अंतराल

धूप लगातार तेज हो रही थी। लू ऐसी चल रही थी, मानो धूल का गुबार उड़ाकर मनुष्य का मजाक उड़ाना चाहती हो! शायद वह चुनौती दे रही थी कि मगना देखती हूँ, तू तेज चलता है या मैं? पर बेचारा मगना कहाँ तेज चल पा रहा था! चलना तो चाहता था, पंख होते तो उड़कर और अकेला होता तो भागकर या बस के पीछे लगेज की सीढि़यों पर लटककर कैसे भी अस्पताल पहुँच जाता। उँगली पकड़ा हुआ बच्चा और पीछे गठरी जैसा पेट लिए, कमर पर से खिसकते मरियल दुधमुँहे बच्चे को सँभालती लाजो चल रही है। बीमार, दर्द से कहकती, लाजो को साथ लेकर तो उसे धीरे-धीरे चलना पड़ेगा न! वह सोचने लगता है, ‘लाजो को साथ लेकर तो वह जीवन भर चलना चाहता है, पर इस बार जाने क्यूँ, उसका मन शंकित है। उसे लग रहा है लाजो उसका साथ ज्यादा दिन तक नहीं दे पाएगी।’ ऐसा विचार आते ही उसका चलना कठिन हो जाता है। मगना सिर को झटका देता है, जैसे झटकने से बात दिमाग से निकल ही जाएगी।

छः कोस दूर, डॉक्टरनी शहर में रहती है। गाँव के दवाखाने पर चार महीने से ताला पड़ा है। लाजो बतावे थी, ‘डॉक्टरनी का तबादला होई गवा है और नरस बाई छुट्टी चली गई है। सरकार कागज पे तो कई दवाखाने और स्कूल खोले है, पर ई सरकारी अस्पताल और स्कूल बस कागज पर ही चलत रही। डॉक्टरनी थी तो भी दवाई लेने शहर ही जाना पड़ता था, अब दोईन काम शहर में करत रहे।’

‘‘रूको….कल्लू के बापू…मैं नहीं चलत सकूँ, तनिक रुको…..’’ मगना पीछे पलटकर देखता है, लाजो सड़क किनारे कमर पकड़े बैठ गई है। बच्चे को उसने एक तरफ बैठा दिया है। मगना पलटकर दौड़ता हुआ आता है। एक नजर जमीन पर पड़ी बीमार गर्भवती लाजो पर डालता है तो दूसरी जमीन पर बैठे बच्चे पर। सूखे हाथ-पैर, पीला पड़ता रंग और निकला हुआ पेट। डॉक्टर साब कहते हैं, जाने क्या, लीवर का रोग है। ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। इधर लाजो फिर पेट से है। डॉक्टर कहता है, इसका भी ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। तीसरा बच्चा जल्दी पेट में आ गया, जान का खतरा है। क्या करे मगना! उसे क्या मालूम था, बच्चों के चक्कर में उसकी फूल-सी नाजुक लाजवंती यूँ बीमार हो तड़प-तड़प दिन काटेगी। पर क्या करे, सब भाग्य का खेल है।

वह सरपट आती कार रोकने की कोशिश करता है, पर ऐसे उसके भाग्य कहाँ। सर्र-सर्र सरसराती कई गाडि़याँ दनादन चली गईं। ‘‘कोई तो रुक जाओ…..रे….. मेरी लाजो मर जाएगी….गाड़ी रोको-रोको, रुको साब….साबजी गाड़ी रोक दो, मेरी औरत मर रही है, कोई मदद करो….उसको डॉक्टर के पास ले चलो…’’ मगना बदहवास-सा दौड़ता रहा गाडि़याँ रुकवाने। कभी लाजो के पास आता… ‘‘बस हिम्मत रख….थोड़ा टेम तो लगता है, अभी करता हूँ कुछ….’’ फिर भागता है….पर….कब तक…. ?

‘‘चल लाजो, उठ मेरा हाथ पकड़, चलते हैं। पास ही में तो है डॉक्टरनी का दवाखाना।’’ पर दर्द से तड़पती लाजो खड़ी होने की कोशिश करके फिर जमीन पर लोटने लगती है। मगना फूट-फूटकर रोने लगता है, पर इस मगरूर शहरी जीवन में गरीब की पुकार सुनता कौन है! गरीब का रोना उसका पागलपन है और बीमारी से तड़पना नाटक समझा जाता है, पैसे माँगने का। अचानक एक ताँगेवाला आकर रुकता है…गरीब पर दया तो गरीब को ही आती है।

‘‘क्या हुआ इसे?’’ ताँगेवाले ने पूछा।

‘‘हुजूर, माँ बननेवाली है, बहुत दरद है, डॉक्टर बोली, दरद उठे तो ले आना… ऑपरेशन करना पड़ेगा। पर छः कोस की दूरी, चार कोस हम ले आवे, अब नहीं चल सकत ई….।’’

‘‘चल उठा ताँगे में डाल, ले चलते हैं।’’

‘‘हाँ हजूर, बस अभी डालत हैं।’’ मगना लाजो को उठाने की कोशिश करता है, ‘‘देख, हम बोले थे ना, भगवान बड़ा दयालु है।’’ ताँगेवाला उसके बच्चों को उठाकर ताँगे में बैठा लेता है। मगना से लाजो की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। बाँटने जैसा दुःख होता तो मगना कब का अकेला ही सारा ले लेता, पर…प्रसव की पीड़ा तो लाजो को अकेले ही झेलनी थी।

डाॅक्टरनी के पते पर ताँगा रूकता है तो मगना राहत की साँस लेता है, ‘‘देख लाजो, अस्पताल आई गवा। अब चिंता की कोन बात नाही है…..सब ठीक हो जाएगा।

भगवान बड़ा दयालु है…..लाजो…..।’’

ताँगेवाला पता लगाता है, डॉक्टरनी साहेबा हैं या नहीं। पता लगा, नहीं हैं। पेशेण्ट देखने गई हैं। ताँगेवाला उससे किराया भी नहीं लेता, चला जाता है। मगना उसे दुआ देता है। दरवाजे पर लम्बी लाइन लगी है। बीमार महिलाओं और बच्चों की। आदमी भी खड़े हैं, साथ में आए होंगे। सोचता है, डॉक्टरनी के आते ही पहले वह लाजो को बता देगा। सबसे ज्यादा तो उसे ही तकलीफ है। पसीने से तर होती अपनी कमीज उतारता है वह और छाती से गंगा-जमना की तरह धारबंद बहते पसीने की लकीरें देखने लगता है। नर्स आकर चिल्लाती है, ‘‘ये क्या तमाशा है, कपड़े पहनो, इतनी औरतों के सामने।’’

पर मगना बिना बहस किए पसीने से तर कमीज फिर पहन लेता है। ऊपर देखता है, शायद बादल का कोई टुकड़ा बदली बन बरस जाए। जून की तपती दोपहर से कुछ तो राहत हो। डॉक्टर के दरवाजे पर लाइन लम्बी होती चली गई। लाजो को उसने लाइन में ही लिटा दिया था, जनाना वार्ड की डॉक्टर है। .

यहाँ पेशेण्ट को ही लाइन में लगना होता है, लाजो में लाइन में खड़े रहने या बैठने की ताकत ही कहाँ थी। लाइन में थोड़ी हलचल होती है। डाॅक्टरनी साहेब आ गई हैं, वह दरवाजे पर देखता है। बड़ी सी सफेद कार में बैठकर डॉक्टरनी आई थीं। उतरीं तो मगना की तरह कुछ और लोग लपके, पहले देखने की विनती करने पर कुछ फायदा नहीं। आँखों पर काला चश्मा लगाए परियों सी सुंदर उस डॉक्टरनी ने ‘‘नो….नो लाइन से आइए। लाइन से भेजना सिस्टर।‘‘ कहकर क्लिनिक के केबिन में प्रवेश कर लिया था। मगना अपमानित-सा महसूस करता है, पर गरीब का क्या मान,क्या अपमान? डॉक्टरनी लाजो को ठीक कर दे, बस। वह तो सारी उमर डॉक्टरनी की गुलामी कर लेगा।

बड़ी डॉक्टरनी है। उसका नाम बहुत है, बड़ी डॉक्टरनी है। वह पास खड़े बीड़ी फूँक रहे आदमी से पूछता है, ‘‘हाँ भैया, डाक्टर तो होशियार सुनी है।’’

‘‘अपनी नैया पार लगावे तो बात है’‘, वह मन-ही-मन बुदबुदाता है।

फिर सामने की तरफ देखता है। चार-पाँच पेशेण्ट निपट चुके थे। उसे अहसास होता है, लाजो को प्यास लगी होगी। भागदौड़ में वह भूल ही गया। झट से पोटली खोलता है। पीतल का गिलास निकालता है। टंकी से पानी का गिलास भरकर लाता है, तो बच्चे टुकर-टुकर देखते हैं। पहले वह बच्चों को पानी पिलाता है, फिर खुद पानी हलक में उड़ेलता है, तो अंतडि़यों में ठण्डा पानी राहत देता है। गिलास भरकर लाजो को देता है, पर उसमें उठने की ताकत भी नहीं बची है। वह अपनी बाँह पर लाजो की गर्दन को उठाता है, दो-चार घूँट पानी लाजो गुटकती है, फिर पोटली का तकिया लगा मगना उसे लिटा देता है।

दोपहर की धूप कलसाने लगती है। उसके आगे अभी चार पेशेण्ट और हैं। लाजो पर नजर पड़ती है। वह कातर दृष्टि से मगना को ही ताक रही थी। पेट और कमर कसकर पकड़े थी। बच्चे भूख से कुलबुलाने लगे थे। पास ही ठेलेवाला चना मुरमुरा बेच रहा था। वह जेब टटोलता है, पाँच का नोट फिर हाथ में आ जाता है। वह दो रुपये का मुरमुरा लेकर लौट आता है। दोनों बच्चे पुडि़याँ खोल चुगने लगते हैं। सिस्टर की आवाज से मगना की तन्द्रा भंग होती है। ‘‘लाजवंती बाई’’ मगना लाजो के पास जा उठाने के लिए हाथ बढ़ाता है, ‘‘चल उठ, आ गया नम्बर, चल डॉक्टरनी साब…..’’ वह उठाने की कोशिश करता है। सिस्टर फिर आवाज लगाती है, ‘‘लाजवंती बाई’’ पर लाजो तो लुढ़क गई, उसके हाथ में, ‘‘डाक्टर साहब देखो, जल्दी मेरी लाजो….।‘‘डॉक्टर शोर सुन बाहर आती है, ‘‘अरे, ये तो मर गई। तुमने पहले बताया था। यही तो गलती करते हो तुम गाँववाले, चलो ले जाओ इसे।’’

मगना का स्वर कातर हो सिसकियों में बदल जाता है। एक खालीपन तीव्रता से भरता जाता है। अस्पताल आए थे तब दो थे। दोनों ही बच्चों को थामे थे पर अब तीन को थामकर छह कोस मगना कैसे ले जाए, वह एक-एक कर तीनों को दवाखाने के बाहर सड़क पर लाता है। पोटली से लाजो का लुगड़ा निकाल लाजवंती की लाश की लाज बचाने उढ़ा देता है।

ताँगेवाला किसी राहगीर को छोड़ फिर उधर से गुजरता है, एक अंतराल के बाद। ताँगेवाले के जाने और आने के उस छोटे-से अंतराल के मध्य लाजो ने लम्बा अंतराल काटा था, जीवन और मृत्यु के बीच का। यह अंतराल अवधि में कितना ही छोटा या बड़ा क्यों न हो, यह घाव देता है, घाव को नासूर में बदल देता है। यह जीवन की अर्थहीनता पर हँसना या रोना सिखाता है। अमीर और गरीब के बीच का अंतराल गरीब की मजबूरी को परत-दर-परत उघाड़ देता है। उसे अपनी औकात का अहसास कराता है। बार-बार मगना ने डॉक्टर और गरीब पेशेण्ट के मध्य पसरे अंतराल को महसूस किया था। पहले 150 रुपये परामर्श शुल्क देने वाले बीमार देखे गए थे। पर्ची कटवानेवाले बाद में और निःशुल्क परामर्श वालों की लम्बी लाइन में लगी थी लाजो। प्रतीक्षा के उस अंतराल को पाटा था मृत्यु ने।

मगना फिर ताँगे में लाजो को पटकता है।

‘‘चलो भैया, हिम्मत रखो! छोटे-छोटे बच्चे हैं, ईश्वर बड़ा दयालु है, वही इन बच्चों को सबूरी देगा।’’ ताँगेवाला उसे ढांढस देने लगता है।

- डा. स्वाति तिवारी

जन्म : धार (मध्यप्रदेश)

शिक्षा : एम.एस.सी., एल.एल.बी., एम.फिल, पी.एच.डी

शोध कार्य :

Ÿ महिलाओं पर पारिवारिक अत्याचार एवं परामार्श केन्द्रों की भूमिका

Ÿप्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण में राजीव गांधी शिक्षा मिशन की भूमिका

Ÿअकेले होते लोग – वृद्धावस्था पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज

Ÿसवाल आज भी जिन्दा हैं : भोपाल गैस त्रासदी एवं स्त्रियों की सामाजिक समस्याएं (प्रकाशनाधीन)

रचनाकर्म :

Ÿमध्यप्रदेश और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा, रिपोर्ताज, यात्रा-संस्मरण, कविताओं आदि का नियमित प्रकाशन

Ÿ आकाशवाणी, दूरदर्शन और निजी टी.वी. चैनलों पर रचनाओं का प्रसारण-पटकथा लेखन

विशेष :

मध्यप्रदेश की कलाजगत हस्ती कलागुरू विष्णु चिंचालकर पर निर्मित फिल्म की पटकथा-लेखन, सम्पादन और सूत्रधार

फिल्म निर्माण: इन्दौर स्थित परिवार परामर्श केन्द्रों पर आधारित लघु फिल्म “घरौंदा ना टूटे’ (निर्माण, सम्पादन और स्वर)

प्रकाशित कृतियॉ :-

कहानी-संग्रह :

Ÿ “क्या मैंने गुनाह किया’, Ÿ”विशवास टूटा तो टूटा’, Ÿ “हथेली पर उकेरी कहानियां’ Ÿ “छ जमा तीन”, Ÿ “मुडती है यूं जिन्दगी, Ÿ”मैं हारी नहीं’, Ÿ “जमीन अपनी-अपनी’, Ÿ “बैगनी फूलों वाला पेड”, Ÿस्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां

अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन :

Ÿ वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक वि¶लेषण पर केन्द्रित दस्तावेज – “अकेले होते लोग’

Ÿ”महिलाओं के कानून से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तक “मैं औरत हूं मेरी कौन सुनेगा’,

Ÿव्यक्तित्व विकास पर केन्द्रित पुस्तक “सफलता के लिए’

Ÿदेश के जाने-माने पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक “शब्दों का दरवेश” (महामहिम उप राष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी द्वारा 16 जुलाई 2011 को विमोचित)

प्रकाशनाधीन :

Ÿ सवाल आज भी जिन्दा है (भोपाल गैस त्रासदी और स्त्री विमर्श)

Ÿ लोक परम्पराओं में विज्ञान (माधवराव सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रदत्त प्रोजेक्ट)

Ÿ ब्राहृ कमल एक प्रेमकथा (उपन्यास)

सम्पादन (1996 से 2004 तक) :

Ÿ सुरभि (दैनिक चौथा संसार),

Ÿ घरबार (दैनिक चेतना)

चर्चित स्तंभ लेखन (वर्ष 96 से 2006 तक) :

Ÿ हमारे आस पास (दैनिक भास्कर),

Ÿ महिलाएं और कानून (दैनिक फ्रीप्रेस, अंग्रेजी),

Ÿ आखिरी बात (चौथा संसार),

Ÿ आठवां कॉलम एवं अपनी बात (चेतना),

सम्मान और पुरस्कार :

Ÿ “अकेले होते लोग’ पुस्तक (वर्ष 2008-09) के मौलिक लेखन पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा 80 हजार रुपये का राष्ट्रीय पुरस्कार

Ÿ “स्वाति तिवारी की चुनिन्दा कहानियाँ’ पर मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 22/01/12 को वागेशरी सम्मान 2010 (छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ “बैंगनी फूलोंवाला पेड़’ कहानी संग्रह पर 02 अक्टूबर, 11 को प्रकाश कुमारी हरकावत महिला लेखन पुरस्कार (मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल के कर कमलों द्वारा)

Ÿ देश की शिशार्स्थ पत्रिका “द संडे इंडियन’ द्वारा देश की चयनित 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में प्रमुखता से शामिल

Ÿ “अभिनव शब्द शिल्पी अलंकरण”, 2012 सांस्कृतिक संस्था अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा

Ÿ लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार पं. रामनारायण शास्त्री स्मृति कथा पुरस्कार

Ÿ जाने-माने रिपोर्टर स्व. गोपीकृष्ण गुप्ता स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार (श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए)

Ÿ शब्द साधिका सम्मान (पत्रकारिता पुरस्कार) Ÿ निर्मलादेवी स्मृति साहित्य सम्मान, गाजियाबाद (उत्तरप्रदेश)

Ÿ पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में अनुपम उपलब्धियों के लिए “स्व. माधवराव सिंधिया प्रतिष्ठा” सम्मान

Ÿ हिन्दी प्रचार समिति, जहीराबाद (आन्ध्रप्रदेश) द्वारा सेवारत्न की मानद उपाधि

Ÿ पं. आशा कुमार त्रिवेदी स्मृति मालवा-भूषण सम्मान

Ÿ मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा स्थापित देवकीनंदन साहित्य सम्मान

Ÿ अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत सम्मान

Ÿ भारतीय दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश का सावित्रीबाई फूले साहित्य रत्न सम्मान

विशेष :

कुरुक्षेत्र वि.वि. हिमाचल प्रदेश और देवी अहिल्या वि.वि. इन्दौर, वि.वि.चैन्नई, जवाहरलाल नेहरू वि.वि. नई दिल्ली में कहानियों पर शोध कार्य।

मैसूर में 02 से 04 अक्टूबर, 2011 तक राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा

“सुशासन और मानव अधिकार” पर आयोजित तीन दिवसीय सेमीनार में शोध पत्र का वाचन।

माण्डव में 5 से 7 नवम्बर, 2011 को देश के शिरसस्थ कथाकारों के संगमन 17 में भागीदारी।

संस्थापक-अध्यक्ष, इन्दौर लेखिका संघ, इन्दौर।

वुमन राइटर्स गिल्ड आफ इंडिया (दिल्ली लेखिका संघ) की सचिव (वर्ष 07 से 09)

इंडिया वुमन प्रेस कार्प, नई दिल्ली की आजीवन सदस्य

सम्प्रति : मध्यप्रदेश शासन में जनसम्पर्क विभाग में अधिकारी (राज्य शासन के मुखपत्र मध्यप्रदेश संदेश में सहयोगी सम्पादक)

सम्पर्क - चार इमली, भोपाल – 462016 (मध्यप्रदेश – भारत)

 

 

 

 

 

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