संपादकीय

एक साहित्यकार ,  मानवतावादी , समाजसेवी , देशभक्त और बुद्धिजीवी कभी नही मरता क्योकि अपने कर्मों से वो इतिहास के सुनहरे पन्नो में हमेशा के लिए अमर हो जाता है। हिंदी जगत ने हाल में ही अपने दो अनमोल रत्न खो  दिए हैं जिनकी भरपाई हो पाना संभव नहीं है।

 

सांसों की डोर के आखिरी मोड़ तक बेहतहरीन नगमे लिखने के ख्वाहिशमंद मशहूर गीतकार और पद्मभूषण से सम्मानित कवि गोपालदास नीरज जी के निधन से हिंदी साहित्य का एक भरा भरा सा कोना यकायक खाली हो गया।  वह अपने चाहने वालों के ऐसे लोकप्रिय और लाड़ले कवि थे जिन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी काव्यानुभूति तथा सरल भाषा से हिंदी कविता को एक नया आयाम दिया।

 

उनकी बेहद लोकप्रिय रचनाओं में से एक ‘कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे’ रही जो दुनिया से उनकी रुख़सती के वक़्त लोगों की ज़बान और दिल में थी:

 

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे.
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पांव जब तलक उठें कि ज़िंदगी फिसल गई…

 

अभी देश इस शोक से उबार ही नहीं पाया था की श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन की सूचना आगयी।  महान व्यक्तित्व, प्रखर वक्ता, ओजस्वी कवि ,भारत रत्न देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जाना देश के लिए एक युग का अंत है।

 

आज अटल जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी देशभक्ति , हिंदी के प्रति उनके प्रेम और देशहित के लिए किये गए उनके कार्य हमें सदा प्रेरित करते रहेंगे।

 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के कुछ शब्द जो उनके निडर व्यक्तित्व को व्यक्त करते हैं और हमें भी मृत्यु के भय से मुक्त कर जिंदगी जीने का साहस देतें है :

 

ठन गई
मौत से ठन गई.
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

 

इन महापुरषों के जीवन से हमें हिंदी और हिंदुस्तान के लिए अपना सर्वश्व बलिदान कर देने और जीवन की आखरी साँस तक हिंदी और हिंदुस्तान की सेवा करने की प्रेरणा मिलती है।
अम्स्टेलगंगा परिवार की ओर से इन महापुरषों को अश्रु पूरित श्रद्धांजलि ।

 

इन दुःख भरी ख़बरों के बीच अम्स्टेलगंगा परिवार के लिए कुछ खुशिओं के पल आयें हैं  जिन्हे हम आप सब से साझा करना चाहते हैं।
हमें ये सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है की अम्स्टेल गंगा परिवार में गंगा जमुना संस्कृति से निर्मित सदस्य शामिल हो रहा है , अकरम जी।

 

अकरम जी ने एएमयू से हिंदी में स्नातक किया।  स्नातक के बाद आपने ज्ञान प्राप्ती की  अपनी इच्छापूर्ति के लिए स्नातकोत्तर करने का निर्णय लिया। और इस दौरान आपने छात्र राजनीति में भी भाग्य आजमाया जिसमे आपने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा लेकिन इसके पश्चात राजनीति से मोह भंग हो गया और आपने हिंदी और सामाजिक कार्यो में पूर्णतया स्वयं को न्योछावर कर दिया।  आप ने मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी से एम. फिल. हिंदी करने के उपरांत वर्तमान में गिरमिटिया, भारतवंशियों की वैश्विक स्थिति के परिदृश्य को जानने के लिए सूरीनाम देश के भारतवंशियों पर एएमयू में शोध कर रहे हैं ।

 

आपकी प्रकाशित पुस्तक “भारतीय समाज और हिंदी उपन्यास” है।  आपने  “थर्ड जेण्डर कथा की हकीकत” एवं  “प्रवासी साहित्य का यथार्थ” पुस्तकों का संपादन भी किया है। आपके शोध आलेख कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

 

आशा है की अकरम जी के साथ हम सब मिलकर अम्स्टेल गंगा के माध्यम से हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए एक नये उत्साह और उमंग के साथ कार्य कर सकेंगे।

 

हम आशा करते हैं कि इस अंक में चयनित लेख, कविता, कहानियाँ, और चित्रकारी आप सभी को सृजन के आनंद से पूर्ण कर आत्मीय सुख प्रदान करेगी। आपसे अनुरोध है कि, हमें अपनी प्रतिक्रिया से अवगत अवश्य कराएं।

 

धन्यवाद।

 

- अमित कुमार सिंह , अखिलेश कुमार एवं डॉ पुष्पिता अवस्थी

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