संपादकीय

विश्व में विस्थापन – पीढ़ियों दर पीढ़ियों स्थानान्तरित हो रहा है।  दुर्भाग्य से शिकार मनुष्यों को जिस तरह से पृथ्वी के घर में पनाह मिलती है उसी तरह से विश्व साहित्य के वक्ष – नीड़ में भी उन्हें स्थायी आवास मिलता है।  सत्ता और अंतहीन सुख की भूख ने सम्पूर्ण विश्व को युद्ध, आतंक और विध्वंस के कगार पर खड़ा कर दिया है। बच्चे बूढ़े और औरतें सर्वाधिक यातनादायी स्थिति में है, कुछ को युद्ध निगल लेता है, कुछ की  आतंकवाद हत्या करवा देता है, कुछ को प्राकृतिक आपदायें समेट लेती है। ऐसे में देश छूटता है, गृहस्थी उजड़ती है, और पल छिन्न में सब उच्छिन्न हो जाता है।

 

विस्थापन  के इस भुचाली दौर में समस्याओं और संस्कृतियों की जड़ें उखड रही है कलाएं (संगीत, नृत्य, नाट्य, साहित्य, मूर्तिकला और चित्रकला तथा लोक कला ) बेघर हो रही है। जीविका और महत्वकांक्षांओं के अजगरी पाश में देश-दर-देश बदलते हुए लोग सुविधाओं का घर तो बसा लेते है लेकिन उस घर में  वह तासीर नहीं पैदा हो पाती है जो उनके अपने स्वदेश के घर में होती है, इस कारण नीड़ – निर्माण को कामनाएं बेचैन किये रहती है।

 

वस्तुतः दूसरे देशों में रचाये हुए घर जीविका जनित होते है ऐसे में मन के जीवन के लिए घर की तलाश बनी ही रहती है। संस्कृति तो उस समाज का प्राण है जिस समाज से वो प्रसूत होती है , भूमंडलीकरण के इस खूंखार आंधी की चपेट में सर्वाधिक विस्थापन की घटनाएं घटी है, जिसने निर्वासन की जघन्य संस्कृति का यातनादायी समीकरण रचा है। छोटी होती हुई वर्त्तमान के आधुनिक दुनिया के भीतर मनुष्यता की अपनी दुनिया लुप्त हो रही है। निर्वासन की दर्दनाक यंत्रणा है। परिवार है, पर परिवार बोध नहीं है, संस्कृति है पर उसमे स्वदेश की संस्कृति का सोंधापन नहीं है, उत्सव है पर उसमे उल्लास का वह आनंद नहीं है। आयोजन होते है पर उसमे प्रयोजन नहीं सिद्ध होते है। हमें निर्वासन की यातनादायी दुःख से मुक्ति के रास्ते तलाशने है। और यह तलाश उन्ही के द्वारा संभव हो सकती है जो विस्थापन के दुर्भाग्य से ग्रस्त है। हमें मानवतोन्मुखो वैश्विक संस्कृति रचाने के विकल्प रचने होंगे जिनमे ही निर्वाचन की मुक्ति की शक्ति है – इन्ही शब्दों के साथ

- अमित कुमार सिंह एवं डॉ पुष्पिता अवस्थी

Recent Posts