डोंट टेल टू आंद्रे

कार १२० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भागी जा रही थी. मंजिल थी गोवा. पीछे की सीट पर मेरी १४ साल की बेटी और ८ साल का बेटा दोनों अंड़़से हुए पड़़े थे. आगे की सीट पर मैं और स्टेयरिंग पति के हाथों में थी. अब स्पीड कम हो चुकी थी क्योंकि घाट की चढ़़ाई आ चुकी थी. मैं आंखें बंद किए हुए थी. सूरज सिर पर तप रहा था. घाट होने के कारण कार का एसी बंद था. खिड़़कियां खुली हुई थीं. खड़़ी धूप होने के बावजूद पहाड़़ों की हवा बदन को सुकून पहुंचा रही थी. एक ओर पहाड़़, उसे काट कर बनाई सड़क़ और दूसरी तरफ गहरी खाई….खाई की गोद में नन्हें पहाड़़ और उनके संग अठखेलियां करती नदी…. हर दृश्य अपने आप में अनोखा और सुंदर… अगला दृश्य पहले वाले दृश्य से ज्यादा सुंदर लगता.
मैं चुपचाप उन दृश्यों को आंखों से पीती फिर आंखें बंद कर उन्हें मन ही मन जीती. प्रकृति की गोद में कितनी शांति मिल रही थी. अंदर-बाहर और मेरे मन में – तीनों जगह शांति तैर रही थी. अंदर कार में बच्चे ऊंघ रहे थे. पति गाड़़ी चलाने में तल्लीन थे. घाट पर ड्राइव करते हुए अतिरिक्त सावधानी की जरूरत पड़़ती है. बाहर ऐसा लग रहा था पहाड़़ भी भरी दोपहरी में धूप से बचने के लिए दम साधे खड़़े हों…और तीसरी जगह यानी मेरा मन…वह भी शांत. विचारों का आवागमन थम चुका था. स्थिर मन ने प्रकृतिकी निस्तब्धता से संगति बिठा ली थी.
पर मन कहां देर तक शांतचित्त रह पाता है! एक विचार आ धमका – कुछ रह तो नहीं गया….कुछ छूट तो नहीं गया? मैं मन ही मन हिसाब लगाने लगी. जरूरत का सारा सामान रख लिया न, कुछ भूली तो नहीं…..हम चारों की जरूरत के सारे सामान, दवाइयां वगैरह सब कुछ रखलिया था. इस बार तो इन्होंने दो दिन पहले ही कन्फर्म कर दिया था कि गोवा जाना है. वरना अकसर दो घंटे का समय देते हैं – तैयार हो जाओ चलना है. और मैं फौजियों की तरह तैयार हो जाती हूं. इस बार सात दिन का टूर बना के निकले थे गोवा के लिए. मगर मैंने सबके लिए दो जोड़़ी कपड़़े एक्सट्रा रख लिए थे. क्योंकि इनके एक टूर में से दूसरा टूर कब निकल आए पता नहीं.
पिछली बार हम जब घर से निकले थे लोनावला-खंडाला के लिए. वहां एक दिन बिताने के बाद जनाब बोले ‘चलो गोवा चलते हैं’
बेटी भी चहककर बोली – ‘गो गोवा.’ और वहां हम चार दिन रुके – दो जोड़़ी कपड़़ों में
कैसे? बताती हूं – मैं साथ में इस्त्री लेकर गई थी. मैं भी बहुत चालू हूं. मैं इस्त्री क्यों ले गई थी? इसके पीछे भी एक कहानी है. उससे पहले हम नासिक गए थे. वहां जाने कैसे मेरी बेटी की फ्राक उधड़़ गई. एक्स्ट्रा कपड़़े थे नहीं. होटल पहुंच कर कपड़़े धोए. मगर सूखने में वक्त लगा. सूखे तो बेटी ने तुड़़े-मुड़़े कपड़़े पहनने से साफ इंकार कर दिया. एक पूरा दिन इसी में खराब हो गया था.
इसलिए अगले टूर के समय मैंने चुपचाप एक इस्त्री साथ में रख ली थी. जो गोवा पहुंचकर बहुत काम आई थी. मेरी एक्सट्रा समझदारी पर पति भी खुश हो गए.
….तो ऐसा होता है. घर-गृहस्थी के चक्कर में औरतें एक्सट्रा समझदार हो जाती हैं. आखिर इंसान अपने अनुभवों से ही सीखता है…जो ना सीखे वो गंदे कपड़़े पहने.
इस बार जब गोवा जाना पक्का हो गया तो ऑफिस के लिए निकलते हुए मैंने रंजना(परिचयः जो हमारे घर को संभालती है. इन दस सालों में मेरे परिवार की धुरी बन गई है.) से कहा – हम सबके कपड़़े पैक कर देना. गोवा जाना है… और हां, मेरी वो ब्लैक कलर की साड़़ी भी. इस पर वह हंसी, ‘गोवा जा रहे हो तो कपड़़़ों की क्या जरूरत…..’ ‘और ये बात उसनें अपने अनुभव से कहे थे. पिछली बार जब हम अचानक गोवा गए थे तो साथ में वह भी थी. मगर गोवा में विदेशी सैलानियों को टॉपलेस देखकर पूरा समय वह नाक-भौं सिकोड़ती रही. इसलिए इस बार उसने गोवा जाने से साफ इंकार कर दिया था.
उसकी बात पर हम सब हंसे. पति ने टोका, ‘अरे वाह गोवा में तो जैसे तुम साड़़ी पहनकर घूमोगी!’
मैंने तर्क दिया, ‘क्या पता, क्या जरूरत पड़़ जाए….जो चीज नहीं होती है उसी की जरूरत पड़़ जाती है.’
इस पर पति खीज कर बोले, ‘हां, हां, दिसंबर का महीना है. रजाई-गद्दे भी ले चलो, पूरा घर ले चलो….’ उन्होंने ताना मारा.
मैं भड़क़ उठी – ‘तो फिर कहीं जाने की क्याजरूरत है? यहीं घर पर रहो ना.’
बात बढ़़ती देख मेरी बेटी भुनभुनाई ‘जब देखो, तब….अभी यहां झगड़़ रहे हो, और चल के वहां भी झगड़ऩा….’
बेटे ने भी बड़ी मासूमियत से दीदी की हां में हां मिलाई, ‘मेरा मूड खराब मत करो.’
उसकी बात पर हम सब हंस दिए. माहौल हल्का हो गया था.
अब कार में बैठे-बैठे यही सारी बातें याद आ रही थीं. मैं फिर सोचने लगी – कुछ भूली तो नहीं. न जाने क्यों, मेरे दिमाग में कुछ खटक रहा था. जब याद नहीं आया तो मैंने इस बारे में सोचना छोड़़ एफ एम रेडियो ऑन कर दिया. घाट समाप्त हो चुका था. घाट खत्म होते ही कार रोक दी गई. बच्चों ने उल्टियां कीं. सड़क़ के सफर में बच्चों को परेशानी होती है. इसलिए वे कार से लंबी दूरी की यात्रा पसंद नहीं करते. बेटे को आगे की सीट पर बिठा कर मैं पिछली सीट पर आ गई सोने के लिए. मगर नींद कहां आती है! फिर भी मैं आंखें बंद किए पड़़ी रही जाने कितने घंटे… महाराष्ट्र की हद खत्म होने को थी. इन्होंने आवाज देकर हम सबको बताया कि अब हम गोवा में दाखिल होने वाले हैं. बच्चे खुशी से चिल्लाए. यह सफर खत्म होने की खुशी थी या गोवा पहुंचने की? फिर भी होटल पहुंचने में कई घंटे खर्च हो गए.
गोवा के कलंगुट बीच पर गोवा टूरिज्म के रिसोर्ट में हमें एक कॉटेज मिल गया. बेटी खुश हो गई. पिछली बार वह इसी रिसोर्ट में रुकना चाहती थी. मगर हमें बुकिंग नहीं मिली थी. तब उससे कहा था कि अगली बार आएंगे तो यहीं रुकेंगे. शु है कि वादा पूरा हो गया…
कॉटेज में पहुंचकर दोनों बच्चे चेंज कर स्वीमिंग पूल के लिए भागे. यहां रुकने की एक खास वजह यह भी थी. ये भी शॉवर लेने चले गए. मैं बैग अनपैक करने लगी. मेरी नजर साड़़ी पर पड़़ी. जी चाहा पहन लूं पर जी को रोक लिया कि किसी और समय पहनूंगी. शाम ढल चुकी थी. इसलिए सोचा नाइटी पहनना ठीक रहेगा. पर मुझे नाइटी कहीं मिली ही नहीं. तो यही बात दिमाग में खटक रही थी. नाइटी रखना भूल गई थी. …..खैर जाने दो इसके बिना काम चला लूंगी- मैंने सोचा.
तीन दिन तो नॉर्थ गोवा, साउथ गोवा वगैरह घूमने में चले गए. चौथे दिन सब जमकर सोए. शाम को उठे तो बीच पर जाकर बैठे हम चारों. बच्चे अपने खेल में मग्र थे. आसमान में लगभग पूरा चांद चमक रहा था. पूर्णिमा को अभी दो दिन बाकी थे. इस बार २५ दिसंबर को पूर्णिमा पड़़ी थी. चांद की किरणें समंदर पर ऐसे पड़़ रही थीं- जैसे रोशनी का राजमार्ग हो कोई. मन कर रहा था कि इसी रोशनी की डोर पकड़े चल पडूं तो शायद चांद तक पहुंच जाऊं.
मैंने इनसे चहेककर कहा – ‘चलो चांद पर चहलकदमी कर आएं.’
जनाब बोले – ‘आज नहीं, मैं बहुत थका हुआ हूं.’
मैं भुनभुनाकर रह गई. शादी के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे के रोमांटिक मूड की ऐसे ही वाट लगाते हैं.
मैंने रूठकर दूसरी तरफ मुंह घुमा लिया. एक हाथ की दूरी पर दो विदेशी युवतियां थीं और एक पुरुष भी. मैं उनको ही देखने लगी. मैंने देखा वे एक-दूसरे की फोटो खींच रहे थे. पर तीनों एक साथ फ्रेम में नहीं आ पा रहे थे. उनकी परेशानी देख मैंने अपनी बेटी को उनकी मदद के लिए भेजा. वे बड़़े खुश हुए और पांच मिनट में ही हम घुल-मिल गए. उनमें एक युवती ज्यादा मिलनसार थी उसका नाम लूबा था. उसे देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वह रशियन है. उसके दोनों साथी ईरा और जिम शादीशुदा थे. जाने क्यों लूबा को भारतीय संस्कृतिमें ज्यादा दिलचस्पी थी.
लूबा ने बेटी से कहा कि उसे दो-तीन बॉलीवुड डांस सीखना है. मेरी बेटी भी डांस की शौकीन. पीछे सैक पर फिल्मी गाने ही बजते रहते हैं. उस समय ‘कजरारे, कजरारे, तेरे काले काले नैना ‘ बज रहा था.
बेटी ने उस गाने के स्टेप्स करके दिखाए. दो-तीन मूवमेंट के ही बाद लूबा ने हूबहू नकल कर ली. फिर उसने कमर हिलानी सीखी. फिर मैडम ने क्लासिकल डांस की फरमाइश की. बेटी को भरतनाट्यम और कत्थक के कुछ स्टेप्स आते थे उसे भी लूबा ने सीख लिया. फिर गरबा, उसमें तो मैं भी शामिल हो गई. गोवा के बीच पर गरबा, वह भी विदेशी के साथ, कितना फनी……फिर उसने मेरी बेटी को रशियन डांस भी सिखाया.
हम थक कर सुनहरी रेत पर बैठ गए. लूबा ने अपनी टूटी-फूटी इंग्लिश में पूछा – ‘यू इंडियन नाट वेयर सारी….?’
मैं मन ही मन हंसी ‘तुम लोग तो टू पीस में घूमती हो और हम भारतीय नारियां ५ मीटर की सारियां पहनकर घूमें ….वाह! ‘
मुझे हंसता देख उसने पूछा – ‘वॉय लाफ?’
मैंने उसे समझाया कि टूरिस्ट प्लेस पर कोई औरत साड़़ी नहीं पहनना चाहेगी. क्यों? – ये भी समझाया. मेरी बेटी ने तपाक से उससे पूछा – ‘डू यू वांट टू वेयर सारी?’
उसने झिझकते हुए कहा, ‘आई वांट टू सी इट .’
कोई विदेशी हसीना भारतीय साड़़ी देखना चाहे तो कोई भारतीय नारी कैसे मना कर सकती हैं! हम उन्हें अपने रिसोर्ट में ले आए.
पति ने रास्ते में मुझे छेड़़ते हुए चुटकी ली -’भई वाह, तुम्हारी साड़़ी ने तो हिंदुस्तानियों की इज्जत बचा ली. नहीं तो रूस में भारत की छवि खराब हो जाती.’ उनका इंटरनेशनल ताना सुनकर भी मैं मुस्कुरा दी.
मैंने उन्हें अपनी साड़़ी दिखाई. दोनों औरतों को बहुत पसंद आई. लूबा की दिलचस्पी देख मैंने उसे साड़़ी पहनाई. छरहरे बदन की गोरी-चिट्टी लूबा पर काली साड़़ी खूब जंच रही थी. साड़़ी में लाल रंग के रेशमी धागे से कढ़़ाई की गई थी और सुनहरे सितारे लगे हुए थे. मैंने उसके हाथों में कड़़े पहनाएं. गले में नेकलेस, माथेपर बिंदी भी लगाई. उसे देखकर मुझे पुरानी फिल्म सरस्वतीचंद्र का गाना याद आया …’चंदन सा बदन, चंचल चितवन….’ हमने उसके कईफोटो भी खींचे – अलग-अलग पोज में. किसी हीरोइन से कम नहीं लग रही थी वह. जब उसके सिर पर घूंघट रखा तो वह किसी हिंदुस्तानी दुल्हन की तरह ही शरमा गई. उसकी वह छवि सिर्फ कैमरे में ही नहीं मेरी आंखों में भी कैद हो गई.
वे तीनों आपस में आंद्रे का नाम ले रहे थे. मेरे पूछने पर बताया कि आंद्रे और लूबा ‘लिव-इन कपल’ हैं. बातों-बातों में लूबा ने पूछा कि यहां साड़़ी कहां मिलेगी.हम सोच में डूब गए. यह तो हमें भी नहीं पता था.
मेरे पति ने कहा – हम कल ढूंढकर बताएंगे.
वैसे हमने मन ही मन सोच लिया था कि हम उन्हें साड़़ी गिफ्ट करेंगे.
लूबा ने अगले दिन आंद्रे के साथ आने का वादा किया और वे चले गए. उस रात हमने आस-पास की दुकानों पर साड़़ी ढूंढ़़ी. गोवा में साड़ी ढूंढ़ना वैसे ही था जैसे रेत में घांस ढूंढना. किसी ने बताया मापुसा में हैं दुकानें.
तभी मेरी बेटी को एक फ्रॉक पसंद आ गई. उसने लेना चाहा और पति ने डपट दिया – यहां से कुछ नहीं. मुंबई में सब कुछ मिलता है. उसे भी बुरा लगा और मुझे भी. फ्रॉक बड़़ी सुंदर थी मेरी इच्छा हुई थी खरीदने की पर उनकी ना सुनकर मैंने रख दी. हम अपने होटल में लौट आए.
अगले दिन सुबह ११ बजे वे चारों आ गए. आंद्रे हमसे इतने अपनेपन से मिला कि लगा ही नहीं कि हमारे बीच दो देशों की दूरियां हैं. लूबा की तरह वह भी बिल्कुल अपना-सा लगा. इरा और जिम के साथ ऐसा महसूस नहीं हुआ.
हमने एक साथ ब्रेकफास्ट किया और फिर मिलने का वादा कर बिदा हो गए. शाम को हम लोग ूज पर गए. वहां से लौटते हुए फिर बच्चे इधर-उधर चीजें देखकर ललचाने लगे. मुझे भी एक नाइटी खरीदनी थी. पर कहे कौन? सुने कौन? ‘मुंबई में सब मिलता है.’ बेटा फुटबॉल लेने पर अड़़ गया. मैंने उसे डंपटा जैसे वे डपटते हैं – ‘घर पर है ना!’
बेटा बोला – ‘नहीं वो पुरानी हो गई. मुझे गोवा की फुटबॉल चाहिए.’
मैंने उसे बहलाना चाहा, ‘बेटा, अगली बार हम आएंगे तो ले दूंगी.’
इतना सुनते ही बेटी फट पड़़ी – ‘क्या अगली बार! मैंने पिछली बार आपसे सैंड किट मांगा था तो आपने बोला – अगली बार आएंगे तो ले दूंगी और अब मैं बड़़ी हो गई हूं अब मुझे इसकी जरूरत नहीं. अगली बार इसको भी फुटबॉल नहीं चाहिए तो….और अगली बार कभी नहीं आता.’
उसकी बात में वजन था. मैं सोच में पड़़ गई. हम मध्यमवर्गीय अपनी जरूरतों और इच्छाओं को अगली बार के लिए स्थगित कर देते हैं. और सच में वह ‘अगली बार’ कभी नहीं आता. पर मैंने सोच लिया था कि बच्चों की इच्छाएं अगली बार के लिए नहीं टालूंगी.
अगले दिन सुबह-सुबह हम अरंबोल बीच पर निकल गए. यह बीच विदेशी सैलानियों में लोकप्रिय है.
दिसंबर महीने में दुनिया के कई देश बर्फ से जम जाते हैं. सो कई विदेशी गोवा चले आते हैं ठंड से बचने के लिए साइबेरियन पक्षियों की तरह. यहां बीच के किनारे बने छोटे-छोटे हटनुमा कमरे उनके बजट में फिट बैठते हैं. कई सैलानी तो पूरा विंटर सीजन यहीं बिताकर अपने वतन को रवाना होते हैं. ऐसे में बड़़े होटलों में रहना उनके बस की बात नहीं होती. इसलिए अरंबोल बीच पर ज्यादातर विदेशी सैलानी अपना डेरा जमा लेते हैं. उनको बेफि नंग-धड़़ंग देखना हिंदुस्तानियों के लिए एक अजूबा ही होता है.
यहां सड़क़ किनारे लाईन से लगी दुकानों में लेटेस्ट फैशन के कपड़़े और शोपीस देखकर हर किसी का मन ललचा जाता है. मगर दाम सुनकर मन बुझ जाता है.
अंरबोल बीच पर जाते हुए हर दुकान पर मेरी बेटी ठिठक जाती और बेटा खिलौनों की दुकान पर.
मैंने बेटी से कहा कि लौटते हुए ले दूंगी.
अरंबोल बीच के दूसरे छोर पर चट्टानों के पीछे एक स्वीट लेक है. यानी समुद्र किनारे झील! है ना कुदरतका करिश्मा. यह बहुत कम हिंदुस्तानियों को पता है इसलिए वहां ज्यादा किच-किच नहीं होती. विदेशी सैलानियों का यह एक आदर्श आरामगाह है. हमें पहले से पता था. चट्टानों को पार कर हम वहीं पहुंचे. ऐसा लगा कि हिंदुस्तान के अंदर स्विटजरलैंड के किसी बीच पर पहुंच गए हों. पानी देखते ही दोनों बच्चे स्वीम सूट पहन झील में कूदगए. विदेशियों के साथ वे घंटों पानी में तैरते-खेलते रहे. बेटी ने कईयों से दोस्ती भी कर ली.
जब धूप बढ़ऩे लगी तो हम लौट चले. रास्ते में बेटा फिर फुटबॉल के लिए अड़़ गया. उसे मैंने फुसलाकर पापा के पास भेज दिया. बेटी को लेकर मैं एक दुकान की ओर बढ़़ गई. दो-तीन दुकानों पर मोलभाव करते हुए उसके लिए दो टी शर्ट खरीदी. अगली दुकान पर उसके लिए साटन की फ्रॉक भी खरीदी. एक नाइटी मुझे पसंद आई मैंने अपने लिए खरीद ली.
मैंने बेटी से ताकीद की – ‘देख पापा से मत कहना.’
मगर वह बहस करने लगी ‘मम्मी आप इतना डरती क्योंहैं….’
तब तक पति और बेटा आते हुए दिखे. बेटे के हाथ में फुटबॉल थी. हम आगे पार्किंग की ओर बढ़़ चले जहां हमारी कार थी पति की नजर पड़े उससे पहले मैं फ्रॉक वाला पैकेट कार में छुपा देना चाहती थी. गाड़ी के पास भी एक दुकान थी क पड़़ों की. पति उस ओर बढ़ऩे लगे. मैंने पूछा, ‘क्यों?’ बोले, ‘इसके लिए फ्राक खरीद लें.’ मैं शरारत में मुस्कुराई – ‘हमने खरीद ली.’
वे बोले, ‘अच्छा. चलो अपने लिए भी एक खरीद लो.’ मैं डबल शरारत में मुस्कुराई-’वो भी खरीद ली.’
वे भी मुस्कुराए- ‘भई वाह! ये अच्छा किया. तुम लोग मुझसे पूछा मत करो. जो लेना हो ले लिया करो.’

रात को डिनर के बाद हम बीच पर आ गए. दोनों बाप-बेटे फुटबॉल खेलने लगे.
बेटी अपने मन की उलझनें मुझसे शेयर करने लगी. उसे लगता है कि वह १४ साल की हो गई है तो समझदार भी हो गई है. अब वह जो भी सोचेगी, सही ही सोचेगी. इतनी बड़़ी लड़क़ी से गलती तो हो ही नहीं सकती. सच में मां जितनी लंबी हो गई है तो मां की तरह मैच्चोर भी. इसलिए कभी-कभी वह मां को भी नसीहत देने लगती कि अपनी लाइफ अपनी तरह जिओ. क्या हर चीज में पापा से पूछना. अमेरिका में देखो – बच्चे भी अपना डिसीजन खुद लेते हैं.
मैं उसे तर्क देती – ‘नहींष्ट्व छोटी-मोटी बात अलग है. पर उन्हें भी अपने पैरेंट्स से पूछना पड़़ता है. औरतों को अपने पतियों की परमिशन लेनी पड़़ती है.’
इस पर वह खीज कर कहती – ‘मम्मी, आपको तो कुछ भी पता नहीं.’
फिर मैं कहती – ‘ हां – हां तुझे तो सब पता है. पूरी दुनिया घूम चुकी है मेरी नानी अम्मी! चल चुपचाप स्टडी कर, अभी-अभी तो अंडे में से निकली है.’
वह रुंआसी हो जाती – ‘मैं कोई चिकन थोड़़े ही हूं.’ और मैं हंस देती.
इस समय बीच पर बैठे-बैठे वह ऐसी ही कोई डिबेट करना चाह रही थी. और मेरा मन चांद में अटक गया था. आज चतुर्दशी यानी चौदहवीं का चांद. चांद की सुनहरी रोशनी से समुद्र भी सुनहरा हो चला था. कलंगुट बीच की सुनहरी बालू और भी सुनहरी होकर झिलमिलाने लगी थी.
आज २४ दिसंबर२००९ थी यानी सिमस ईव. सिमस के त्यौहार पर गोवा में चहल-पहल बढ़़ गई थी. आंतकी हमले के मद्देनजर चप्पे-चप्पे पर फौजी जवान दिख रहे थे.
मुझे चांद को निहारता देख वह भी चांद को निहारने लगी. फिर बोली ‘देखो मम्मी, सोने की थाली….’
मैं मुस्कुराई, ‘जब शांत मन से बैठो तो इसी तरह के इमैजिनेशन्स आते हैं.’
और वह सच में एकाग्र होने की कोशिश करने लगी. तभी उसके सेलफोन की घंटी बजी. लूबा का फोन था. उसने हम सबको सिमस विश करने के लिए फोन किया था. हमने बारी-बारी से लूबा और आंद्रे से बात की. मेरे पति और आंद्रे ने भी बात की. फोन पर ही उन दोनों ने अगले दिन मापुसा जाने का प्रोग्राम बना लिया.
दूसरे दिन तय समय से दो घंटे लेट आए लूबा और आंद्रे. उन्होंने बताया कि रात में इरा की तबियत खराब हो गई थी इसलिए उसे हॉस्पिटल में एडमिट कराया और वे दोनों अब उससे मिलकर आ रहे हैं. और जल्दी ही उन्हें फिर जाना होगा.
हम लोग मापुसा पहुंचे. गोवा के शहरों में से एक. यहां पर मार्केट में एक शोरूम मिल गया. मैं और लूबा साड़िय़ां देखने लगे. मैंने पहले उसे लेटेस्ट फैशन की सिंथेटिक साड़िय़ां दिखाईं. पर उसे पसंद नहीं आई. उसने कहा, ‘आई वाँट इंडियन टाईप सारी!’ मैं समझ गई और दुकानदार भी. दुकानदार ने साउथ सिल्क की साड़िय़ां निकालीं. ईरा के लिए लूबा ने नीले रंग की साड़़ी पसंद की और अपने लिए हरे रंग की. तभी दुकानदार ने गोल्डन बॉर्डर और पल्लूवाली एक काले रंग की साड़़ी निकाली. इस साड़़ी को देखकर लूबा बच्चे की तरह मचल उठी. उसे वही साड़़ी चाहिए थी. लूबा इंडिया में रहते ही वह साड़ी पहनना चाहती थी. इसलिए हमने दुकानदार को फॉल-बीडिंग कराने के लिए दे दिया. इसमें आधे घंटे का समय लगना था. ज्यादा समय लगता देख आंद्रे ने हॉस्पिटल जाने का निर्णय लिया. आंद्रे के जाने के बाद मैं लूबा को लेकर चूडिय़ों की दुकान ढूंढने लगी. काफी दूर जाकर दुकान मिली. आधे घंटे से ज्यादा हो गया था. आंद्रे का दो बार फोन भी आ गया कि लूबा जल्दी हॉस्पिटल पहुंचे. लूबा जल्दी मचाने लगी. मैंने उसे तर्क दिया साड़ी लिए बिना तुम कैसे जा सकती हो!
मैंने उसके लिए चूड़िय़ां और बिंदी खरीदी. और वापस साड़िय़ों की दुकान में आ गए. आंद्रे बाहर इंतजार कर रहा था. लूबा के चेहरे पर डर की एक हलकी-सी रेखा उभरी. उसने चूड़ियों का पैकेट फटा-फट हैंड बैग में छिपाकर रख दिया.
फिर मुझसे विनती भरे शब्दों में बोली, ‘डोंट टेल टू आंद्रे.’
मैं और बेटी हम दोनों एक दूसरे का चेहरा देखने लगीं.
बेटी के चेहरे से साफ झलक रहा था कि वह समझ गई थी -
औरतों की हालत एक जैसी ही है – चाहे इंडिया हो या रशिया…

 

- सुमन सारस्वत

पत्रकारसाहित्यकार

प्रकाशित कृति : ’ मादा ‘ कहानी संग्रह
1. लोक भारती
2. लोकवाणी ( – सह लेखिकादोनों महाराष्ट्र शैक्षणिक बोर्ड की कक्षा 10 वीं की हिंदी की गाईड )
संप्रति : कंटेंट राइटर ( टारगेट पुब्लिकेशन्समुम्बई ) 

सह संपादक : अम्स्टेल गंगा , नीदरलैंड 
                    वाग्धारा , भारत

पुरस्कार : • महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार
• शिलांग हिंदी अकादमी पुरस्कार
• सृजनश्री अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारताशकंदउज़्बेकिस्तान
• विश्वमैत्री मंच अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारभूटान
• नारी शक्ति महाराष्ट्र पुरस्कार
• स्त्री शक्ति सेंट्रल मुम्बई पुरस्कार
• मदन कला अकादमी पुरस्कार

One thought on “डोंट टेल टू आंद्रे

  1. सुमन जी, कहानी रोचक एवं जिज्ञासवर्धक हैं ।
    कहानी पढ़ते समय ऐसा लगता है कि हम भी कहानी के पात्रों के साथ यात्रा कर रहे हैं ।

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