भ्रम के चौराहे पर

 

“लेकिन मैडम, वो चार नंबर वाले सर तो कह रहे हैं कि वेट करने की मशीन तो आपके पास ही है !” कार्यालय में उनका विवाद जारी था। “आप ही आर्टिकल का वेट करेंगी और आप ही टिकट देंगी ?”
“अरे! अभी मैंने आपसे ही कहा था या किसी और को कहा था?” विंडो पर कार्यरत महिला तेज़ गुस्से में बोली, “वो वेट कर के देंगे और मैं उतने पैसे के टिकट दूंगी, वेट उनसे ही पूछ कर आईये, जाईये।”
“यानि मैं उस विंडो पर लम्बी लाईन में एक-डेढ़ घण्टा ख़राब करके सिर्फ इसका वेट पूछूं और फिर आपकी विंडो पर एक घण्टा ख़राब करके आपसे टिकट खरीदूं ? मजाक समझ रखा है क्या ? या मैं फालतू हूँ?” उनका स्वर ऊँचा होता गया।
“चिल्लाईये मत और हटिये यहाँ से! पीछे और भी कस्टमर हैं, चलिए हटिये।”
“आज तो इनकी कम्पलेंट करनी पड़ेगी, मैं अभी कम्पलेंट करता हूँ आपकी और आपके रूड़ नेचर की।” वे जोर से चिल्लाए तो आसपास खड़े लोग सहम कर उनकी ओर देखने लगे। “आज तो जीत हो गई शर्मा मैडम की” उन्हें कम्पलेंट करने अन्दर जाते देख दो कार्यालय कर्मी आपस में बतियाए, जिनकी आवाज वे सुन थे, “मैडम तो चाहती ही हैं कि कोई उनकी कम्पलेंट करे और उन्हें उस विण्डो से छुटकारा मिल जाए।” उन्हें झटका सा लगा “अच्छा, तो ये बात है!” आवेश में आगे बढ़ते उनके कदम ठिठक गए और वे बिना कोई कम्पलेंट किये बाहर आ गए, चौराहे पर।
चौराहे पर उसी आफिस से सेवानिवृत्त उनके पूर्व परिचित अकरम साहब मिल गए, उन्हें पूरी बात बताई तो बोले, “और आप उन दोनों की बात सुन कर वापस आ गए ? अरे, आपको कम्पलेंट कर देनी थी। आप फंस गए उनके जाल में! ये सब उस मिसेस शर्मा और उनके चमचों की चाल है जो नहीं चाहते कि कोई उनकी कम्पलेंट करे। जाइए आप तो कम्पलेंट कर दीजिए।” कहकर अकरम साहब अपनी बाइक पर फुर्र हो गए।
उन्हें ऐसा लगा कि वो शहर के नहीं, भ्रम के ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहाँ अव्यवस्था से लड़ने के लिए पता नहीं कौन सा रास्ता जाता है?

 

- संतोष सुपेकर

संक्षिप्त परिचय : 

मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में जन्मे संतोष सुपेकर की मातृभाषा मराठी है लेकिन लेखन वे हिन्दी में करते हैं। उनके पिताश्री मोरेश्वरजी सुपेकर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के जिमनास्टिक-कोच हैं। एम कॉम तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त संतोष सुपेकर पश्चिम रेलवे में ‘लोको पायलट’ के पद पर कार्यरत हैं।

उनकी साहित्य सेवा को देखते हुए अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने उनको सम्मानित एवं पुरस्कृत किया है।

कविता, लघुकथा एवं व्यंग्य उनकी प्रिय विधाएँ हैं।

‘साथ चलते हुए’(2004) तथा ‘हाशिए का आदमी’(2007) के बाद ‘बंद आँखों का समाज’ उनका तीसरा लघुकथा-संकलन है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>