अन्तर्मन्

अन्तर्मन् के द्वन्द से ग्रसित मानव के जीवन की जिज्ञासा, उत्साह और प्रसन्नता अपूर्णता का आभास कराती हैं।जिससे आत्मविश्वास से दूरी, निराशा का जन्म और पराजित मनुष्य सी कम्पित देह और घुटती और बोझिल होती सांसे ।
वास्तविक रूप से देखा जाये तो सत् का पथ,स्वयं का आंकलन और जीवन की यात्रा।जहां मन के प्रश्न का उत्तर मनुष्य द्वारा खोजे जाये ।खुद से रूबरू होना अर्थात खुद को जानना ।

कर्म का सिद्धान्त हैं की जीवन में जो भी घटित होता है।उत्तरदायी मानव स्वयं ही हैं ।किसी अचेतन तल पर जब मनुष्य निर्मित कर रहा हो एक खोज,खुद को जानने की ।तो तुम ही निर्णायक हो अपने जीवन के,तुम्हे इसे स्वीकार्य भी करना हैं की खोज सहज हैं ।अगर इन्द्रिय नियंत्रण हैं।

मानव जहाँ परिवर्तन का पथ चुनता हैं तो चुनोती भी स्वीकार्य होनी चाहिये ।निर्णायक और निर्माता की दोहरी भूमिका निभानी हैं ।अहंकार,लालच,दोहरा जीवन, झूठ,हिंसा से दूरी तुम्हे निर्मित करनी हैं ।आरोप-प्रत्यारोप किस लिए और क्यों?कर्म तो तुम्हारे ही हैं ।थोपने का स्वांग क्यों ?

जीवन रूपी यात्रा और पथिक तुम।जीवन्त और सजग ।

जिस प्रकार लहरें अठखेलियां करती हैं।अपने गतिशीलता के कर्म को अपने अस्तित्व संग समेटे।जीवन की सार्थकता गतिशीलता में ही निहित हैं।

कभी बालक को देखना उसकी निर्भीक और निश्छल मुस्कराहट।क्योंकि वो वर्तमान में जीता हैं।मानव मस्तिष्क भूतकाल की निराशा और भविष्य के भय में उलझा रहता हैं ।

उलाहना,शिकायते,निराशा से क्यों ग्रसित हो?
भयभीत किस लिए और क्यों ? ज़िन्दगी में हताशा घेर लेती हैं और मनुष्य उसे राई का पहाड़ बना देता हैं।ये चिंता का सवाल ही नहीं होता और मनुष्य चिंतित हो जाता हैं कल्पित और निराधार ।अलगाव की परिस्थितियों का जन्म यही से आरम्भ होता हैं। धैर्य और साहस कहाँ गुम हो जाते हैं।

ज़िन्दगी हैं तो संघर्ष भी होगा और अंतिम साँस तक होगा इसे स्वीकार्य करना ही होगा ।तुम निर्बल हो जाओगे तो परिस्थिति तुम्हे दबाव देगी और अगर तुम निडर बन डटे रहे तो तुम विजयी हो गए ।

सब अस्थायी हैं ।समय रूपी धारा संग सब बह जाना हैं। तुम धैर्य और साहस संग अपनी ज़िन्दगी की यात्रा उत्साह,प्रसन्नता से पूर्ण करो ।खुशियां बटोरो और किसी के लिए प्रेरणा बनो। जीवन को नव रूप दो ।भय से मुक्ति और निडरता का दामन थामे कर्तव्य पथ पर अग्रसर नव,उमंग उत्साह संग…यही जीवन की सार्थकता हैं ।

 

- सरिता राठौड़

मैं सरिता राठौड़ एक कवियित्री,लेखिका समाज सेविका और प्रेरक वक्ता हूँ।

मैं मुम्बई में रहती हूँ।

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