चोर जेब

बादल ऐसे घिरे थे कि दिन में रात लगती थी। मानो सूरज को ग्रहण लग गया हो। तेज़ हवा के साथ उड़ती छोटी-छोटी बूँदों ने तापमान ग्यारह से सात डिग्री पर ला दिया था। साँस खींचो तो फेफड़ों में टीस उठती थी और छोड़ों तो पसलियाँ काँप जाती थीं। होंठ नीले और चेहरा पीला हुआ जाता था। पार्किंग की जगह रेस्टॉरेन्ट से बहुत दूर मिली थी। गाड़ी से निकला तो ठंड भीतर तक धंसती मालूम हुई। लगता था वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते टाँगें जड़ हो जाएंगी। फिर भी वह गले में लिपटे मफ़लर को नाक तक चढ़ाए, कोट की जेबों में हाथ डाले, गीली सड़क पर आगे बढ़ता जा रहा था।

तभी फोन की घण्टी बजी। इसे भी अभी ही आना था फिर सोचा सुन ले शायद बेटी का हो पर याद नहीं आया कि फोन कहाँ रखा है इसलिए उसने बारी-बारी अपनी पेन्ट, कोट और शर्ट की जेबें टटोलीं पर फोन नहीं मिला। लगा फोन नहीं है पर है तभी तो बज रहा है। शायद वह कोट की चोर जेब में है जिसका प्रयोग वह बहुत कम करता है। चोर जेब का ख्याल आते ही उसका हाथ कोट के भीतर सरक गया। हाथ फोन को छू पाता कि फोन कट गया। उसे लगा उसके भीतर भी एक चोर जेब है। शायद सभी के भीतर एक चोर जेब होती है जिसमें हम कुछ जरूरी चीज़ें रख छोड़ते हैं। जब उन जेबों में से कोई आवाज़ आती है तो हम मन के सारे कोने थथोलते हैं सिवाय उस चोर जेब के। यह उस चोर जेब में रख छोड़ी गई चीजों से बच निकलने का एक सरल तरीका है जिससे वे हमारे साथ रही भी आती हैं और हम उन्हें ख़ुदकी और दूसरों की नज़रों से बचाए भी रखते हैं। बढ़ती उम्र में उससे लगातार दूर होती जाती बेटी, हड्डियों के भीतर से उठता दर्द, नितांत निजी कोने में संजोया अकेलापन और श्रीमती नलिनी महापत्रा की उदास पनीली आँखें, यह सब उसकी चोर जेब में ही तो है।

सामने एक रेस्टॉरेन्ट दिख रहा है शायद यही वह जगह हो जहाँ उसे नलिनी महापात्रा से मिलना है। पास जाकर पता चला यहाँ सिर्फ़ जगह के नाम का बोर्ड है। रास्ता पीछे से है। एक संकरी गली में तंग सी सीढ़ियाँ हैं। वह झुंझलाता है। कहीं कुछ भी सीधा नहीं है। न लोग, न रास्ते। घुटनों में दर्द के बावज़ूद वह अपेक्षाकृत तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ता है। वह अक्सर किसी अंदरूनी उत्तेजना में ऐसा करता है। श्रीमती महापात्रा जब भी दिल्ली आतीं ख़ुद ही मिलने चली आतीं। पिछली बार जब आईं थीं तो उन्होंने रात का खाना साथ ही खाया था। बहुत देर तक बातें करतीं रहीं। उन्होंने चलते हुए कहा था ‘घर बहुत अच्छे से रखा है आपने, हर कोने पर आपकी पसंद की छाप है।’ उस समय उसने बड़ी बेफिक्री से कहा था ‘जी जब तक यहाँ हूँ, अपनी तरह से रखा है, वर्ना घर तो आपका ही है, जब कहेंगी सामान समेट कर चल दूंगा।’ इसपर कुछ उदास होते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं जानती हूँ आप बड़े हिम्मतवाले पर इतने दिनो से इस घर में हैं अब इसे छोड़कर कहाँ जाएंगे जब तक चाहें रहिएगा। अब केवल मकान मालिक और किरायेदार का रिश्ता नहीं है हमारा’ ऐसा कहते हुए उनकी आँखें एक जगह स्थिर हो गई थीं फिर अगले ही पल पलक झपकाते हुए कहा था, ‘अब हम दोस्त भी हैं।’

इस बार इतनी ठण्ड में उनका उसे रेस्टॉरेन्ट में बुलाना कुछ अजीब था। फिर भी उसे लग रहा था कि उनसे मिलकर दिल कुछ हल्का हो सकेगा। सालों से उनके मकान में किराएदार है। साल में दो-एक बार मुलाक़ात भी होती है। हरबार मिलकर अच्छा लगता है पर हर बार कुछ अनकहा रह जाता है। जैसे दोनो एक दू्सरे के अकेलेपन को छूते तो हैं पर उसमें पाँव रखने से डरते हैं।

सीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं सामने दीवार पर एक शीशा आ गया जिसमें देखकर उसे एहसास हुआ कि वह यह सब सोच नहीं रहा है बल्कि बाक़ायदे बड़बड़ा रहा है। क्या सोच रहे होंगे उसे देखकर नीचे उतरते हुए लोग। क्या वे मन ही मन उसकी उम्र को कोस रहे होंगे। नहीं अन्ठावन की उम्र भी कोई उम्र होती है। वह पीठ सीधी करते हुए रेस्टॉरेन्ट में दाखिल हुआ। सामने ही बैठी हैं-नलिनी महापात्रा। इसबार सालभर बाद देख रहा है उन्हें, थोड़ी दुबली हो गईं हैं। रूप जस का तस पर चेहरा थोड़ा बुझा हुआ। उसे देखकर उन्होंने कृत्रिम मुस्कान ओढ़नी चाही पर वह बीच में ही चिरकर खिसियाहट में बदल गई फिर भी उन्होंन बात को शुरू करने के लिए पूछा, ‘कैसे हैं? बेटी कैसी है?’ उसने सपाट-सा जवाब दिया ‘मैं ठीक हूँ, बेटी तो अब आपके शहर बेंगलोर में ही पहुँच गई है। अभी कल ही बात हुई, आपका बेटा कैसा है?’ उन्होंने टेबल पर टिकी कोहनियाँ खींचकर, हाथों से कोट के सिरों को कसते हुए कहा, ‘वह ठीक है। शादी कर रहा है।’ ‘वाह! अच्छा है, इतना बढ़ा हो गया!, समय कैसे बीत जाता है!, उन्होंने साँस छोड़ते हुए कहा ‘हाँ, अब बहुत बड़ा हो गया,…आपकी बेटी क्या कर रही है’ ‘अभी तो किसी कम्पनी के साथ ट्रेनिंग पर है पर इसके बाद वह शादी नहीं करना चाहती बल्कि फरदर स्टडीस के लिए बाहर जाना चाहती है’ ‘ये तो अच्छा है, देखिए ये भी क्या संजोग है, इतनी बार दिल्ली आना हुआ पर आपकी बेटी से मुलाक़ात नहीं हो सकी।’

वेटर पहले से ऑर्डर की गई कॉफ़ी के दो मग टेबल पर रख गया। कुछ पल उनके बीच ख़ामोशी तिरती रही फिर जैसे उन्होंने अपने ही भीतर डूबते हुए कहा, ‘मैंने आपको यहाँ इसलिए बुलाया है क्योंकि मैं जो कहना चाहती हूँ वह आपके घर पर नहीं कह पाऊँगी। मैं जानती हूँ इस मौसम में आपको तक़लीफ़ तो होगी पर मैं चाहती हूँ कि आप,…मकान खाली कर दें’ उसके बाद जैसे बीच की टेबल लम्बी होती चली गई। उसे लगा जैसे बाहर की सर्दी शीशे को भेदती हुई भीतर आकर सीधी उसकी हड्डियों में समा रही है। अंजाने ही उसने अपनी चोर जेब में हाथ डाला और कोई नामालूम-सा सहारा ढूँढने लगा। तभी उसे लगा उसकी चोर जेब में कई सच्चाइयों के साथ कई झूठ भी हैं जो उसी ने खड़े किए हैं। उनमें से एक अभी-अभी उसने नलिनी महापात्रा से बोला था। अपनी बेटी के बारे में कि उससे अभी कल ही बात हुई है जबकि उससे बात हुए तो महीनों बीत जाते हैं। कैसे कहे उनसे कि वह अन्ठावन का नहीं बासठ साल का है। उसमें हिम्मत नहीं कि वह यूँ अचानक इस मौसम में रहने की जगह तलाशे और उसके लिए यह भी बहुत मुश्किल है कि वह मकान जिसमें बारह साल से वह अपना घर समझकर रहता आया है, यूँ अचानक खाली कर दे।

उन्होंने बहुत दूर से आती-सी आवाज़ में कहा, ‘देखिए ऐसे यूँ अचानक यह सब कहना मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा है पर मेरा बेटा शादी के बाद यू एस मे सेटल होना चाहता है और उसका कहना है कि मुझे उसके जाने से पहले यह प्रोपर्टी बेच देनी चाहिए। दरसल उसे पैसे की जरूरत है।’ वह श्रीमती महापात्रा की बातों में अपने घर को मकान, मकान को प्रोपर्टी और प्रोपर्टी को पैसे में बदलते हुए देख रहा था। वह अपनी उस जेब से नलिनि महापात्रा की उदास पनीली आँखें निकाल कर उनकी असली आँखों से मिला रहा था। वे मेल नहीं खा रही थीं। वे अपने बेटे के आगे हारी हुई लग रही थीं। तभी जैसे उन्होंने अपनी बात पर और वज़न रखने के लिए कहा, ‘यह सब मुझे इसी हफ़्ते करना होगा। अगले महीने उसकी शादी है। यह देखिए उसके एन्गेजमेन्ट की तस्वीर’ उन्होंने अपने मोबाइल पर एक तस्वीर को बड़ा करते हुए उसकी ओर बढ़ा दिया। उसमें उनका बेटा और उसकी होने वाली पत्नी थे। उसे श्रीमती महापात्रा की बात के समर्थन के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं थी। फिर भी उसने एक उड़ती नज़र उस तस्वीर पर डाली। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि तस्वीर में नलिनी महापात्रा के बेटे के साथ उसकी बेटी भी थी।

उसने फिर अपने मन की उस चोर जेब को थथोला जिसमें उसे अभी भी उन तमाम चीजों के होने का आभास हो रहा था जो किसी अन्जाने, अनदेखे समय में उसे थाम लेने के लिए उसने वहाँ रख छोड़ी थीं पर उसे लगा जैसे वह धीरे-धीरे खाली हो रही थी। उसमें अचानक ही कई छेद हो गए थे। उसने काँपते हाथों से अपने कोट की चोर जेब से अपना फोन निकाला। उसमें बहुत देर पहले आई एक मिस्ड कॉल थी पर वह नम्बर इस बार भी उसकी बेटी का नहीं था।

उसके बाद वह श्रीमती नलिनी महापात्रा से घर खाली करने के लिए एक दिन की मोहलत लेकर एक बासठ साल के घुटनों के दर्द से आजिज आ चुके इंसान की तरह रेटॉरेन्ट की सीढ़ियाँ उतरता हुआ गली में आ गया।

 

- विवेक मिश्र

विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर। एक कहानी संग्रह-‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ प्रकाशित। ‘हनियां’, ‘तितली’, ‘घड़ा’, ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’ तथा ‘गुब्बारा’ आदि चर्चित कहानियाँ। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व कहानियाँ प्रकाशित। साठ से अधिक वृत्तचित्रों की संकल्पना एवं पटकथा लेखन। ‘light though a labrynth’ शीर्षक से कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद राईटर्स वर्कशाप, कलकत्ता से तथा कहानिओं का बंगला अनुवाद डाना पब्लिकेशन, कलकत्ता से प्रकाशित।

संपर्क- मयूर विहार फेज़-2, दिल्ली-91

 

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