शब्द शक्ति की महिमा

कहा गया है कि शब्द में बड़ी शक्ति होती है। अंग्रेजी कहावत भी प्रसिद्ध है , “ Pen is mightier than sword . “  इसमें  pen  लिखित शब्द का ही तो प्रतीक है। संस्कृत के एक विद्वान ने तो यहाँ तक कहा है कि एक शब्द को ही अगर ठीक  से जान लिया जाए, उसका ठीक से प्रयोग किया जाए तो सारी कामनाएं पूरी हो सकती हैं (एकः शब्दः सम्यक् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गलोके कामधुक् भवति)। शायद इसीलिए कुछ लोग किसी शब्द / मंत्र आदि  का देर तक जाप करते हैं या कागज पर प्रतिदिन उसे बार – बार लिखते हैं, कोई 101 बार तो कोई 1001 बार, और कोई  तो उसका कीर्तन ही करते हैं।  इससे उस शब्द / मन्त्र की शक्ति बढ़ी या उन्हें कोई लाभ हुआ – इसका तो मुझे  कोई प्रमाण नहीं मिला, पर हाँ, ऐसे अनेक लोगों के उदाहरण दिए जा सकते हैं  जिनके जीवन की दिशा बदलने में किसी विद्वान के मौखिक अथवा  लिखित शब्दों ने विशेष भूमिका निभाई। स्वामी दयानंद सरस्वती से शंका समाधान करने के बाद  मुंशीराम का ( जो बाद में स्वामी श्रद्धानंद बने) , या रामकृष्ण परमहंस से वार्तालाप करने के बाद नरेन्द्र नाथ दत्त का ( जो बाद में स्वामी विवेकानंद बने ) जीवन बदलने के उदाहरण हम सबके सामने हैं।

 

अनेक धार्मिक ग्रंथों ने तो लोगों के जीवन  को बदला ही है,  अन्य प्रकार की पुस्तकों ने भी ऐसा करिश्मा किया है। जॉन रस्किन  की अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक ’ अन टु दिस लास्ट ’  ( 1862 )  से गाँधी जी का परिचय 1904 में हुआ और इसी पुस्तक ने गाँधी जी को  ‘ सर्वोदय ’ का विचार  दिया ( गाँधी जी ने सर्वोदय नाम से ही इस पुस्तक का गुजराती में अनुवाद 1908  में किया था ) एवं  इसी  पुस्तक  ने  उन्हें  फोनिक्स आश्रम की स्थापना की प्रेरणा दी। कथा, कहानी, नाटक , उपन्यास आदि को हम प्रायः  मनोरंजन की ही सामग्री मानते हैं, पर इस सामग्री में भी ऐसे रत्न छिपे हुए हैं जिन्होंने गंभीर पाठकों का जीवन बदल दिया। एक सज्जन ने एक उपन्यास  पढ़ा। उस उपन्यास ने उनके मन को आंदोलित कर दिया और  फिर उसकी परिणति सामाजिक  आन्दोलन के रूप में हुई। जानना चाहेंगे कि  कौन थे वे सज्जन ? कौन सा था वह उपन्यास ? और क्या  था वह सामाजिक आन्दोलन ?

 

चेन्नई ( तत्कालीन मद्रास ) में 18 जुलाई 1878  को जन्मे एम. वेंकटसुब्बा राव एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। मद्रास क्रिश्चियन कालेज से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने वकालत की परीक्षा पास की और उस समय के एक प्रसिद्ध वकील सर सी. वी. कुमारस्वामी शास्त्री के सहायक के रूप में लगभग एक वर्ष काम करने के बाद जुलाई 1904 में अपने एक सहपाठी राधाकृष्णैया के साथ अपनी फर्म बनाकर स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस शुरू की। शीघ्र ही उनकी प्रसिद्धि एक योग्य – विद्वान वकील के रूप में होने लगी। उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर जब उन्हें 1921 में मद्रास हाईकोर्ट का जज बनाया गया तो यह घटना कई  दृष्टियों से विशेष बन गई। स्वतंत्र वकालत करने वाले वे प्रथम भारतीय थे जिसे हाईकोर्ट का जज बनाया गया। अपने समकालीन अन्य जजों में वे  सबसे कम उम्र के जज थे। बाद में 1939 में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में वे रिटायर हुए। इसके बाद हैदराबाद के निजाम ने भी उन्हें बरार का एजेंट बनाकर उनकी योग्यता का लाभ उठाया।

 

जज बन जाने के बाद 1922 में उन्होंने अंडाल अम्मा नामक जिस युवती से विवाह किया वह संपन्न परिवार की महिला थीं, सुशिक्षित थीं जो उस ज़माने में बहुत बड़ी बात थी, पर कम उम्र में ही विधवा हो गई थीं। हमारे समाज में विधवा की स्थिति तब कैसी होती थी , यह सर्व विदित है। फिर तत्कालीन समाज में, और वह भी उच्च वर्ग में विधवा-विवाह करना बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था। वेंकटसुब्बा राव साहसी व्यक्ति थे, समाज सुधार के बहुत बड़े समर्थक थे। स्त्रियों की दुर्दशा दूर करने के लिए  तो मानों वे कृतसंकल्प थे। अतः इस विवाह के लिए वे स्वयं आगे आए।

 

वे अध्ययनशील भी थे और उनकी रुचि क़ानून के अलावा साहित्य में भी थी। देश में उन दिनों कहानीकार के रूप में प्रेमचंद की ख्याति फैल रही थी। उनके साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद किया जा रहा था। प्रेमचंद की एक कृति का तमिल अनुवाद वेंकटसुब्बा राव ने पढ़ा। उस पुस्तक ने उनके दिल -दिमाग को झकझोर दिया।  उन्होंने  अपनी  पत्नी को भी वह पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उसे पढ़ने पर उनकी पत्नी भी सोच में डूब गईं। आपस में विचार – विमर्श करके उन्होंने एक संस्था की स्थापना करने का निश्चय किया। उस संस्था ने  मद्रास के सामाजिक जीवन की भी दिशा बदल दी। प्रेमचंद की उस पुस्तक का नाम था ” सेवा सदन “।

 

जो पाठक सेवा सदन से परिचित न हों उन्हें बता दूँ कि प्रेमचंद का यह  उपन्यास अनमेल विवाह की समस्याओं  पर आधारित है जो उन दिनों बहुत प्रचलित था। नायिका अपने अनमेल विवाह से त्रस्त है, पारिवारिक समस्याओं से जूझ रही है। उसका असंतोष उसे इस कदर तोड़ देता है कि वह वेश्यावृत्ति अपनाने में भी संकोच नहीं करती, पर शीघ्र ही उसे अपनी भूल का अहसास होता है और फिर वह अपनी  भूल का प्रायश्चित करते हुए एक  ऐसा  अनाथालय खोलती है जहां वेश्याओं की बच्चियां रखी जाएँ, उन्हें शिक्षा पाने की सुविधा मिले ताकि वे समाज में सम्मानजनक रूप से जी सकें और उनके इस  गर्त में गिरने की संभावना न रहे।  इस अनाथालय का ही नाम है,  ” सेवा सदन “।

 

यह  उपन्यास  प्रेमचंद ने पहले उर्दू में ” बाज़ार – ए –  हुस्न ”  नाम से लिखा था।  पर आर्य समाज उन दिनों समाज सुधार का सबसे बड़ा आन्दोलन था। हिंदी का प्रचार करना और स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक बनाने के लिए प्रयास करना उसके कार्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग थे। प्रेमचंद जब उसके संपर्क में आए तो उनके विचारों में भी परिवर्तन आया। एक ओर तो उन्हें हिंदी के महत्व का अनुभव हुआ  और दूसरी ओर सामाजिक समस्याओं के केवल चित्रण नहीं, बल्कि  उनके समाधान की ओर भी उनका ध्यान गया। परिणामस्वरूप उन्होंने इसे हिंदी में ’ सेवा सदन ’ के नाम से लिखा और कथानक में भी परिवर्तन कर दिया। उर्दू उपन्यास दुखांत था, उसमें नायिका अंत तक  वेश्या ही बनी रहकर पछताती रहती है। हिंदी उपन्यास में नायिका को सन्मार्ग पर लाकर उसे सुखान्त बना दिया है। संयोग से इसका प्रकाशन भी पहले हिंदी में 1919  में हुआ , उर्दू में पांच वर्ष बाद 1924 में हुआ। हिंदी उपन्यास से प्रेमचंद को उर्दू उपन्यास की अपेक्षा आर्थिक लाभ भी अधिक हुआ।  उन्हें रायल्टी के रूप में 450 रु. मिले, जबकि उर्दू उपन्यास से बहुत जद्दो-जहद करके 250  रु, ही मिल पाए। यह उस युग में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता का भी उदाहरण है।

 

वेंकटसुब्बा राव और अंदाल अम्मा को इस उपन्यास का अंत बहुत पसंद आया। स्त्रियों की दुर्दशा को सुधारने का उन्हें यह एक अच्छा उपाय लगा। उन्होंने 1928 में जिस संस्था की स्थापना की, उसका नाम ’ सेवा सदन ’ ही रखा। स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था करना और आश्रयहीन स्त्रियों को आश्रय एवं सुरक्षा प्रदान करना इस संस्था का मुख्य उद्देश्य बनाया। इस कार्य के लिए उन्होंने अपनी कई एकड़ ज़मीन तथा महलनुमा कोठी उसे दान कर दी। उनकी पत्नी ने भी अपनी सारी जायजाद, अपने गहने , हीरे – जवाहरात  सब कुछ उस सेवा सदन  के नाम लिख दिया। इस युगल की इन सेवाओं का सम्मान जनता ने तो किया ही,  सरकार ने भी किया। अँगरेज़ सरकार ने वेंकटसुब्बा राव को 1936  में ’ सर ’ की उपाधि से विभूषित किया तो आज़ादी मिल जाने के बाद स्वदेशी  सरकार ने अंडाल वेंकटसुब्बा राव के योगदान की सराहना करते हुए उन्हें 1957 में ’ पद्म भूषण ’ से सम्मानित किया।

 

“ मद्रास सेवा सदन ” की जब लोकप्रियता बढ़ने लगी तो फिल्मकारों का भी ध्यान इस ओर गया। फिल्म  निर्देशक  / निर्माता  के. सुब्रमण्यम ने मद्रास युनाइटेड आर्टिस्ट कारपोरेशन के बैनर तले ” सेवा सदनम ” नाम से 1938 में फिल्म बनाई जिसके कथा लेखक के रूप में प्रेमचंद का नाम दिया गया।  तमिल फिल्म इंडस्ट्री में यह युगांतरकारी फिल्म सिद्ध  हुई। यद्यपि रूढ़िवादी लोगों ने इसका जमकर विरोध किया , पर फिल्म ज़बरदस्त रूप से सफल हुई। एस . सुब्बुलक्ष्मी  ( 1916 – 2004 ) को हम लोग गायिका के रूप में तो जानते ही हैं, उन्होंने कुछ विशिष्ट फिल्मों में  यादगार  अभिनय भी किया। ” सेवा सदनम ” ही वह फिल्म थी जिससे उन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की थी।

 

वेंकटसुब्बा राव और अंडाल अम्मा ने जो स्वप्न देखा था, वह ” मद्रास सेवा सदन ” ( और बेंगलुरु में भी ” अभय निकेतन” ) के रूप में साकार हुआ जहाँ आज यह धर्मार्थ संस्था के रूप में रजिस्टर्ड है और इसके अंतर्गत एक दर्जन से भी अधिक संगठन नारी उत्थान एवं समाज कल्याण के लिए कार्य करके उनकी यशःकीर्ति की पताका फहरा रहे हैं। साथ ही प्रेमचंद का भी अद्वितीय स्मारक बन गए हैं। साहित्य समाज को कैसे प्रभावित कर सकता है, यह इसका जीता – जागता उदाहरण है। शब्द शक्ति की यह अनूठी मिसाल है।

 

 

- डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, वित्त मंत्रालय भारत सरकार ;
आस्ट्रेलिया

जन्म लखनऊ में, पर बचपन – किशोरावस्था  जबलपुर में  जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं  में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर – सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी – अंग्रेजी – संस्कृत में 500 से अधिक लेख – समीक्षाएं, 10 शोध – लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक – अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान. 

 

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