घर के भगवान

दरवाजे को जब घर के बुजुर्ग के मुँह पर धकेला गया तो गुस्से से भरा हुआ वह “धमाक से” बहुत तेज आवाज कर बैठा। बाहर मूसलाधार बारिश, कुण्डी भी दर्द से चटक उठी थी।
वह इन सबसे अनजान रसोई में, ऑफिस से आये पति के चाय-पानी के इंतजाम में लगी हुई थी। अचानक बिजली की तड़तड़ाहट से घबड़ा उठी, जैसे कहीं दूर बादल फटा हो , मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी थी।
खिड़की जोर-जोर से खड़कने लगी। वह खिड़की बंद करने को तेजी से बढ़ी कि सड़क की ओर नजर पड़ते ही चौंक उठी, “ये यहाँ कैसे?” सास-ससुर बारिश में सड़क पर…..! उसका मन एकदम से विचलित हो उठा, “अरे, देखो, बाहर पापा जी हमारा घर ढूँढ रहे है, लगता है घर का नम्बर नहीं मिला, मैं जल्दी से लिवा लाती हूँ।”
“रुको! मैंने बाहर से वापस भेज दिया है उनको, लिवाने की जरुरत नहीं है ” – टाई की नॉट ढीली करते हुए वह खिन्न था।
“ऐसा क्यों किया? वो पिता है हमारे!” -एकदम से स्तब्धता छा गई थी।
“पैसे तो वक़्त पर भेजता हूँ ना, यहाँ आने की क्या जरुरत थी उनको “- इतनी रुखाई….! वह अनमना उठी।
“माता-पिता घर के भगवान होते हैं, मत भूलो , हमारे भी बच्चे है!”
“तुम नहीं जानती, मैंने जीवन भर झेला है इन्हें, चलो जल्दी से खिड़की बंद करो!” – खिड़की ने सहम कर दरवाजे की ओर देखा।
” नहीं, ये खिड़की बंद नहीं होगी, तुमने झेल ली, अब मेरी बारी है झेलने की ” – जोर से उसको डपट लगाते हुए वह दरवाजे की ओर बढ़ी कि दरवाजा और कुण्डी दोनों चहक कर खुल गए। और इधर सहसा दीवारों में उतरती हुई नमी भी गायब हो गयी थी।

 

 

- कान्ता रॉय

जन्म दिनांक- २० जूलाई,

जन्म स्थान- कोलकाता
शिक्षा- बी. ए.
लेखन की विधाएँ-लघुकथा, कहानी, गीत-गज़ल-कविता और आलोचना
सचिव: लघुकथा शोध-केंद्र भोपाल, मध्यप्रदेश
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (वेवसाईट विभाग की जिम्मेदारी)
ट्रस्टी- श्री कृष्णकृपा मालती महावर बसंत परमार्थ न्यास।
सामाचार सम्पादक: सत्य की मशाल (राष्ट्रीय मासिक पत्रिका)
प्रधान सम्पादक: लघुकथा टाइम्स
संस्थापक : अपना प्रकाशन
पुस्तक प्रकाशन :
घाट पर ठहराव कहाँ (एकल लघुकथा संग्रह),
पथ का चुनाव (एकल लघुकथा संग्रह),
आस्तित्व की यात्रा (प्रेस में)
 
सम्पादक:
चलें नीड़ की  ओर (लघुकथा संकलन)
सोपान-4 (काव्य संकलन),
सहोदरी लघुकथा-(लघुकथा संकलन)
सीप में समुद्र-(लघुकथा संकलन)
बालमन की लघुकथा (लघुकथा संकलन)
अतिथि संपादक-दृष्टि, लघुकथा पत्रिका, महिला लघुकथाकारों का अंक।
एकल लघुकथा-पाठ : निराला सृजन पीठ, भारत भवन, भोपाल।
आकाशवाणी भोपाल से कहानी, लघुकथाएँ प्रसारित, दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण.
लघुकथा कार्यशाला :
1. ग्लोबल लिटरेरी फेस्टिवल फिल्म सिटी नोयडा, उ.प्र. में लघुकथा वर्कशॉप का आयोजन किया।
2. लघुकथा कार्यशाला करवाया : हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश भोपाल में 2016 में
3. दून फिल्म फेस्टिवल कहानी सत्र में अतिथि वक्ता के तौर पर सहभगिता।
 
उपलब्धियाँ :
साहित्य शिरोमणि सम्मान, भोपाल।
इमिनेंट राईटर एंड सोशल एक्टिविस्ट, दिल्ली।
श्रीमती धनवती देवी पूरनचन्द्र स्मृति सम्मान,भोपाल।
 लघुकथा-सम्मान (अखिल भारतीय प्रगतिशील मंच,पटना)
तथागत सृजन सम्मान, सिद्धार्थ नगर, उ.प्र.
 वागवाधीश सम्मान, अशोक नगर,गुना।
गणेश शंकर पत्रकारिता सम्मान.भोपाल।
 शब्द-शक्ति सम्मान,भोपाल।
श्रीमती महादेवी कौशिक सम्मान (पथ का चुनाव, एकल लघुकथा संग्रह) प्रथम पुरस्कार सिरसा,
राष्ट्रीय गौरव सम्मान चित्तौरगढ़,
श्री आशीष चन्द्र शुल्क (हिंदी मित्र) सम्मान, गहमर, तेजस्विनी सम्मान,गहमर.  
‘लघुकथा के परिंदे’ मंच की संचालिका।
कोलकाता में अपने छात्र जीवन के दौरान कई सांस्कृतिक संस्था से जुडी रही। महाजाति सदन, रविन्द्र भारती, श्री शिक्षा यतन हाॅल में मैने कई स्टेज शो किये है।
 
पता - गोविंदपूरा, भोपाल- 462023

5 thoughts on “घर के भगवान

  1. अपना ही बेटा इतना निष्ठुर हो सकता है कल्पना से परे है लेकिन बहू की आत्मीयता मन को छू रही है।बेहतरीन कथा

  2. घर के बड़ों -बुज़ुर्गों के आशीर्वाद के बिना हम सुखी नहीं रह सकते । लघुकथा में इस संदेश को पिरोया गया है ।बेटा बदल जाता है ।तब बहू अपने सास – ससुर को अपनाने के लाये सशक्त कदम उठाती है । कुंडी खिड़की दरवाजे के मानवीकरण ने कथा की संवेदनशीलता को बढ़ाया है । कांता से भविष्य में लघुकथा साहित्य जगत को बहुत अपेक्षाएँ हैं ।

  3. घर के बड़ों -बुज़ुर्गों के आशीर्वाद के बिना हम सुखी नहीं रह सकते । लघुकथा में इस संदेश को पिरोया गया है ।बेटा बदल जाता है ।तब बहू अपने सास – ससुर को अपनाने के लिये सशक्त कदम उठाती है । कुंडी खिड़की दरवाजे के मानवीकरण ने कथा की संवेदनशीलता को बढ़ाया है । कांता से भविष्य में लघुकथा साहित्य जगत को बहुत अपेक्षाएँ हैं ।

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