प्यार का इंतजार

१.

उस दिन तहसील किनवट के सरस्वती विद्यामंदिर महाविद्याल में गैदरिंग के लिए प्रैक्टिस चल रही थी | गोविंद महाविद्यालय के छात्र संसद का सचिव होने के कारण  वह मंच पर बैठा था | मंच पर गोविंद के मित्र प्रतिभा और प्रभाकर मराठी गीत का अभ्यास कर रहे थे | प्रक्टिस में कई छात्र और छात्रायें निचे बैठे थे | सहसा गोविंद की नजर एक लडकी पर पड़ी | वह अपनी सहेलियों से मुस्कुराकर बातें कर रही थी | उसका वह मुस्कुराना गोविंद को भा गया था | गोविंद ने पहली बार उसे उस समय देखा था | उसे लगा कि हमारे कॉलेज में इतनी खुबसूरत लड़की हैं और मुझे पता तक नहीं | तीखी और सीधी नाक, धनुष्याकार भोंये, गुलाब की पंखुड़ियों से लाल और पतले ओंठ, चाँद-सा खुबसूरत चेहरा कुल मिलाकर वह किसी के सपनों की राजकुमारी के समान थी |

गोविंद का अबतक गम्भीर चेहरा उसकी ओर देखकर मुस्कुराने लगा था | वह उसकी ओर तबतक देखता रहा था, जबतक वह उसकी ओर ना देख लें | सहसा जब उसकी नजर गोविंद पर पड़ी, उसे देखता देख वह भी शरमाने लगी | और शुरू हुई तब एक प्रेम कहानी | बात कुछ आगे बढती कोच सर ने प्रक्टिस खत्म होने की घोषणा कर दी | वह अपनी सहेलियों के साथ निकल पड़ी | गोविंद बेचैन था | उसके जाने के बाद उसे फिर से देखने का मन करने लगा था | उसने कॉलेज का गेट पार कर लिया था | गोविंद ने अपने मित्रों को पीछे छोड़ा और अपनी बी.एस.ए.एस.एल.आर साईकिल पर बैठ उसके पीछे निकल पड़ा | वह तबतक उसक पिछा करता रहा जबतक कि उसके घर का पता उसे मिल न जाये | जब वह उसका पिछा कर रहा था तब उसने एक बार जब मुड़कर देखा कि गोविंद उसका पिछा कर रहा हैं | गोविंद तो सकपका गया था पर उसने गोविंद की ओर देख कर मुस्कुराया और आगे चलते बनी |

उस दिन गोविंद ठीक से सो नहीं पाया था | रात भर वह उसके बारे में सोचता रहा था | दूसरे दिन वह कॉलेज के भीतर आनेवाली सडक पर अपने मित्रों के साथ उसका इंतजार करता हुआ खड़ा था | जब उसने अपनी सहेलियों के साथ कॉलेज के भीतर आनेवाली कच्ची सडक पर  कदम रखा | वह उसे देखता रह गया था | जब उसकी सहेली ने उसे नाम से पुकारा ‘मधुबाला’ | तो गोविंद के हृदय में वह नाम अंकित हो गया था | प्रेम का सिलसिला चल पड़ा | कॉलेज, कॉलेज गार्डन,सडक, कैंटीन, आदि | गोविंद उसे देखने के लिए हर रोज कोई न कोई बहाना बना उसके आसपास पहुँच ही जाया करता था | एक दिन जब उसने हिम्मत कर उसके सामने इजहार करने का प्रयास किया पर वह सफल नहीं हो पाया |

उसने एक खत उसके नाम लिखा | वह खत कविता की पंक्ति में था | उसने हिम्मत कर एक दिन जब वह घर पर अकेली थी तब उसने उसके हाथों में वह चिठ्ठी थमा दी | और चलता बना | उस दिन से वह कई दिनों तक उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था | वह उसकी ‘ना’ नहीं सुनना चाहता था | एक दिन उसने एक लडके के हाथों चिठ्ठी भेजी | वह कहीं एकांत में गया और चिठ्ठी खोलकर देखा | वह वही चिठ्ठी थी | जो गोविंद ने मधुबाला को दी थी | और मधुबाला ने उसे वापस लौटा दिया था | पर उसने जब गौर से देखा कि उसकी कविता की पंक्तियाँ बढ़ गयी हैं | उसने अपना जवाब कविता से ही दिया था | लिखा था ‘वह किसी और से प्रेम करती हैं |’

 २.

          आंठ साल बाद गोविंद और मधुबाला की मुलाखात नांदेड के स्वामी रामानंद तीर्थ विश्वविद्यालय में हुई थी | गोविंद अपने किसी काम से वहाँ गया था | तो मधुबाला मायग्रेष्ण टीसी निकालने के लिए अपनी सहेली के साथ आयी हुई थी | वह अब भी कुँवारी थी | उसे देख कर गोविंद की पुरानी यादे ताजा हो आयी थी | गोविंद ने ग्रेज्युवेशन पूरा किया और अगली पढायी के लिए उसे तहसील किनवट छोड़ना था | उसी वक्त ही उनके पिताजी का ट्रासफर नांदेड में हुआ था | मधुबाला को जब यह बात पता चली तब उसने  कई बार उससे मिलने की कोशिश की पर बात नहीं हो पायी थी | जब किनवट के शिवाजी चौक में गोविंद और मधुबाला आमने-सामने से गुजरने लगे थे | तब उसने उसे मुस्कुराते हुए हाथ दिखाया था | वह उस समय उसे कुछ कहना चाहती थी | पर गोविंद सुनने की मानसिकता में नहीं था | मधुबाला की ना ने उसे निराश कर दिया था | गोविंद आगे चला गया | उसी दिन फिर से श्याम को तहसील के पास उसने फिर से हाथ दिखाया | गोविंद सोचने लगा कि अब हाथ क्यों दिखा रही हैं | जब हम कल नांदेड जा रहे हैं | अब क्या रहा हैं | हमारे बिच वह तो किसी ओर से प्रेम करती हैं | जब गोविंद ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी | तब उसकी आँखों में आँसू आगये थे | लेकिन अब देर हो चुकी थी | वह किनवट में और गोविंद नांदेड में रहने वाले थे | वह उनकी अंतिम भेंट थी |

‘’ कैसे हो गोविंद ? मुझे पहचाना |’’ मधुबाला ने गोविंद से कहा |

‘’ हाँ, तुम्हे मैं कैसे भूल सकता हूँ | मैं ठीक हूँ |’’

‘’तुम कैसी हो ? और यहाँ कैसे आना किया ?’’

पुरानी यादे ताजा हो गयी | दोनों अब बड़े और समझदार हो गये थे | परिसर के एक वृक्ष के निचे बैठे बातें करने लगे | उसने तब कहा |

‘’ तुम्हे पता हैं, उस दिन मैं तुम्हे क्यों हाथ दिखा रही थी | मैंने कई बार तुमसे मिलने की कोशिश की पर मिल नहीं पायी | और जब हम आमने सामने आये  तब तुमने भी मुझ से मुख मोड़ लिया था | मुझे पता था तुम्ह मुझ पर नाराज थे | क्योंकि मैंने खत में लिखा था कि मैं किसी ओर से प्रेम करती हूँ | पर क्या तुम्हे यह पता हैं कि मैंने ऐसा क्यों लिखा था ? क्योंकि मैं तुमसे सच्चा प्रेम करती थी | तुम्हारा बी.ए.का अंतिम वर्ष था | हमारे प्रेम के कारण तुम्हारा साल बर्बाद ना हो इसलिए मैंने वह नाटक किया था | मैं तो तुम्हारे प्रेम में उसी दिन पड़ गयी थी | जिस दिन हमारी पहली मुलाखत गैदरिंग की प्रेक्टिस में हुई थी | पर मुझे क्या पता था कि यह सबकुछ हो जायेगा | मैं आज भी तुम्हसे प्रेम करती हूँ गोविंद | पप्पा ने कई बार मेरे लिए रिश्ता देखा पर मैं तुम्हारे इंतजार करती रही थी | मैं तुम्हसे विवाह करना चाहती हूँ |’’ और उसने गोविंद का हाथ पकड़ लिया | और अपनी बाहों में लेने वाली थी कि गोविंद ने उसे रोक दिया | मधुबाला मैं भी तुम्हसे बहुत प्रेम करता था | आज भी करता हूँ…. किन्तु अब मैंने किसी ओर से विवाह कर लिया हैं |

 

-  डॉ. सुनिल जाधव

शिक्षा : एम.ए.{ हिंदी } नेट ,पीएच.डी

कृतियाँ :

कविता : १.मैं बंजारा हूँ  २.रौशनी की ओर बढ़ते कदम  ३.सच बोलने की सजा ४.त्रिधारा   ५. मेरे भीतर मैं

कहानी : १.मैं भी इन्सान हूँ  २.एक कहानी ऐसी भी                             .              

शोध :१.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य  २.हिंदी साहित्य विविध आयाम  ३.दलित  साहित्य का एक गाँव  

अनुवाद : १.सच का एक टुकड़ा [ नाटक ]

एकांकी १.भ्रूण  

संशोधन : १.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य का अनुशीलन

                 २.विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लगभग पचास आलेख प्रकाशित

अलंकरण एवं पुरस्कार  : १.अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार [ताशकंद]

                  २. अंतर्राष्ट्रीय सृजन श्री पुरस्कार  [दुबई]

                  ३.भाषा रत्न [दिल्ली]

                  ४.अंतर्राष्ट्रीय प्रमोद वर्मा सम्मान [कम्बोडिया ]

                  ५. विश्व हिंदी सचिवालय, मोरिशियस दवारा कविता का अंतर्राष्ट्रीय प्रथम

                      पुरस्कार       

विदेश यात्रा :  १.उज्बेक [रशिया ]  २.यू.ए.इ  ३.व्हियतनाम  ४.कम्बोडिया  ५.थायलंड

विभिन्न राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, कविता, कहानियाँ प्रकाशित :-

   नव्या ,सृजन गाथा, प्रवासी दुनिया, रचनाकार, पुरवाई, रूबरू, हिंदी चेतना, अम्स्टेल गंगा,

   साहित्य सरिता, आर्य संदेश, नव निकष , नव प्रवाह, १५ डेज,  अधिकार,  रिसर्च लिंक,

   शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन,  संचारिका,  हिंदी साहित्य आकादमी शोध पत्रिका, केरल,  

   आधुनिक साहित्य,  साहित्य रागिनी, खबर प्लस ..आदि |     

ब्लॉग : navsahitykar.blogspot.com

काव्य वाचन :

       १. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, ताशकंद

       २. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,दुबई

       ३. विश्व कवि सम्मेलन, कैनडा

       ४. अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन,कम्बोडिया

सम्प्रति : हिंदी विभाग ,यशवंत कॉलेज, नांदेड

पता : नांदेड ,महाराष्ट्र -०५ 

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