या?

यही कि मुझे तुममें, तुमको नहीं तलाशना चाहिए।

नहीं, ऐसी बात नहीं है।

क्यों…?

इसलिए कि स्टेज पर दिया जानेवाला हर डॉयलॉग सही नहीं होता?

फिर भी अगर वही डायलॉग घर पर आके दिया जाता है, तो उसे सच ही कहा जायेगा न?

हाँ, वो तो है, बट, तुमको भी प्रिया हर बात को इस कदर नहीं पकड़नी चाहिए।

नहीं, अंकुर, मुझे पता था कि आखिकार तुम भी उसी मोड़ पर आकर खड़े हो जाओगे, जहां उसने मुझे लाकर छोड़ दिया था।

किसने, किस मोड़ पर… कहाँ छोड़ दिया था?

बस, प्रिया जिस बात को एक बार कह देती है, उसे फिर दुबारा रिपीट नहीं करती, समझे, जनाब..?

यस, ए लिटिल..

ओके, शाबाश! अंकुर जी, ए लॉट ऑफ़ थैंक्स..

आभार।

तो बहुत सुनने का शौक़ है तुमको, मेरी जिंदगी की दास्ताँ ?

जी, सुनना नहीं, जानना है, कि आखिर क्या हुआ था, जिससे तुम्हारा व्यू ही बदल गया, जिंदगी का, जीने का और फिर इसके साथ जीवनभर रहने का?

जी, अंकुर उन दिनों मैं पार्ट थर्ड की स्टूडेंट थी। पढ़ने में बहुत ही अच्छी नहीं थी, बट, मेरी लिखावट बहुत ही सुंदर होती थी। अमीर बाप की बेटी होने के नाते मुझे अपने यौवन और सुंदरता पर काफी घमण्ड था। रोज-रोज नया-नया ड्रेस उसपे फिर हाई स्टीम वाली परफ्यूम लगाके चलती थी। आइब्रो, को प्रायः नुकीला बनाकर रखना, बालों को मचोड़कर ऊपर की ओर स्टाइलिश करके झाड़ना, तरह-तरह की फेसवाश का यूज़ करना मेरे लिए आम बात थी। मैं अपने आप को एक हीरोइन से कम नहीं आंकती थी। कॉलेज से मेरे रेजिडेंस की दुरी फाइव टू सिक्स किलोमीटर की थी। मैं स्कूटी से कॉलेज जाती थी। बड़े आकार का गॉगल्स मुझे वह भी काले रंग का पहनना बड़ा शौक था। बॉयो का स्टूडेंट होने के नाते प्रैक्टिकल का क्लास करना जरूरी हो जाता था। एक दिन सुबह की बात है। मैं जब कॉलेज जा रही थी, तो देखा राजेंद्र रोड के किनारे एक युवक गिरा पड़ा था। इधर-उधर कोई नहीं था। मैंने अपनी स्कूटी को स्लो किया, और उसकी ओर देखना चाहा। देखा कि वह युवक फेंट हो गया था और उसकी साईकिल दूर गिरी हुई थी। साईकिल से कुछ दूरी पर एक कॉपी भी गिरी थी। मुझको लगा कि शायद कोई स्टूडेंट होगा, जिसे किसी गाड़ी ने धक्का दे दिया होगा। मैं स्कूटी से उतर गई। कॉपी को उठाई तो देखा कि उसकी कॉपी पर मेरी ही लिखावट थी। मैं चौक गई। एक अजीब सिहरन पूरे शरीर में होने लगी। मैं उस युवक के करीब गई। देखा, कि वह पेट के बल मुंह को बाएं किये लेटा हुआ था। कमीज कहीं कहीं फट गई थी। मैं देखते ही उसे पहचान गई। वह मेरे ही साथ पढ़नेवाला ओमप्रकाश था। क्लास के सारे फ्रेंड उसे प्रकाश कहके ही बुलाता था। मैं अचानक जोर से चीखने लगा। मेरी चीख से प्रकाश ने करवट ली, देखा और फिर आँखें मूँद ली। मुझको आभास हो रहा था कि प्रकाश को चोट कहीं न कहीं लगी थी, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। मैंने हंड्रेड पे डायल की। कुछ ही देर में लोकेशन को लोकेट करते पुलिस की गाड़ी मेरे पास खड़ी थी। मैंने उसे वस्तुस्थिति बताया। पुलिसवालों ने मेरी मदद की ओर उसे हॉस्पिटल तक पहुंचा दी। उसकी साईकिल और उसकी कॉपी को बगल के ही टायर दुकान के पास मैंने रखवा दी। उसके चप्पल जो इधर उधर बिखरे थे, मैंने उठाकर अपनी स्कूटी के बास्केट में एक पन्नी में समेटकर रख ली और तेजी से हॉस्पिटल की ओर भागती चली गई।

पहुंचते ही भीड़ बढ़ने लगी। लोग तरह-तरह का अंदेशा लगाने लगे। किसी ने यह कहा कि इसकी ही स्कूटी से चोट लगी है, तो किसी ने उसके बॉय फ्रेंड तक कह दी। मैं चुपचाप स्कूटी को किनारे लगाई। फिर बास्केट से अपनी हेंड बैग लेकर डॉक्टर के क्लीनिक की ओर जाने लगी। मेरे मन और मस्तिष्क के बीच लगातार बातें हो रही थी। यद्यपि यह बात आंतरिक थी, लेकिन तब भी इसका प्रभाव ह्रदय तक था, जो चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। मुझे एहसास हो रहा था कि दिल का दर्द क्या होता है और यह कितने अंदर तक जा सकता है। जबकि मुझको उस प्रकाश से किसी प्रकार का नाता नहीं था, तब यह दर्द इतना गमगीन और द्रावक है, तो अपनों का दर्द, स्वजनों का दर्द कितना दुखदायी हो सकता है, सोचते डॉ0 साहब के क्लीनिक में था।

जी, आप..? डॉ0 ने मुझसे उसका सम्बन्ध जानना चाहा।

मैंने कहा..जी, डॉ साहब, मैं प्रिया, प्रकाश का फ्रेंड हूँ, कहते खुद को अन ईजी फील कर रही थी, बावजूद खुद को संभाले हुए थी।

जी, ऐसा है प्रिया जी, घबराने की बात नहीं है, थोड़ी सी चोट माथे पे है। ब्लड निकल गया है, इसलिए कोई खास प्रॉब्लम नहीं है।

लेकिन, डॉ0 साहब….

जी, हमको पता है, फ्रेंड की पीड़ा को बर्दाश्त करना मुश्किल होता है। ऐसा हो जाता है प्रिया…. और भगवान दोस्त को एक-दूसरे से भी तरह अलग नहीं कर सकता। सच्चा प्यार कभी अपूर्ण नहीं होता प्रिया। हमलोग भी अपने जमाने को देख चुके हैं प्रिया जी, वरी नॉट।

फिर तो… ओह

जी, स्टिक लगा है, इसके बाद आप मिल सकते हो, कहते डॉ0 साहब अपनी क्लीनिक से बाहर था।

आज मुझे लग रहा था कि मैं किस मोड़ पर खड़ी हूँ। सोचते-सोचते बहुत दूर निकल गई थी। कभी सोचती कि मुझको बीच में आने की जरूरत नहीं थी, तो कभी यह सोचती कि आखिर उसे उस हालत में कैसे छोड़ देती। भले ही कोई कुछ सोच ले, लेकिन दिल तो दिल होता है, वह तो सब कुछ जानता है। यह कभी झूठा नहीं होता, अरे खुराफात तो दिमाग होता है। मुझको ऐसा लगने लगा था कि अब कुछ भी हो, और दुनियां कुछ भी कहे, बट हर हाल में प्रकाश की सेवा करनी है। उसकी जिंदगी बचानी है। अरे प्यार केवल कागज के टुकड़ों में और मोबाईल के व्हाट्सएप्प और एप्प में नहीं होता, प्यार तो दिल की जमीन पर होता है, सेवा की भावना में होता है और इसके लिए एहसान जताने की या फिर कुछ करने के लिए जमाने की परवाह नहीं होती।

देखते ही देखते मैं प्रकाश के रूम में थी। उनकी हालत देख मैं काफी दुखी थी कि उनके माथे पर सफेद रंग की पट्टी बंधी थी और वह आँखे बंद किये जोर-जोर से साँसें ले रहा था। पहले तो मैं उनके माथे के पास बैठी उनके बालों को सहलाने लगी, फिर उनके पांव में लगे खून को देखकर पांव के पास बैठकर अँगुलियों से जख्म के चारों ओर लिक्विड लगी रुई से साफ करने लगी। उसे साफ करते मेरी आँखें भर आतीं और मैं सिसकने लगतीं। इतने में नर्स भी आ गई और मुझे ढाढ़स बंधाते कहने लगी – कुछ भी नहीं होगा तुम्हारे…. को। कुछ भी नहीं। प्रेम अमर होता है, बहन जी। आप दोनों का प्रेम अमर है। मैं मन ही मन सोचती कि प्रकाश के साथ मेरा किसी भी तरह का कोई प्रेम, प्यार का सम्बन्ध नहीं है। मैंने कभी उनसे बातें भी इस मुतल्लिक नहीं की है, फिर भी दुनियावाले इसे प्यार कहने से नहीं कतराते। सोचती, अगर किसी तरह का सम्बन्ध अभी तक उनके साथ है तो वह है अपनों का सम्बन्ध, अपनेपन का सम्बन्ध। यह केवल दर्द ही है, जो मुझे उनकी ओर खींच लाई है, जो अपनों के दर्द से कम नहीं है। देखा, कुछ देर बाद दूसरे नर्स ने मेरे हाथ में एक पुर्जा थमा दी। पुर्जे को पढ़ा तो पाया कि प्रकाश को दो पॉइंट बी पॉजिटिव ब्लड की जरूरत थी। मैं ब्लड बैंक आई और ब्लड की खूब खोजबीन की, लेकिन नहीं मिल पाया। बहुत देर के बाद एक जन ने बताया कि आप अपने ब्लड टेस्टिंग करा लीजिये, हो सकता है मेल खा जाये। उन्होंने कहा – “मेम, प्रेमी और प्रेमिका दो बदन एक जान की तरह होता है। आप दोनों की जोड़ी भगवान ने तय कर दी है। यह एक इम्तेहान है, दोस्ती को आजमाने का। मैं अब काफी असमंजस में थी कि क्या करूँ, क्या न करूं? अंत में मैंने अपना ही खून दो पॉइंट जो सेम था, प्रकाश को इस शर्त पर दे दी कि कभी भी किसी भी कीमत पर वे किसी के पास यह डिस्क्लोज नहीं करेंगे कि प्रकाश को खून मैंने दी है, कहते मैं ब्लड बैंक के कमरे में था।

मैं कुछ देर बाद पुनः जब प्रकाश के बेड पर आई तो देखा कि अब उनकी आँखें खुली हुई थीं और वह एकटक दूर तल्क देखते ही जा रहे थे। पलकें गिराई तो उनकी नजर यकायक मेरी ओर पड़ गई, बट, वे पहचान नहीं पा रहे थे। मैं सिरहाने बैठी उनके पैर में नूरानी तेल लेकर धीरे से मालिश करने लगी। समय रफ्ता-रफ्ता शाम की ओर दबे पांवों से चलती जाने लगी थीं, जो मेरी चिन्ता का कारण बन रहा था, कारण मैंने घर पर कोई सूचना नहीं दी थी।

फिर मैंने देखा कि बड़ी तेजी से दो जन उनके बेड की तरफ आ रहे थे जो बड़े परेशान और चिंतित थे। उनकी पेशानी में ओस की बूंदों की भांति पसीना था। मैं समझ गयी थी कि ये उनके पेरेंट्स थे। मैंने मां कहकर उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया। उन्होंने मेरी ओर नजरें करके देखा जिसमें दया, प्रेम के साथ-साथ अनगिनत स्नेह के टुकड़े मिले थे। फिर पूछने लगी – कितनी चोट लगी है?

मैंने कहा – थोड़ी सी चोट है, माँ जी। डॉ0 ने कहा है एक-आध दिन में ठीक हो जायेंगे। घबराने की बात नहीं है, कहते मैं समय पाकर वहां से बाहर थी।

घर पहुँची तो घर के सारे लोग मुझे घूर-घूर कर देख रहे थे। एक बार घड़ी देखते और एक बार मेरी ओर आँखें बड़ी-बड़ी कर देखने लगते। मुझको पता हो गया था कि उनके नाराज होने की वजह मेरे देर से आने की थी। सुबह केवल चाय और बिस्किट लेकर ही गई थी। साथ ही मेरे वापस आने का समय दस से ग्यारह बजे का था, जबकि घड़ी ने शाम के साढ़े छः बजा रक्खी थी। घरवालों की चिंता का सबब स्वाभाविक था, कारण तब से मैने फोन भी नहीं मिलाया था।

किसी ने भी मुझसे बातें करना मुनासिब नही समझा। मैं भी चुपचाप हाथ-पैर धोकर अपने रूम में चली गई और दरवाजे को अंदर से बंद कर दी। भूख काफी जोर से लगी हुई थी। बावजूद घरवालों के व्यवहार के कारण मैं भूखे रहना उचित समझा बजाय कि मांगकर खाना।

रात भर प्रकाश के बारे में सोचती रही। कभी सोचती कि उनके पास मुझको कम से कम आज की रात सेवा करने के लिए रह जानी चाहिए थी। सोचती, इंसान के दर्दों के साथ हो जाना ही इंसान है। भले लोग कुछ भी कह ले, लेकिन ऊपरवाला इंसान की मंशा, इंसान का इंटेंशन देखता है। कभी यह भी सोचती, पता नहीं प्रकाश भी क्या सोचता होगा, कारण आने के वक्त मैंने उन्हें बताया तक नहीं। इस कदर की अनेक छोटी बड़ी बातें दिल से उतरती फिसलती आँखों तक पहुंच जाती और मैं अपने आप को कल्पना लोक में खोई पाती।

आज यह मेरी जिंदगी की पहली रात थी, जो अनायास किसी के प्रति एक अलग किस्म की भावना का जन्म हो रहा था। मुझे लगने लगा था उनके बगैर मैं रह नहीं सकूंगी। दिल कहता उनके पास जाकर चुपके से उनके कान के पास कह दूँ कि हाँ प्रकाश, मैं तुम्हारे दर्दों के साथ, तुम्हारी तमन्ना के साथ और तुम्हारे अरमानों के साथ जीना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे साथ रहकर जिंदगी भर सेवा करना चाहती हूँ । हाँ प्रकाश ,मुझे तुमसे मुहब्बत हो गई है। मुहब्बत। पाकिजा मुहब्बत…।

मुहब्बत अल्फाज में इतनी शक्ति, इतनी ऊर्जा और इतना साहस होता है, पहली बार एहसास हो रहा था। सचमुच प्यार एक एहसास है, एक अनुभूति है, एक अनोखी मुलाकात है, हृदय की पुकार है , दिल की पहली ख्वाहिश है और साथ ही आत्मा की भूख भी है, समझने लगी थी।

सुबह हुई। आज मैं पहले की तरह बहुत खुश नहीं थी। जिधर भी देखती, उदासी नजर आती। सच में जब ह्रदय के अंदर ख़ामोशी रहती है, तो बाहर का प्रकृत मनोरम नहीं लगता, न दिखता, ऐसा लग रहा था मुझे। किसी कदर नित्य क्रिया करके अपने रूम में आई और सोचने लगी कि जितनी जल्दी हो सके प्रकाश के पास जाना चाहिए। सोचती, पता नहीं रात भर वे सोये होंगे भी या नहीं? उनसे बातें नहीं करके या फिर उनके घरवालों से कोई कांटेक्ट नम्बर नहीं लेकर मैंने भूल की थी, लगने लगा था। इससे कम से कम उनके वर्तमान स्थिति की जानकारी तो ले सकती थी, लेकिन, लेती भी कैसे? एक ऊहापोह की स्थिति बनी हुई थी। उनके चप्पल को भी नहीं दे पाई, पता नहीं बाथ-रूम जाने की जरूरत पड़ी तो खाली पैर कैसे जायेंगे? इस तरह की नाना प्रकार की छोटी, बड़ी बातें मष्तिष्क में आती जा रही थी। फिर सोचती, चलो वो न सही उनके प्रेम की निशानी उनकी पनाही, उनका चप्पल तो था, जिसे अब वह चाहकर भी नहीं दे सकती थी। जब किसी को किसी से अंतरंग लगाव हो जाता है तो इस लगाव का जड़ कितना अंदर चला जाता है, जीवन में पहली बार एहसास हो रहा था।

जल्दी-जल्दी स्नान-ध्यान करके तैयार हो गई। नाश्ता करने के बाद हॉस्पिटल जाने की सोचने लगी। इसी बीच मेरी माँ रूम के अंदर आकर कहने लगी-

कहाँ की तैयारी है, बेटा? रात को खाना भी नहीं खाई। अरे बेटा, दिन-दुनिया खराब है। कहीं भी जाओ तो शाम के पहले ही आ जाओ। पता है, कल तुम्हारे पापा कितना परेशान थे? तुम्हारा मोबाईल भी नहीं लग रहा था। कम से कम बात तो कर लेनी थी? इससे बोझ हल्का हो जाता है।

जी, माँ, मैं अब कोई बच्ची नही हूँ। सही गलत सब समझती हूँ। एक्चुअली कल मैं अपने दोस्त के पास चली गई थी, इसलिए देर हो गई माँ।

हाँ बेटा, तो फिर वो तुम्हारा कैसा दोस्त था कि वहाँ से तुम कॉल भी नहीं कर सकती थी?

जी, माँ, कुछ ऐसी भी बातें हो सकती है जो शेयर नहीं कर सकती।

फिर भी कौन सी ऐसी बात थी, जो तुम शेयर नहीं कर सकते?

ऐसा है न माँ, मैं जल्दबाजी में हूँ। आकर फिर बात कर लूंगी।

अरे प्रिया, मैंने तुम्हें जन्म दी है। पाली पोषी हूँ। सब कुछ समझती हूँ बेटे। इस बात को कभी नहीं  भूलना कि सास भी कभी बहू थी।

कहने का मतलब?

मतलब साफ है कि मैं भी कभी तुम्हारी उम्र की थी। सब समझती हूँ। देखो, मुझको पढ़ाने की कोशिश न करो।

नहीं माँ तुम ऑदरवाइज नहीं लो। मैं कोई ऐसी वैसी में नहीं रहनेवाली हूँ।

नहीं, प्रिया, तुम मत जाओ। तुमको अब अकेले कहीं नहीं जाना है।

क्यों?

बस यूँ ही बोल दी न, कहीं भी अकेले नहीं जाना है।

फिर भी कोई तो रीजन होगा न?

कोई रीजन, विजन नहीं। अब तुम सयानी हो गई हो, इस कदर अकेले जाना ठीक नहीं।

क्यूँ, मां, मैं कल तक सयानी नहीं थी। आज रात में ही सयानी हो गई…?

जी, आज ही तुम सयानी हो गई

क्या माँ, तुम भी पगली सी बकती हो।

मैं पगली नहीं, तुम्हारे अंदर पागलपन आ गया है।

ये कैसी-कैसी बात कर रही हो?

कुछ नहीं, सही बात कर रही हूँ।

तुमको कहीं नहीं जाना है।

लेकिन, हर हाल में मुझको अभी और इसी वक्त जाना है। जिंदगी का सवाल है।

कोई जिंदगी नहीं। आज तुम नहीं जा सकती समझी।

क्या माँ तुम भी एंसीएन्ट जैसी कर रही हो…

ओह, अब तुम मॉडर्न हो गई न? एकदम अल्ट्रा मॉडर्न। इतनी मॉडर्न कि लाज, शर्म, हया सब खत्म कर दी।

तुम क्या बक रही हो?

मैं बक नहीं रही हूँ। सच बोल रही हूँ। तुम आजकल इतनी बेहया हो गई हो कि बीच रोड में जिस किसी को भी गोद में बैठाकर …..

अरे माँ, तुम सचमुच में पागल हो गई हो।

पागल मैं नहीं, तुम हो गई हो। कल सुबह तुम स्कूटी से जाते समय राजेंद्र रोड के बगल बीच रास्ते में किसको अपने गोद लिए थी? जरा सी भी अपना ख्याल रखी होती। तुम किस परिवार से बिलोंग करती हो? तुम्हारी कितनी अहमियत है? तुम पर कितना भरोसा करते थे हम। तुमने मेरी नाक कटवा दी। सारे मुहल्ले के लोग अब तो मुझे ही ताना मारकर कहते हैं। देख लिया न कॉलेज में पढ़ाने का? बहुत कहती थी, बेटी आई ए एस करेगी। ये करेगी, वो करेगी। हो गया न? कॉलेज जाने के बहाने रंगोली मनाती फिरती है। अरे हम सबको तो पहले ही पता था। बहुत फालतू लड़की है। बेकार की। कोई काम की नहीं। अब इससे अधिक क्या हो सकती है? अपना अस्तित्व ही समाप्त कर दी।

मैंने कितनी तरह से समझाने की कोशिश की, लेकिन वह मानने को तैयार ही नहीं थी। कहते हैं न, जब किसी को खासकर पेरेंट्स को अपने औलाद पर शक हो जाता है, तो किसी और की बात को भी सुनना भी नहीं चाहते, हत्ता ये कि उसकी हर अदा को भी संदेह की नजर से देखने लगते हैं। ऐसा ही मेरे साथ हुआ अंकुर। मेरी माँ अब मुझे कहीं नहीं जाने देंने लगी। मेरे स्कूटी की चाभी ले ली। किताबों की सर्च ली। मेरे कपड़े, मेरी कॉपियां सब कुछ पर संदेह हो गया। इतना ही नहीं, मेरा कॉलेज जाना भी बंद करवा दी। यूँ समझो, मुझे कैद में रखने लगी। न मुझसे कोई उतनी बातें करती, और न ही कोई तरजीह देती। तब मुझे एहसास होने लगा था कि लड़की के रूप में जन्म लेना कितना दुखदायी हो सकता था। न बोलने की आजादी, न घूमने की आजादी, न खुद से कोई काम करने की आजादी? जहाँ भी जाओ,कोई न कोई संदेह, कोई न कोई अंदेशा। मैं परकटे परिंदे की तरह तड़पती रही। फड़फड़ाते रही, लेकिन मेरे जख्म पर किसी ने भी मरहम लगाने की कोशिश नहीं की।

क्या कहूँ दिल की बातें अंकुर। मैं हर दिन, हर रात प्रकाश के एक्सीडेंट की यादों में रहने लगी। लगता, काश पंछी होता तो उड़ कर चली जाती और अपने दिल के जख्मों को दिखा डालती। बता जाती कि किस कदर उनकी यादों में रोत-तड़पती और बिलखती हूँ। उसे देखने की इच्छा होने पर कैसे-कैसे खुद को कह कर समझाती हूँ। प्यार क्या होता है, उसे बैठकर बताती। शायद वह मेरी बेचैनी को देखकर मेरे न जा पाने की मजबूरी को समझ जाते और माफ़ कर देते। प्यार का मतलब शारीरिक तृप्ति नहीं होती, बल्कि एक दूसरे के प्रति आत्मीय सम्बन्ध होता है, मैं जान चुकी थी। प्रकाश से मेरा किसी भी प्रकार से कोई गलत सम्बन्ध नहीं था और न ही रॉंग इंट्रर्पिटिशन था, बल्कि अगर कुछ था तो केवल और केवल उनके दर्दों के साथ हो लेने की ललक। बावजूद इसके मेरी माँ ने मुझे कॉलेज जाने की फिर कभी इजाजत ही नहीं दी।

घटना फाइनल इयर की थी। मुझे मेरी माँ ने कहा कि तुमको एग्जाम हर हाल में देना है, लेकिन तुम अकेले नहीं जाएगी। मैं तुमको ले जाऊंगी और फिर ले आऊंगी। मैं इस पर भी खुश थी कि कम से कम एग्जाम के दरम्यान प्रकाश से भेंट तो हो जायेगी? उसे न आ पाने की मजबूरी की सच्चाई तो बता पाऊँगी। फिर दिल की हर बात को बता तो दूंगी कि किस कदर उनकी यादें उसे नागिन की तरह डँस रही है।

देखते ही अब मैं एग्जाम हॉल में थी। यह महज संयोग ही था कि प्रकाश का सीट भी वहीं था, जहां मेरा था और वह भी जस्ट मेरे सीट के आगे। एग्जाम के बीच के खाली समय में अंतिम दिन आख़िरकार मैंने अपनी पीड़ा और बेचैनी को प्रकाश के पास रख ही दिया -

जी, प्रकाश शायद तुमको लगता होगा कि मैं देखने नहीं आई, लेकिन हर गर्ल की कोई न कोई मजबूरी होती है, और ….

जी, प्रिया, हर गर्ल की मजबूरी होती है, होते रही है, लेकिन वह मजबूरी हमेशा-हमेशा के लिए नहीं रहती?

बिल्कुल, लेकिन जब तक मजबूरी रहती है, तब तक तो मजबूर रहती है।

पता है हर बेवफा और दगाबाज गर्ल यही कहती है… “यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता, कुछ तो मजबूरियां रही होगी”।

जी, न, मुझ पर कम से कम इतना बड़ा इल्जाम बेवफाई का नहीं लगाओ प्रकाश। मैं तुमको बहुत मानती हूँ। बहुत ही ज्यादा, शायद जितने का तुम्हें एहसास तक नहीं होगा।

बस, बस करो। कान दर्द कर रहा है। हर गर्ल केवल और केवल सुख की साथी होती है, समय की साथी होती है, बाद इसके आउट ऑफ साईट, आउट ऑफ माइंड।

नहीं प्रकाश, ऐसा नहीं होता है।

फिर कैसा होता है, तुम्हारे जैसा?

जी नहीं, प्रकाश मैं तुमको बहुत चाहती हूँ। बहुत ….

अपनी चाहत और अपनी बहुत वाली बातें अपने ही पास रख लो प्रिया। अरे उस दिन तुम कहाँ गई थी, जबकि मुझको होश नहीं था और नर्स पुर्जा लेकर दो पौइंट खून के लिए परेशान होकर तुम्हें खोज रही थी। तुम उस वक्त कहाँ थी जबकि तुम्हारे सामने मेरा एक्सीडेंट हुआ था और तुम पीछे से स्कूटी से आ रही थी, कुछ भी नहीं की थी और मजबूरन पुलिस की गाड़ी से मुझको लाया गया था जिसे बाद में मुझे बताया। उस दिन तुम कहाँ थी, कहाँ जबकि मेरी माँ तुमको हर जगह ढूँढ़ रही थी….? कहाँ थी….? कहाँ थी…?

नहीं, नहीं प्रिया, नहीं प्लीज, तुम इस तरह की बातों में मुझको उलझांकर मत फंसाओ। जाओ…. कहते रुआंसू हो गया था वह।

जी, नहीं, प्रकाश अगर इजाजत हो तो मैं एक बात तुमसे अर्ज करूँ। तुम शायद मेरे अर्ज को सुनकर जरूर मेरी बातों को गौर फरमाओगे।

नहीं, मुझे कोई अर्ज वर्ज नहीं सुनना है। अपनी अर्ज को लेकर अपना घर रफू… समझे।

बट, अगर तुम सुन लेते तो अच्छा होता।

कह दिया न, नहीं तो नहीं, हरगिज नहीं।

देखो अंकुर इस तरह प्रकाश भी मेरी बातें सुनने को राजी नहीं हुआ। इंसान बेवक्त इतना बेदर्द और एहसानफरामोश हो जाता है कि किसी की अर्ज, किसी की व्यथा को भी सुनना नहीं चाहता, समझ पा रही थी। शायद इस भौतिकवादी युग के रूपये और मशीन ने इंसान को संकुचित और स्वार्थी बना दिया है, लगने लगा था।

और फिर मैं अपनी माँ के साथ घर चली गई। एक दिन मैं उस वक्त चौंक गई जबकि मेरी माँ ने व्हाट्सअप में मेरी एक तस्वीर दिखाई, जो किसी ने उनको पोस्ट किया था। उस तस्वीर में मुझे प्रकाश के साथ उनके माथे को मेरी गोद में रखे दिखाया गया था। दुनियावालों को क्या कहूँ मेरे पेरेंट्स ने भी उस तस्वीर को देखकर अन-ईजी और मुझ पर अविश्वास ही किया, जबकि सच्चाई यह थी कि जब मैंने प्रकाश को गिरा देखा तो पाया कि वह अचेत अवस्था में है और माथे से खून आहिस्ता-आहिस्ता बह रहा है। मैंने उन्हें अपनी गोद में ले लिया और अपने दुपट्टे से उनके जख्म पर लगे खून को पोंछने लगा, कहते उसी दुपट्टे से आँसुओं को पोंछने लगी। यह जालिम दुनिया वाले भी कितने दुष्ट और बेदर्द निकले कि सेवा करते मुझको प्रकाश के माथे को गोद में रखे स्थिति में देख लिया, जानकर भी पिक लिया और उसे व्हाट्सएप्प में डाल दिया, ताकि मैं बदनाम हो जाऊँ।

उस दिन मैंने महसूस किया कि आज के लोग कितने बुरे हो गए हैं। अरे हर किसा के पीछे बैठनेवाली प्रेमिका ही नहीं, किसी की बहन, बेटी, माँ या फिर मजबूर भी हो सकती है। बुरा होने के लिए साथ में रहने की जरूरत नहीं होती, दूर रहकर भी बुरे हो सकते हैं। जिनकी भावना बुरी होती है, जिनकी नीयत बुरी होती है, बुरे तो वही होते हैं। लेकिन, आज हमारे समाज के लोगों की मानसिकता इतनी निम्न और इतनी संकुचित हो गई है कि हर किसी को संदेह की नजर से ही देखते हैं। अब तुम ही बताओ अंकुर, कोई गर्ल अगर साफ सुथरा और स्टाइल में रहती है, तो क्या यह बुराई है? अगर किसी से फ्रैंकली बातें कर लेती है तो क्या बैड है? किसी से जी भर के हंसी या मजाक करती है या फिर किसी मजबूर की मदद करती है, तो यह गलत है? एक बॉय कहीं कुछ भी कर ले उस पर अंगुली नहीं उठाई जाती, उसे हिकारत की नजर से नहीं देखा जाता, उसके पिक को पोस्ट नहीं किया जाता। वहीं मासूम गर्ल, जिनकी भी अपनी ख्वाहिश होती है, अपनी जिंदगी होती है, अपना अंदाज होता है, जीने का हक नहीं….? कोई हक नहीं होता उसे आजाद होकर रहने का? अरे, अंकुर आज हम जैसे इनोसेंट गर्ल के दुखों को, दर्दों को, पीड़ाओं को, व्यथा और हकीकत को देखने, सुनने वाला कोई नहीं, बिल्कुल कोई नहीं, सिवाय कॉमेंट मारने का! जब अपनों का दर्द अपने लोग ही नहीं समझ पाए, न समझने की कोशिश करे तो आखिर इंसान जाये कहाँ… कहाँ जाये बताओ? जब मेरी पीड़ा, मेरी सच्चाई को मेरे पेरेंट्स तक नहीं समझ सके, तो मैं किसे अपने दर्द को सुनाती? ….पत्थर को, मूरत को, समाज को…. या फिर खुद को…?

इतना ही नहीं अंकुर मुझे समाज के लोग नीच नजर से देखने लगे। मैं यूँ की यूँ रह गई। और तो और जिनको मैं जान व दिल से चाहती थीं, जिनकी जिंदगी मैंने अपना खून देकर बचाई, दोस्त होने के बावजूद कभी यथार्थ को डिस्क्लोज नहीं की, उनकी भी नजरों से गिरती गई। अब तुम ही बताओ अंकुर, इतना सब कुछ झेल लेने के बाद भी मुझे किसी के साथ जीवन गुजारना चाहिए? मुझे लगता है इसका सही उत्तर ‘ना’ ही होना चाहिए। चलो अंकुर, मैं तुमसे इतना ही कहना चाहती हूँ कि ईश्वर करे तुम खुश रहो, फूलो-फलो और मुझको पाने की तमन्ना भूल जाओ। मुझको हो लेने दो अतीत के जख़्मों के साथ। समाज के घृणित नजरिये के साथ। बहुत झेल चुकी, कुछ और अवशेष बांकी हैं मेरी जिंदगी में, उसे भी मुझे सह लेने दो और यूँ ही जी लेने दो जीने के लिए, कहते प्रिया की आँखें नम हो गई थीं, जबकि उदास आँखों से उसने पन्नी में रखे चप्पल को निकाल लिया था एक बार फिर, जिस पर अब भी खून के छींटे बिखरे पड़े थे…..।

 

- डॉ0 मु0 हनीफ़

डॉ (मु)हनीफ साहित्य की कई विधाओं जैसे-कविता,कहानी,लघुकथा,उपन्यास,संस्मरण इत्यादि से गहरा सरोकार रखते हैं।हिंदी,अंग्रेजी,संस्कृत,उर्दू,अरबी,बंग्ला,संथाली पर समान अधिकार रखनेवाले अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी अनेक रचनाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित है।पत्थर के दो दिल(उपन्यास),कुछ भूली बिसरी यादें,और दर्द कहूँ या पीड़ा,कहानी संग्रह अमेज़न पर उपलब्ध है।प्रतिभा सम्मान,राष्ट्र गौरव सम्मान,राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान,बेस्ट एडुकेशनिस्ट अवार्ड, सुपर अचीवर्स अवार्ड, ग्लोबल आइकॉन अवार्ड,शिक्षक सम्मान और अन्य कई अवार्ड सेसम्मानित डॉ हनीफ जनसरोकार और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी रचनाएँ लिखनेवाले सम्प्रति स प महिला महाविद्यालय में बतौर अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में दुमका,झारखण्ड (भारत) में कार्यरत हैं।

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