संपादकीय

प्यास तभी बुझाई जा सकती है जब प्यास लगी हो। सुख की अनुभूति तभी होगी जब दुःख का अनुभव हो। हम सभी स्वर्ग की कल्पना करते हैं, किन्तु स्वर्ग में क्या है, कौन-कौन है इसका पता हममे से किसी को भी नहीं है। मनुष्य स्वर्ग को सुख से जोड़ के देखता है।  ऐसा स्थान जहाँ सुख की गंगा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है।  ऐसा स्थान जहाँ दुःख, द्वेष, इर्ष्या, अहँकार, और लोभ जैसी विषक्तियों के लिए कोई स्थान ना हो। अब ये प्रशन उठता है की ऐसे स्थान की कल्पना मरणोपरांत क्यों ? ऐसा स्थान तो जीते जी होना चाहिए ! मनुष्य को ये समझना होगा की सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। हमे ऐसे स्वर्ग की कल्पना करनी ही नहीं है जहाँ कोई अपना हो ही ना? हमे अपने स्वर्ग का सृजन यहीं पृथ्वी पर ही करना है। बीमारी का उपचार तभी संभव है जब हम बीमारी की पहचान कर लें। जो विषक्तियां हमे दुःख की ओर ढ़केलती हैं , उनका उपचार ही हमें सुख की ओरे ले जायेगा।  पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों को पृथ्वी को स्वर्ग बनाना होगा। अपने काम और कर्म दोनों को ठीक रखने की आवश्यकता है। आप अपने कर्म से स्वर्ग की प्राप्ति करते हैं , समझना ये है की आपके कर्म आपको इसी जीवन में स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं।

 

अम्स्टेल – गंगा परिवार आप सभी से आग्रह करता है कि अपने कर्मो को विषक्ति रहित बनाइए और अमृत रस करें। दुःखो से मुक्ति के रास्ते खोजने और उन पर अमल करने के संघर्ष के साथ ही सुख की यात्रा शुरू हो जाती है,और यही पृथ्वी का स्वर्ग है। जो मन- मानस और आत्मा में है उसे अपने कर्मो से पृथ्वी पर अवतरित करना है, जिससे मन की धारणाओं का स्वप्न धरती पर उतर सके और हमारी आँखों से आंखे मिला सके।

 

२०२० एक महत्वपूर्ण साल है। हम नए दशक में हैं। अम्स्टेल – गंगा परिवार नए जोश और उल्लास के साथ  साहित्य से स्वर्ग प्राप्ति की कल्पना करते हुए आप सभी को साहित्य रूपी सोम रस की भेट देते रहने का प्रण लेता है। हम आशा करते हैं कि अम्स्टेल-गंगा का यह अंक आपको पसंद आएगा और आपका और हमारा साथ निरंतर बना रहेगा।

- अमित कुमार सिंह एवं डॉ पुष्पिता अवस्थी

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